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उस भगवान को इस कमरे में होने वाली बातों को देखने की इजाजत नहीं थी

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए विक्रम श्रीवास्तव की कहानी 'रेत'

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फोटो - thelallantop
उसके यूं तो छमिया, छम्मकछल्लो, हरा**दी, रानी वगैरह कई नाम थे, मगर मुझे उसके नाम में कभी दिलचस्पी नहीं रही. वो हर बार कुछ और बन जाती थी मेरे लिए और मैं इसीलिए उसके पास जाता था वो मेरे लिए समंदर किनारे की रेत थी जब तक दिल किया उसके साथ खेला. .कुछ भी अपने मन का गढ़ा और फिर लात मार कर चल दिया. समंदर किनारे की रेत केवल दिल बहलाने के लिए होती है, उसे कोई घर में नहीं सजाता और जब दिल बहल जाए तो हाथ झाड कर निकल जाते हैं.
मुझे उसके कौन सी बात पसंद थी या कौन सी बात नापसंद थी. ये कहना मुश्किल है. कभी ध्यान ही नहीं दिया. बस एक ही बात थी जो बहुत अजीब लगती थी. अच्छी या बुरी में तौलने की कोशिश न करिए. बस अजीब. और वो ये कि वो सीधे आंखों में देखती थी. एकटक, बिना पलक झपकाए. घूर कर नहीं, बस यूं कि जैसे मुझमे कुछ खोज रही हो या अपनी आंखों में मुझे कुछ दिखाने की कोशिश कर रही हो.
मुझमें उसे क्या दिखा क्या मिला मैंने कभी पूछा नहीं. उसने कभी बताया नहीं. हां मगर मैंने कई बार उसकी आंख में अपना अक्स देखा है. उसमें मैं अच्छा नहीं दिखा कभी. मेरे घर का आईना मुझे हमेशा खूबसूरत बताता है लेकिन नहीं. हमेशा कुछ काला सा ही दिखता था. पर ये कहानी मेरी नहीं उसकी है. उसकी जिसका नाम मुझे नहीं पता. यूं तो हर कहानी शुरू से शुरू होती है मगर उसकी कहानी की शुरुआत कब कहां कैसे और क्यों हुई कोई नहीं जानता. वो बाज़ार में कब लाई गई और कितनी बार बिकी? किसी ने इसका हिसाब रखने की ज़रुरत नहीं समझी. उसने खुद ने भी नहीं. मेरे लिए उसकी कहानी तब शुरू हुई जब मैं उससे पहली बार मिला या यूं कहूं की जब मैंने उसे पहली बार खरीदा या उसके शब्दों में मैंने पहली बार उसे भाड़े पे लिया. दलाल को बाहर पैसे देकर मैं कोठा नंबर 27 में दाखिल हुआ. कोठे की जो इमेज दिमाग मे थी उससे काफी अलग थी वो जगह. इस दस बाई दस कमरे की दीवारों पर हल्का हरा रंग लगाया गया था जो सीलन की वजह से कुछ हिस्सों में पपड़ी छोड़ रहा था. दरवाज़े से बिलकुल बगल एक मेज़ पर कुछ मेकअप का सामान करीने से रखा था. उसके ठीक ऊपर दीवार पर एक छोटा आइना था. सामने दीवार पर दो तस्वीरें थीं. जिनमें किसी नेचुरल लैंडस्केप के ऊपर कोई अंग्रेजी सूक्ति लिखी थी. दायीं ओर की दीवार पर एक खिड़की थी जो शायद ही कभी खुली थी. कमरे में घड़ी नहीं दिखी हालांकि बाहर दलाल समय के हिसाब से पैसे ले रहा था. बिज़नेस टैक्टिक्स. बाईं दीवार पर एक लकड़ी का मंदिरनुमा बक्सा लगा था. जो हलके कपड़े के परदे से ढंका हुआ था. मंदिर के अंदर कौन सी मूर्ति या तस्वीर थी पता नहीं. पर जो भी हो उस भगवान को इस कमरे में होने वाली बातों को देखने की इजाजत नहीं थी. छत के बीचोंबीच एक पंखा था जो केवल चलने के लिए चलता था. पंखे से ठीक नीछे एक पलंग था. जिस पर फूल पत्तियों के प्रिंट वाली चादर बिची थी. चादर पर दाग नहीं थे मगर उनकी कमी कुछ छेद पूरी कर रहे थे. उसी चादर पर बैठी थी वो, गुलाबी रंग के सलवार कुर्ते में, मुस्कुराती हुई.
