ऐसा भी नहीं है कि स्मिता टांडी का फेसबुक एकाउंट कोई PR देखता हो. टांडी के हिसाब से लोग उनके फेसबुक पर लिखे गए पोस्ट को पसंद करते हैं इसलिए वो उनसे जुड़ते हैं. टांडी अभी बस 24 साल की हैं और उन्होंने 2011 में पुलिस ज्वाइन की थी.
स्मिता अपना सारा सोशल मीडिया अपने सैमसंग J7 मोबाइल से ही मैनेज करती हैं. स्मिता कहती हैं कि नौकरी करते हुए लैपटॉप और डेस्कटॉप के कंपेयर में मोबाइल पर फेसबुक चलाना आसान होता है.

फोटो - फेसबुक
स्मिता फेसबुक के जरिए जरूरतमंद लोगों की मदद करती हैं. पर इसमें वो बड़ी सावधानी भी बरतती हैं. स्मिता एक हालिया मामले का जिक्र करते हुए कहती हैं कि कई बार लोग ये जान जाने पर, कि मैं इस तरह मदद करती हूं, मुझसे मदद मांगने चले आते हैं जबकि उन्हें मेरी मदद की जरूरत भी नहीं होती. वो खुद इस काबिल होते हैं कि अपना काम या इलाज करवा सकें. फिर भी पैसे बच जाएं इसलिए मैं हमेशा मदद करने के पहले उस इंसान का फैमिली बैकग्राउंड और वो क्या करता है, ये सब चेक कर लेती हूं. और उसके अकाउंट की जांच के बाद ही किसी की कोई मदद करती हूं.
मदद करने के लिए स्मिता फेसबुक पोस्ट के लिए जरूरतमंद की समस्या को सोशल मीडिया पर रखती हैं. कई बार वो खुद भी उस जरूरतमंद की पैसों से और दूसरे तरीकों से मदद करती हैं. स्मिता बताती हैं, जब 2013 में वो पुलिस की ट्रेनिंग कर रही थी. उसी वक्त उनके पिता बीमार हो गए थे. इलाज के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे. जिससे उनकी मौत हो गई थी. इसके बाद से स्मिता ने तय कर लिया वो ये काम करेंगीं. स्मिता के पिता भी पुलिस में कांस्टेबल ही थे. 2007 में एक दुर्घटना के बाद उन्होंने रिटायरमेंट ले लिया था.
स्मिता कहती हैं, मैंने अपने पिता की मौत के बाद सोचा था कि इस तरह पैसे न मिलने के चलते हजारों लोगों की मौत हो जाती होगी. इसलिए मैंने ये काम शुरू किया. मैंने लोगों की समस्याओं का पता लगा लगाकर उन्हें फेसबुक पर पोस्ट करने को कहा. शुरू में तो लोग मेरी पोस्ट पर रिस्पॉन्ड भी नहीं करते थे. पर एक महीने बाद लोगों ने मेरे पोस्ट के बाद पैसे देने शुरू कर दिए.
शादी के प्रस्ताव भी उनको आते हैं. ये पूछे जाने पर कि क्या अभी शादी का कोई प्लान है, स्मिता हिचकती हैं और कहती हैं कि अभी उनको शादी करने में कम से कम 3 साल का वक्त है. कई बार उन्होंने लोगों के लिए सरकारी मदद भी जुटाई है. 2014 में स्मिता ने अपने दोस्तों के साथ ही मिलकर एक फेसबुक ग्रुप भी बनाया था. स्मिता के ग्रुप का नाम है जीवन दीपक. उनका कहना है कि कई बार लोग जानते नहीं हैं सरकारी योजनाओं के बारे में, जिसके चलते उनको उस योजना के पैसे मिल नहीं पाते हैं. मैं उनकी भी मदद करती हूं.
स्मिता को पॉपुलर होने का ये नुकसान भी होता हैं. कई बार लोग उनको ट्रोल करते हैं या पर्सनल चैट पर आकर परेशान करते हैं. स्मिता इस बारे में कहती हैं, ऐेसे लोगों से निपटने के लिए मैं पहले एक दफे उन्हें समझाती हूं और अगर वो फिर भी नहीं मानते तो फिर मैं उन्हें डांटती हूं. और इसके बाद भी वो नहीं मानते तो मैं फेसबुक पर उनकी बातों या कमेंट को स्क्रीनशॉट के जरिए डालकर उन्हें जवाब देती हूं.
