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किसान के बेटे को क्यों शहर में मजदूरी करनी पड़ती है

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए अभिषेक कुमार की कहानी 'सपनों का पौधा'

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फोटो - thelallantop
जून की तपती दुपहरी. लू से सराबोर हवाएं कोई अपना खाली पैर जमीन पर रख दे तो पांव पिघल जाएं. ऐसे कष्टकर समय में शंकर सुबह से ही खेत में मेहनत कर रहा है. आज तो उसने कलेवा भी नहीं खाया है. 'अपनी कोई फिकर है ही नहीं, जब तक कोई खुशामद न करे तब तक तो खाएंगे नहीं.' बसंती बड़बड़ाते हुए चली जा रही थी. बसंती शंकर के बचपन की सहेली थी. दोनों साथ-साथ गुड्डे-गुड़ियों का खेल खेल-खेलकर बड़े हुए थे. जब दोनों खेत में साग तोड़ने जाते तो शंकर मटर का फूल बसंती के बालों में लगा दिया करता था, कभी बसंती अपने घर से कोई पकवान छुपाकर लाती तो शंकर के साथ जरूर बांटती. लड़कपन में उनकी दोस्ती और गाढ़ी हो गई थी और अब तो वे दोनों एक-दूसरे की चिंता में भी घुलने लगे थे. बसंती की माई ने एक दिन कह दिया था बसंती से कि अब बड़ी हो गई हो, शंकर से मिलना-जुलना ठीक नहीं है. मगर आजाद परिंदों को कौन रोक सकता है. गांव भर में उन दोनों के बारे में चर्चा शुरू हो गई थी. शंकर छह फुट का लंबा-चौड़ा कसरती शरीर वाला युवक था जबकि बसंती बिल्कुल बसन्त ऋतु की तरह खुशगवार थी.
'मालिक! आज उपवास पर बैठे हैं क्या.' बसंती ने तंज कसते हुए शंकर से कहा. 'तू! तू यहां इत्ती धूप में क्यों आई? मैं तो आ ही रहा था." शंकर ने कहा. 'देखो हमको तुमसे कोई मतलब नहीं है. ऊ तो अम्मां परेशान थी, इसलिए हम तुमको बुलाने चले आए.' बसंती ने सीधे-सीधे कह दिया. बसंती का ताना शंकर को मीठा लगा. यह वही बसंती थी जो शंकर के मुम्बई जाने पर फफक-फफक के रोई थी. हर हफ्ते तीन-चार बार फोन करके हाल-चाल पूछ लेती थी. कभी दोनों ने एक-दूसरे को खुलकर तो नहीं कहा था लेकिन दोनों के दिल कहीं-न-कहीं एक ही बात सोचते रहते थे.
पिछले साल गांव में भयंकर सूखा पड़ा था. पूरी फसल बर्बाद हो गई थी. घर में खाने के लाले पड़े थे. गांव के और भी लोग अपने बीवी-बच्चों का पेट भरने की खातिर, अपनी डीह से दूर कमाने जा रहे थे. गांव में रहकर भूखों मरने से बेहतर था ज़िंदा रहने की कोशिश करना. शंकर भी उन्हीं लोगों के साथ मुम्बई चला गया. वहां उसे राजमिस्त्री का काम मिला. पैसे तो अच्छे मिल जाते थे लेकिन सुकून नहीं. ऊपर से ठेकेदार की डांट, गाली सुनकर वो चिड़चिड़ा हो गया था. बसंती की याद आती तो उसकी तस्वीर बक्से से निकालकर कभी-कभार रो लेता. गांव की सादगी शहर की रंगीनियों से बेहतर ही होती है. शहर एक तिलिस्म है, गांवों का अस्तित्व ही उस तिलिस्म का तोड़ है. गांव में शंकर अपनी मर्जी का मालिक था और बिल्कुल शान से खेती करता था. घर में केवल मां-बाबूजी थे, इसलिए खेती से उनका गुजारा ठीक ढंग से चल जाता था.
शहर में शंकर अधिक दिनों तक रह नहीं पाया.तन जरूर उसका शहर में दिखता किंतु मन और दिल अपने गांव में ही छोड़ गया था. छः महीने बाद उसका मन ऊब गया और शंकर उकताकर घर वापस लौट आया. अम्मा-बाबूजी में फिर से प्राणों का संचार होने लगा, अपने लाल को अरसे बाद देखकर वे बहुत खुश थे. बसंती तो शंकर से लिपटकर रोने लगी थी. उसने कसम दिलवाई कि अब कभी शंकर उसे अकेला नहीं छोड़ेगा. शंकर ने ठान लिया कि अब वो कभी कमाने के इरादे से शहर नहीं जाएगा.
