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नन और संत का कपड़ा छू गया, दोनों को प्यार हो गया, अब ब्याह करके दुनिया भर में फेमस

एक 24 साल से संन्यासी थीं, दूसरे 13 साल से संत.

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स्टोरी लिख के दिल ख़ुश हो गया. आप पढ़ लीजिए. (फोटो - india today)

एक कवि हैं मुदित श्रीवास्तव. उनकी एक कविता के अंश हैं -

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"सदियों एक ही जगह खड़े रहने के बाद 
तुम्हारी छुअन से मैं चल पड़ा— 
किसी दूसरे पहाड़ की ओर अपनी छुअन उसे देने

छू लेना— 
प्रेम स्थानांतरित करने का
सबसे बेहतर ज़रिया है."

अब आते हैं स्टोरी पर. इंग्लैंड में एक शहर है प्रेस्टन. प्रेस्टन में एक चर्च की नन थीं मैरी एलिज़ाबेथ. एक छुअन ने उनका जीवन बदल दिया. छुअन एक संत का.

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पिछले 24 सालों से एलिज़ाबेथ ने तपस्वी का जीवन जिया. ज़्यादातर मौन व्रत में रहीं. अपनी एक कोठरी में. एक दिन उनके एक सीनियर साथी उन्हें फ्रायर रॉबर्ट से मिलाने ले गए. फ्रायर रॉबर्ट ईसाई धर्म की शाखा रोमन कैथोलिक से जुड़े संन्यासी हैं. सिस्टर मैरी और उनके साथी फ्रायर रॉबर्ट से मिल रहे थे, तभी उनके साथी के पास एक फोन कॉल आ गया. वो बात करने कमरे से बाहर चले गए. अब मैरी और फ्रायर रॉबर्ट कमरे में अकेले रह गए.

BBC से बात करते हुए मैरी ने बताया,

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"ये पहली बार था कि हम एक कमरे में एक साथ थे. हम एक मेज़ पर बैठे थे. हमने खाना खा लिया, लेकिन मेरे सीनियर वापस आए नहीं, तो हमें बाहर जाना पड़ा. बाहर निकलते हुए मेरा हाथ फ्रायर रॉबर्ट की आस्तीन से टकरा गया. और, मुझे एक झटका-सा लगा. एक केमिस्ट्री जैसा. मैं झेंप गई थी. मुझे ये भी लग रहा था कि क्या उन्हें भी ऐसा लगा. फिर हम दरवाज़े से बाहर निकले और थोड़े समय के लिए हम असहज हो गए थे."

इस वाक़ये के एक हफ़्ते बाद मैरी को रॉबर्ट का मेसेज आया - 'क्या तुम मुझसे शादी करने के लिए सब कुछ छोड़ सकती हो?'

मैरी बताती हैं कि वो स्तब्ध थीं. तब तक रॉबर्ट को मैरी के बारे में कुछ नहीं पता था. न बालों का रंग, न परवरिश, न असल नाम.

मैरी ने 19 साल की उम्र में संन्यास ले लिया था. उससे पहले उनका नाम था लीज़ा टिंकलर. माता-पिता बहुत धार्मिक नहीं थे. लेकिन बुआ का असर बहुत रहा मैरी पर. बुआ तीर्थ पर जाती थीं और मैरी उनसे बहुत प्रभावित थीं. धीरे-धीरे दीन की तरफ़ रुख बढ़ा. चर्च जाने लगीं और वहीं मदर मैरी के लिए उनका समर्पण हुआ. घर वालों से कह दिया कि जीवन ऐसे ही बिताएंगी. उसके बाद मैरी ने एक संन्यासी की तरह जीवन बिताया. 24 साल ऐसे ही बीते, लेकिन आस्तीन की उस छुअन ने सब कुछ बदल कर रख दिया.

मैरी कहती हैं,

"मुझे नहीं पता था कि प्यार में कैसा महसूस होता है… इसलिए मैं काफ़ी घबरा गई थी. मैं अपने अंदर बदलाव महसूस कर सकती थी और इससे डर रही थी."

इसके बाद सिस्टर मैरी के अंदर की लीज़ा ने हिम्मत जुटाई. अपने सीनियरों से बात की. बताया कि उनके मन में रॉबर्ट के लिए भावनाएं हैं, लेकिन सीनियर्स से अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिली. उनकी सुपीरियर को ये नहीं समझ आ रहा था कि इतने कम संपर्क में प्यार कैसे हो गया! मैरी के मन में असमंजस था. परिवार, बिशप, यहां तक कि ईश्वर के साथ उनका रिश्ता बदलने वाला था.