"आओ साहब! क्या लोगे??" यूं तो ये सवाल काफी सीधा था मगर इसके जवाब कई हो सकते थे. इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में बिताए हुए दो साल इतना तो सिखा चुके थे. कि हर बात कई मतलब लिए होती है और एक गलत जवाब आपका मजाक बना सकता था. "यहां लोग क्या लेने आते हैं?" "वो तो लेने वाले पे डिपेंड करता है. मेरी तो भाड़े पर देने की दुकान है जो चाहो मिल जाएगा. यहां कोई अपनी बीवी लेने आता है तो कोई माशूका. किसी को फिल्मी हिरोइनें चाहिए तो कोई रंडी की तलाश में यहां आता है तुम्हे क्या चाहिए भाड़े पे? "एक रंडी के मुंह से इतनी फिलॉसफी अच्छी नहीं लगती" "ह्म्म्म...तो तुम्हे केवल रंडी चाहिए...हाज़िर है"
उसके बाद उसने एक शब्द नहीं कहा. अब वो रेत मेरी थी. अब मैं उसका क्या करूं मेरी मर्ज़ी थी. मैंने जी भर खेल कर वो रेत उसी बिस्तर पर बिखेर दी. धीरे-धीरे मैं उसका नियमित ग्राहक बनता गया. सेक्स में ये अजीब सा गुण है आप जितना उसमे डूबते हो वो उतना ही और अंदर खींचता है. पहले महीने में फिर दस दिन में और फिर हफ्ते में दो-तीन बार मुझे उसकी ज़रुरत पड़ने लगी. अब हम थोड़ी-बहुत बातें भी कर लेते थे. ज्यादातर वो बातें मेरे कॉलेज के बारे में होती थी. उसे उनमें काफी दिलचस्पी लगती थी. पिछले सात महीने में उसने केवल एक बार मुझे वापस लौटाने की कोशिश की थी. उस दिन वो काफी थकी लग रही थी. लेकिन दलाल ने उसे जबरदस्ती तैयार कर लिया. उस दिन पहली बार मुझे लगा की वो जिंदा है. उस दिन शायद उसे भी पहली बार लगा कि मैं इंसान हूं. हमने कुछ किया नहीं उस रात. केवल बातें की.
"तू ये सब पढ़ के कितना कमा लेगा रोज़?" "रोज़ नहीं, महीने के मिलेंगे, कम से कम 25-30 हज़ार" "कितने घंटे काम करना होगा" "10 घंटे... कभी-कभी ज्यादा भी हो सकता है" "कितने साल तक??" "जब तक मैं चाहूं, 50 का होने तक तो कर ही सकता हूं" "साला तुम लोग अच्छे रंडी हो. हम लोग का तो 35 के बाद ख़तम." "मैं इंजीनियर हूं." "कौन सा रंडी से कम हो. हम तो केवल शरीर बेचते हैं. तुम तो साला दिमाग भी बेच दोगे. लेकिन दाम अच्छा मिलता है तुमको." मेरे पास उसका जवाब नहीं था या शायद था भी तो मैं दे नहीं पाया न जाने क्यों. "जानता है मुझे बचपन का कुछ याद नहीं. मां-बाप भाई बहन कुछ नहीं. बस एक ही बात याद आती है. मुझे दुल्हन बनना बहुत अच्छा लगता था. सजधज के अपने आदमी का इंतज़ार करना. और किस्मत देख आज मैं रोज दुल्हन बनती हूं. रोज आदमी का इंतज़ार करती हूं. फर्क बस इतना है मेरा आदमी बदल जाता है. " कुछ देर रूककर उसने खुद को आईने में देखा और हंसने लगी. "साली कितनी खुशकिस्मत हूं मैं"
मैंने दो-तीन पानी की बूंदें महसूस की थी उसी समय अपने हाथ पर. पता नहीं वो उसके आंख के थे या मेरी आंख के या शायद छत ही टपक रही थी. उस रात उसने और भी बहुत कुछ कहा था पर मैंने कुछ सुना नहीं. मैं उन दो बूंदों की गुत्थी में ही उलझ के रह गया. उस रात के बाद हमारा रिश्ता कुछ बदल गया. ये प्यार नहीं था. दोस्ती या सहानुभूति जैसा भी नहीं था. जाने क्या था वो. बस एक रिश्ता था. अब मैं वहां रोज़ जाता था. वो अब भी दुकानदार थी और मैं खरीददार. बस हममें अब थोड़ी जान-पहचान थी. हम एक-दूसरे का नाम अब भी नहीं जानते थे. वो मुझे मेरे पैसे से पहचानती थी और मैं उसे उसके सामान से जानता था. किसी किराने की दुकान की तरह. एक रात मैं थोडा देर से पहुंचा तो वो किसी और के साथ थी. लाख झगड़े के बाद भी मुझे अंदर जाने नहीं दिया उस दलाल ने. मैं वहां से लौट आया. मुझे गुस्सा था. पता नहीं किसी बात पर. शायद रोज जाने के कारण मुझे अब वो मेरी प्रॉपर्टी लगती थी. उसके साथ होने का हक अब बस मुझे था. वो मैदान का वो कोना थी जहां केवल मैं खेल सकता था. दूसरे दिन मैंने उसे बहुत उल्टा सीधा कहा.
"तू थोड़ी देर मेरा इंतज़ार नहीं कर सकती थी" "क्यों" "क्यों? तुझे नहीं पता मैं रोज़ आता हूं यहां" "तो क्या हुआ? तूने खरीदा नहीं है मुझे." "खरीदा नहीं है तुझे लेकिन तू मेरी है. सिर्फ मेरी"
उसके बाल अब मेरी मुठ्ठी और होंठ होंठों में थे. एक पुरुष ने फिर शक्ति से अधिपत्य जता दिया था. मैंने रेत मुट्ठी में बांध ली थी. उस रात वो कुछ नाजुक सी लग रही थी. जैसे कहीं कोई जोड़ खुल गया हो. एक गांठ जिसके सहारे उसने सब कुछ संभाल रखा था वो टूट रही थी. बिखर रही थी वो. लेकिन उस समय मुझे ये सब नहीं दिखा. मैं अपने पुरुषत्व की जीत की ख़ुशी मना रहा था. उस रात के बाद वो मुझे कभी नहीं मिली. कोई नहीं जानता वो कहां गई. क्योंकि वो रेत थी. मैंने उसे मुट्ठी में बांधने की गलती कर दी थी और वो मेरी मुट्ठी से जाने कब फिसल के गायब हो गयी. रेत ऐसी ही तो होती है.
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