जो कुछ भी पूंजी उसके पास थी, उसने खेती में लगा दी. महाजन से थोड़ा उधार भी लेना पड़ा. इस बार उसने दोगुनी मेहनत से खेतों की जुताई की, बीज बोये, पानी डाला, खाद छिड़के लेकिन सूरज देवता सब कुछ नष्ट करने पर तुले हुए थे. उनका प्रकोप इस बार कुछ अधिक भयानक था. बादलों का दूर-दूर तक कोई नामलेवा न था. इस बार शंकर ने कितने सपने अपने मन में बोये थे. फसल अच्छी होगी तो मां-बाबूजी को नए कपड़े दिलाऊंगा. अम्मा की साड़ी कित्ती पुरानी हो गई है... और बाबूजी! वो तो सात सालों से एक ही कुर्ता चला रहे हैं. और हां! इस बार बसंती का हाथ भी मांग लूंगा. बसंती का नाम मन में आते ही शंकर के तन-मन में गुदगुदी होने लगी थी. बसंती की अम्मा को अपनी बेटी के लिए कमासुत और खाते-पीते घर का लड़का चाहिए था. 'शंकर सब अहर्ताएं पूरी करेगा...' बसंती को पूरा भरोसा था शंकर पर. जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे शंकर के सपनों की लौ मद्धम होती जा रही थी. फसल को एक आसमानी बारिश की जरूरत थी लेकिन सूर्यदेव अपना ताप कम करने को तैयार ही नहीं थे. क्या फिर से उसे कमाने शहर जाना पड़ेगा? क्या बसंती किसी और के घर ब्याह दी जाएगी? क्या अम्मा-बाबू को नए कपड़े फिर नहीं दे पाउऊंगा? महाजन के कर्ज का क्या होगा? अनेकों सवाल एकसाथ जब उसके हृदय को कचोटते तो वो घबरा जाता. वो दूनी मेहनत से अपने काम में लग जाता. बसंती मन-ही-मन अपने इष्ट से शंकर की खातिर दुआएं करती थी. आज सुबह से बसंती बहुत गुस्से में थी. अम्मा ने कारण पूछा तो उसने अम्मा की ओर गुस्से से देखा. दरअसल, शंकर ने बसंती को कल शाम एक चिट्ठी दी थी और कहा था, 'घर जाकर इसको खोलना..' शंकर ने मानो कुछ ठान लिया हो. बसंती चिट्ठी पढ़ कर अवाक रह गई. उसके मुंह से कोई शब्द नहीं निकल पा रहा था. चिट्ठी में शंकर ने अपने सपनों का जिक्र किया था और बसंती को कहीं और ब्याह करने की सलाह भी दे डाली थी.
अगली सुबह जल्दी से उठकर वह शंकर के घर की तरफ गई. शंकर आज पहले ही खेत पर चला गया था. भनभनाते हुए जब वो खेत पर पहुंची तो वहां शंकर नहीं था. उसका दिल भर आया और किसी अनहोनी की आशंका से वो घबरा उठी. आगे जाकर देखा तो एक व्यक्ति एक पेड़ पर रस्सी बांध रहा था,
वो शंकर ही था. बसंती का गला सूख गया फिर भी वो जोर लगाकर चिल्लाई, 'शंकर..!' शंकर चौंका, उसने मुड़कर बसंती की तरफ देखा. शंकर अपराधी भाव से रस्सी छोड़कर खड़ा हो गया. दोनों एक-दूसरे की ओर देखकर बुत बने खड़े रहे, सन्नाटे का साम्राज्य पसर गया था उस समय.

“खामोशियां बड़ी घटनाओं की आहट देती हैं.”

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तभी दिन कुछ धुंधला पड़ने लगा. बादलों का शोर सुनाई देने लगा था. बिजलियों की फ्लैश लाइटें उस दृश्य को अमर बनाने पर तुली हुई थीं. दो-तीन मिनटों के बाद ही बारिश की बूंदें पड़ने लगीं थीं. सारे गिले-शिकवे धुल-धुलकर बहने लगे थे. जो कुछ भी कहना-सुनना था, बारिश की चमत्कारी बूंदों ने कह दिया था. शंकर के सपनों का पौधा पानी के छीटें पाकर फिर से हरा होने लगा था.

केजरी-एजरी सब नए लउंडे-लपाड़ी हैं, मोदी दमील है

 

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