नवंबर 2015 में दोनों पहली बार मिले थे (फोटो - सोशल मीडिया)

चर्च तो मानता नहीं, सो लीज़ा ने अपना सामान बांधा और निकल गईं. जिस रात रॉबर्ट से मिलना था, भयंकर बारिश हो रही थी. मैरी बताती हैं कि वो रात बहुत लंबी थी. दिमाग़ में बस यही ख़याल था कि ये ग़लत है. एक-एक क़दम इम्तेहान लग रहा था.

रॉबर्ट उस रात का ब्योरा कुछ यूं देते हैं:

" जब मैंने उसे देखा तो ऐसा लगा कि मेरा दिल रुक गया. वो पूरी तरह से भीग चुकी थीं. उसके कोट से पानी टपक रहा था. लेकिन असल में ये बस ख़ुशी नहीं थी. डर भी था. मैं उस पल में जानता था कि मुझे पूरी तरह से लिज़ा का होना था, लेकिन मुझे ये भी पता था कि हम इसके लिए तैयार नहीं थे."

फ्रायर रॉबर्ट 13 साल तक दुनियावी मोहमाया से अलग एक विचारक, अकादमिक और धर्मशास्त्री थे. जीवन और दुनिया के सच के बीच अपना सच खोज रहे थे. पिता धार्मिक थे, मां नहीं. लीज़ा से मिलकर उनकी सारी हाइपोथीसिस पलट गई.

“मेरी आस्तीन पर लीज़ा की छुअन ने एक बदलाव शुरू किया. मेरे दिल में धीरे-धीरे कुछ बढ़ने लगा. मुझे नहीं लगता कि तब मैं उस पॉइंट तक पहुंचा था कि मैं कह सकूं कि मैं लीज़ा के प्यार में पड़ गया था. एक भिक्षु (संन्यासी) या एक नन के तौर पर आपको प्यार जैसी भावनाओं से निपटना ही सिखाया जाता है.”

वो बताते हैं कि लीज़ा से उनका ये पूछना कि क्या वे शादी कर सकते हैं, लगभग ख़ुद के साथ एक बौद्धिक झगड़ा था. दोनों ने शादी नहीं की, लेकिन एक रिश्ते में आ गए. शुरुआत ऊबड़-खाबड़ थी. लीज़ा संन्यास छोड़ने के ठीक बाद का एक पल याद करती हैं:

"मैंने रॉबर्ट को देखा और वो व्यथित था. रो रहा था. वो हम दोनों के जीवन का सबसे कमज़ोर क्षण था. ऐसा लगा कि हमें रोमियो और जूलियट जैसा कुछ कर लेना चाहिए और इसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना चाहिए.

हमारे पूरे धार्मिक जीवन के दौरान हमें यही बताया गया था कि हमारा दिल केवल ईश्वर के लिए है. और अब मुझे लगने लगा था कि रॉबर्ट के साथ रहते हुए मेरे दिल का दायरा फैल रहा है. सबसे अच्छी बात ये थी कि मुझे ईश्वर के लिए कुछ अलग नहीं लग रहा था. मैं ईश्वर के लिए वैसा ही महसूस कर रही थी, जैसा पहले करती थी.

वो समय बहुत मुश्किल था क्योंकि हम दोनों अकेले और अलग-थलग सा महसूस करते थे. आगे का रास्ता नहीं दिखता था, लेकिन हमने सिर्फ हाथ थामे रखा."

लीज़ा और रॉबर्ट ने शादी कर ली है. और, अब उत्तरी यॉर्कशायर के हटन रुडबी गांव में रहते हैं. रॉबर्ट एक स्थानीय चर्च के पादरी बन गए हैं. उन्हें रोम से एक पत्र मिला गया है, जिसमें लिखा है कि वो अब कार्मेलाइट ऑर्डर के सदस्य नहीं हैं. लीज़ा को एक अस्पताल में पादरी का काम मिल गया है.

ये उन दो प्रेमियों की कहानी है, जो एक-दूसरे को और प्रेम को एक-साथ खोज रहे हैं.

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