
शाज़ी ज़माँ
राजकमल प्रकाशन से एक किताब आई है: अकबर. लिखने वाले हैं शाज़ी ज़मां. दिल्ली, कलकत्ता से लेकर लंदन तक हर पोथी-पत्री छान मारे हैं. अपने मन से नहीं लिखे हैं बादशाह अकबर के बारे में. रात-रात भर जाग के रिसर्च किया है. पढ़ने में कहानी जैसा लगेगा. पर कहते हैं कि प्रमाणों के आधार पर सब हुआ है. हम आपको इसी किताब का एक अंश पढ़वा रहे हैं. राजा बीरबल अकबर के बड़े प्रिय थे. नाम था महेश दास पर अकबर ने उनका नाम वीरवर कर दिया था. जो बाद में बीरबल बन गया. दोनों के हंसी-मजाक के किस्से तो लोगों की जबान पर रहते हैं. पर बीरबल के मरने का किस्सा कम लोगों को पता है. बड़ा दर्दनाक था. कहिए कि बीरबल हमेशा अपनी धुन में रहते थे. किसी की बात नहीं सुनते थे. जान देने पर ही तुल गए थे बीरबल.
बादशाह सलामत के तीसवें साल, बमुताबिक़ 1586 ईसवी, में जै़न ख़ां कोका को यूसुफ़ज़ई क़बीले को शिकस्त देने के लिए तैनात किया गया. बजौर पर क़ाबू करने के बाद वो स्वात तक पहुंचे तो उनकी फ़ौज थक चुकी थी. जब उन्होंने और फ़ौज मांगी तो बादशाह सलामत ने शेख़ अबुल फ़ज़ल और राजा बीरबल के बीच पासा फेंक कर बीरबल का नाम तय किया. फिर एहतियातन उन्होंने पीछे-पीछे हकीम अबुल फ़तह को भी भेज दिया.राजा बीरबल की ना हकीम अबुल फ़तह से बनती थी, ना ज़ैन ख़ां कोका से. पहाड़ी रास्तों पर सफ़र करते हुए राजा बीरबल ने अपने लोगों से कहा, ‘‘कैसा बुरा वक़्त है कि हकीम के साथ कोका की मदद के लिए भेजा गया हूं!’’
जब राजा बीरबल और अबुल फ़तह वहां पहुंचे तो ज़ैन ख़ां कोका ने दोनों को दावत पर बुलाया लेकिन बीरबल आने को राज़ी ना हुए. उन्होंने कहा कि सब लोग उनके पास आएं और तय करें कि आगे क्या करना है. जै़न ख़ां कोका ग़ुस्सा पीकर राजा बीरबल के पास आ गए. बैठक में राजा बीरबल और हकीम अबुल फ़तह के बीच कहासुनी हो गई.
ज़ैन ख़ां कोका ने कहा, ‘‘पहाड़ी इलाक़े का काम लगभग पूरा हो चुका है और कराकर और बुनेर के बाग़ी अब फ़रमाबरदारी के रास्ते पर आ गए हैं लेकिन अभी ये सिर्फ़ उनकी बातों में दिखा रहा है, हरकतों में नहीं. मैंने और फ़ौज इसलिए मांगी है ताकि कुछ लोग क़िले में रहें और बाक़ी बाग़ियों को सज़ा देने के लिए निकले. जो फ़ौज अभी आई है वो ये काम करे. मैं और पुरानी फ़ौज इस इलाक़ के बीचोबीच चौकसी रखेंगे. या अगर चाहें तो नई फ़ौज चकदारा के क़िले में रहे और हम जाकर पहाड़ के लोगों को सज़ा दें.’’
जब राजा बीरबल और हकीम अबुल फ़तह ने बात मानने से इंकार किया तो जै़ैन ख़ां कोका ने ज़िद नहीं की. उन्हें लगा कि ये लोग बादशाह सलामत के कान भर सकते हैं इसलिए इनकी बात मान लेना ही बेहतर है. अब राजा बीरबल और हकीम अबुल फ़तह ने अपनी बात मनवा कर ग़लत तरफ़ कूच करने का फ़ैसला कर लिया. इसके बाद वही हुआ जिस बात का डर था. शाही फ़ौज और अफ़ग़ान बाग़ियों के बीच घमासान छिड़ गया. ख़ानपुर पहुंच कर जब फ़ौज ने दम लिया तो हमलों और लूटपाट से काफ़ी नुक़्सान हो चुका था लेकिन हज़ारों अफ़ग़ानी कै़द में आ चुके थे और बड़ी तादाद में सामान बरामद हो चुका था.राजा बीरबल ने हकीम अबुल फ़तह से कहा, ‘‘हमें इन दोनों में से कोई भी बात मंजूर नहीं. हमें हुक्म है इस इलाक़े पर हमला करने का, इसकी हिफ़ाज़त का नहीं. हम सबको मिलकर दुश्मन को सज़ा देनी चाहिए और फिर इकट्ठे दरबार की राह पकड़नी चाहिए.’’
ज़ैन ख़ां कोका बोले, ‘‘जिस इलाक़े को इतनी लड़ाई से हासिल किया है वहां अफ़रातफ़री क्यों फैलाएं?’’ ज़ैन ख़ां कोका ने सलाह दी कि राजा बीरबल जिस रास्ते पर आगे जाना चाह रहे हैं, वहां जाना मुनासिब नहीं है. ज़ैन ख़ां कोका ने कहा, ‘‘अगर आपको मेरी कोई बात पसंद नहीं और आप कूच करना ही चाहते हैं तो उस तरफ़ जाइए जिधर से आए हैं. उस तरफ़ हमारे फ़ौजी तैनात हैं और दुश्मन का ख़तरा नहीं है.’’