फोटो - फेसबुकऐसा करने पर जो मेरे साथ जुड़े हुए हैं, वही लोग उन्हें सुधार देते हैं. कभी कोई लीगल एक्शन नहीं लेना पड़ा. वैसे भी मैं कमेंट बॉक्स को इग्नोर करती हूं. मैसेज और कमेंट पर ज्यादा ध्यान नहीं देती. इसके अलावा शादी और वाट्सएप्प नंबर के लिए बहुत लोग परेशान करते हैं पर मैं ऐसे लोगों को इग्नोर करने की कोशिश करती हूं और इसके अलावा अगर वो फिर भी नहीं मानते, तो कसके डांटती हूं और मेरे पुलिस में होने का मुझे फायदा मिलता है. लोग सुधर जाते हैं.
स्मिता कहती हैं, मैं कुछ भी लिखूं, बहुत सोच-समझ कर लिखती हूं. फिल्में देखने का वक्त नहीं मिल पाता. न रुचि है फिल्मों में याद भी नहीं कि लास्ट कौन सी फिल्म देखी थी. वैसे 'हम साथ-साथ हैं' फेवरेट फिल्म है. सोशल इशू से जुड़ी हुई चीजें खूब पढ़ती हूं. इससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है. बिना क्रॉसचेक किए कुछ नहीं लिखती. काफी सोच-समझकर वक्त देकर लिखती हूं.
फोटो - फेसबुककहती हैं, वर्दी से इतर भी अच्छे कपड़े पहनने का मन करता है. स्मिता एक गार्ड का किस्सा सुनाती हैं जिसकी बेटी प्रिया शुक्ला स्टोव फटने से जल गई थी. गार्ड के लिए ट्रीटमेंट कराना पॉसिबल ही नहीं था. बहुत बुरे तरीके से जली हुई थी. जब उसे ले जाया गया अस्पताल तब डॉक्टर ने बताया कि ये 75 परसेंट जल चुकी है. 8 लाख का खर्चा आना था.
हमने पहचान के डॉक्टर्स से फ्री में दवा दिलवाई. करीब 2 लाख की मदद फेसबुक पर पोस्ट डालने से आ गई थी. फिर हमने सरकारी मदद के लिए अर्जी दी. और बाकी की दवा फिर फ्री में हुई. उस लड़की के बचने के बाद बहुत खुशी हुई थी. हम केवल मदद करके रुक नहीं जाते हैं. जब तक मरीज पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते, फॉलोअप लेते रहते हैं. उसकी मैंने मदद की थी. कहती हैं उसे बचाकर बहुत खुशी मिली थी.
हमारे ग्रुप जीवन दीपक के मेंबर अलग-अलग जगह जा जाकर भी मदद करते हैं. फेक लोगों से बचने के लिए फेसबुक प्रोफाइल से लेकर बैंक अकाउंट तक हर बात जांच कर ही मदद करते हैं. फैमिली बैकग्राउंड भी जांचते हैं.
स्मिता कहती हैं कि पुलिस की नौकरी में कई प्रॉब्लम आती हैं, खासकर औरतों को. पर काम करना ही है. इस पर कभी भी किसी से बहस नहीं हुई. वैसे ही बात करके काम चल जाता है. हाल ही में ये लॉन्च हुआ है. सोशल मीडिया अपियरेंस देखकर ही सलेक्शन हुआ है. हमारी हेल्पलाइन के वाट्सएप्प पर भी लड़कियां अपनी प्रॉब्लम्स शेयर करती हैं. हमारी टीम प्रॉब्लम्स सुलझाने में मदद करती है. चाहे जैसी भी हों. मेरे पर्सनल नंबर पर शिकायत किसी ने नहीं की. हेल्पलाइन पर वॉट्सएप्प की कंप्लेन मैं ही देखती हूं. मेरा पर्सनल नंबर ज्यादा लोगों के पास नहीं है.
फोटो - फेसबुकपुलिस की नौकरी से इतर भी लोग मुझे जानते हैं किसी काम के लिए, इससे मुझे खुशी होती है. किसी को हमारे या हमारी टीम के जरिए मदद मिल रही है, ये जानकर खुशी होती है. एक बार किसी आपसी रंजिश में एक पड़ोसी ने एक परिवार का कत्ल कर दिया था. बच्ची बची थी बस. उसे चाकू लगा था. उसका भाई भी भाग गया. बच्ची एडमिट थी. मैं हमेशा उस बच्ची के साथ थी, जब तक वो पूरी तरह ठीक नहीं हो गई. भाग गया था उसका भाई. जब तक पूरी तरह ठीक नहीं हो गई, तब तक उसका हाल चाल लेती रही.
मैं पूरी तरह से नॉर्मल रहती हूं. उनके साथ कोई सेलिब्रिटी वाला फील नहीं है. कोई मुझे ज्यादा दिन तक परेशान नहीं कर पाता. मैं इससे बहुत अच्छे से निपटना जानती हूं.
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