जब ज़ैन ख़ां कोका ने राजा बीरबल के खेमे में जाकर कहा कि जल्दबाज़ी का नतीजा अच्छा नहीं हुआ, तो जवाब मिला, ‘‘अब थोड़ा सा ही संकरा रास्ता बचा है. इसे पार कर लें. फिर कुछ रुक कर बाग़ियों को सज़ा देने का काम शुरु करें.’’
ज़ैन ख़ां कोका की बात नहीं मानी गई और कूच का फ़ैसला हो गया. राजा बीरबल, हकीम अबुल फ़तह, जै़ैन ख़ां कोका और पूरा लश्कर संकरे पहाड़ी रास्ते पर आगे बढ़ा तो पहले से भी ज़्यादा घमासान हुआ. अफ़ग़ानियों ने हथियार और पत्थरों से ऐसा ज़ोर का चौतरफ़ा हमला बोला कि पता नहीं चला कि घोड़े कहां हैं, हाथी कहां और इंसान कहां. इस जंग में राजा बीरबल ऐसे घिरे कि उनकी लाश तक नहीं मिली. अमीर उमरा में से किसी की मौत पर भी बादशाह सलामत को इतना ग़म नहीं हुआ था.जै़न ख़ां कोका ने जवाब दिया, ‘‘अब आगे जो संकरा रास्ता है वो सबसे ख़राब है और उस रास्ते पर जाकर सिर्फ़ इज़्ज़त गवाई जा सकती है. बेहतर हो कि जहां हैं वहीं रहे क्योंकि यहां काफ़ी जगह है. ऊंचाई से हमले का ख़तरा नहीं और काफ़ी पानी, घास और खाना है. यहीं मज़बूती से बने रहें और बाद में उन बाग़ियों को सज़ा दें जिन्होंने सभी ऊंचाईयों पर क़ब्ज़ा कर लिया है. दूसरा रास्ता ये कि हमारे क़ब्ज़े में दुश्मन के घर वाले हैं और उनकी काफ़ी जायदाद है, तो उन्हें प्यार से लिखा जाए और वफ़ादारी का वायदा लिया जाए. बदले में क़ैदी लौटा दिए जाएं. बस कुछ को क़ैद में रहने दिया जाए. अगर आप लोगों को ये बात भी ठीक नहीं लगती तो कुछ वक़्त रुक कर दरबार ख़बर भेज देते हैं. वहां से फ़ौज आकर दर्रे की ऊंचाई की हिफ़ाज़त करेगी.’’
राजा मान सिंह की शान में लिखी गई मानचरित्र रासो में कहा गया कि कई अमीर उमरा ने वीर गति पाई; जो भागे वो कलंकित हुए और ख़ुद ब्रह्मदास ब्रह्मा में मिले क्योंकि वो तो माया के वश में नहीं थे: जब बादशाह की आंखों की नींद उड़ चुकी और उन्होंने खाना पीना छोड़ दिया तो राजा मान सिंह ने वायदा किया कि वो इलाके के राजा को बांध कर धकेलते हुए उनके सामने लाएंगे और उसके क़िले को गिरा कर शहर को जला देंगे.
बादशाह सलामत ने खाना खाया और ख़ुश हो कर कहा कि उनकी इज़्ज़त अब मान सिंह के हाथों में है; जब उन्हें विदा करते वक़्त बादशाह ने कहा कि बीरबल उनका ब्राह्मण मित्र था, उसकी देह को ढूंढ कर गंगा में विसर्जित कर देना तो राजा मान सिंह बोले कि बीरबल ब्राह्मण हैं तो वो ख़ुद भी हिंदू हैं और वो बीरबल और सभी मरने वालों की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित कर देंगे." ब्रह्मदास ब्रह्महि मिल्यौ, जानत सकल जिहांन. मन माया बेध्या नहीं, सु क्यौं रहै इहिं थांन.. जूझ्यौ ब्रह्मदास वरवीर. अरू उमराउ हजारी मीर. आए बहुत भगे तिहिं ठाम. कहै मानु खंडे जिन नांम.. पातसाहि मन कल नहीं, नींद न आवै नैन. मो फौजें जीती सदा, भई जि सुनी न बन.. राजा मांनु बुलाइ कै, पूछत हैं सुविहांनु. मो दुख जिय मैं अति घनौं, भावत नाहीं खानु.. दुखु न करइ जिय आपु ईसु जु होइ जिहांनहि. को यह घाटी विकट पारि बंधौं जु विहांनहि.. बहुत दिनां मो भये उठो कहुं रनह न बाधा. सो पुजाइ भगवंत आइ अपनै कर साधा.. कही साहि सकल संचारिकै, नतरू बंधि आगै धरउ. गढ ढाहि नयर परजारि कै, तर माटी ऊपर करउ."
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राजा बीरबल ने हकीम अबुल फ़तह से कहा, ‘‘हमें इन दोनों में से कोई भी बात मंजूर नहीं. हमें हुक्म है इस इलाक़े पर हमला करने का, इसकी हिफ़ाज़त का नहीं. हम सबको मिलकर दुश्मन को सज़ा देनी चाहिए और फिर इकट्ठे दरबार की राह पकड़नी चाहिए.’’





