The Lallantop

जानिए, कैसे दलबदल के घोड़े पर दौड़ रही बंगाल की राजनीति

पश्चिम बंगाल की राजनीति में दलबदल एक नई कड़ी है

Advertisement
post-main-image
बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय और ममता बनर्जी
हमारे देश में दलबदल की राजनीति कोई नई बात नहीं है. अक्सर चुनाव से पहले ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं. 1967 में हरियाणा के गया लाल (Gaya Lal) ने एक ही दिन में तीन बार अपनी पार्टी बदल डाली थी. इसके बाद साल 1985 में हमारे संविधान के दसवें अध्याय में दलबदल विरोधी क़ानून को शामिल किया गया. ख़ैर! फ़िलहाल दलबदल की खबरें पश्चिम बंगाल (West Bengal) से सबसे ज़्यादा सुनने को मिल रहीं हैं. ज़ाहिर है वहां चुनाव होने हैं. लेकिन दलबदल पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में नई कड़ी है. इसका एक कारण 34 साल तक वाममोर्चे का शासन भी है. लेकिन साल 2013 से दलबदल का शुरू हुआ सफ़र अब तक थमने का नाम ही नहीं ले रहा. दलबदलू नेताओं के की वजह से सभी पार्टियों को काफ़ी राजनीतिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. तो आइए पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास की इस नई कड़ी को समझने की कोशिश करते हैं. West Bengal Assembly Assembly Election 2021 ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद हुई शुरुआत बंगाल में दलबदल की कुछ घटनाओं को छोड़ दें तो बड़े पैमाने पर इसकी शुरुआत साल 2013 से होती दिखाई देती है. साल 2014 के लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र यह सिलसिला शुरू हुआ. ममता दीदी को सत्ता में क़ाबिज़ हुए 2 साल हो चुके थे. राज्य में तृणमूल और कांग्रेस पार्टी के गठबंधन में सरकार चल रही थी. लेकिन कांग्रेस पार्टी से तृणमूल में शामिल होने का सफ़र भी शुरू हो गया था. 2014 लोकसभा चुनाव आते-आते क़रीब 9 कांग्रेसी विधायक तृणमूल में शामिल हो चुके थे. इनमे कई नामी नेता थे, लेकिन सौमित्र खां का ज़िक्र यहां ज़रूरी है. सौमित्र खां बिशनुपर सीट से कांग्रेस के विधायक थे. वो लोकसभा चुनाव 2014 से पहले तृणमूल में शामिल हुए, सीट जीती और सांसद बन गए. 2019 में महाशय बीजेपी में शामिल हुए और फिर उसी सीट से सांसद चुने गए. इसके अलावा वाम पार्टियों में से सीपीएम (CPM) और ऑल इंडिया फ़ॉर्वर्ड ब्लॉक (AIFB) के एक-एक और रेवलूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) के दो विधायक तृणमूल में शामिल हो गए थे. फ़ॉर्वर्ड ब्लॉक के नेता और वर्धमान ज़िले की गलसी सीट से विधायक सुनील मंडल का नाम लेना यहां ज़रूरी है. सुनील मंडल जी वही नेता हैं, जो 2014 और फिर 2019 में पूर्वी बर्धमान सीट से तृणमूल की टिकट पर सांसद चुए गए. हां और आपको याद दिला दें मंडल जी गृह मंत्री अमित शाह द्वारा बीजेपी की सदस्यता ग्रहण करने वाले हालिया नेताओं में से एक हैं. दलबदल हुई आम बात हाल ही पाला बदलने वाले नेताओं की खबरों से तो आप वाक़िफ़ ही होंगे. और पुराने कुछ उदाहरण भी आपने अभी पढ़े. इससे एक बात तो साफ़ होती है कि वैकल्पिक राजनीति का केंद्र माने जाने वाला बंगाल मुख्यधारा के राजनीतिक टोटकों को अपना चुका है. ऐसा इस वजह से कहा जा सकता है क्योंकि नेताओं के दल बदलने का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. रोज़ नई खबरें आ रहीं हैं.
ज्ञात हो ये वही पश्चिम बंगाल है जिसके मुख्यमंत्री ज्योति बसु को 1996 में प्रधानमंत्री बनने से उनकी पार्टी सीपीएम ने रोक दिया था. लेकिन ज्योति बसु ने मरते दम तक सीपीएम का दामन थामे रखा.
नेताओं का बीजेपी में शामिल होना ज़्यादातर तृणमूल और थोड़ी बहुत अन्य पार्टियों से बीजेपी में शामिल होने का सिलसिला ज़्यादा पुराना नहीं है. 2016 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने महज़ 10.3% वोट ही लिए. लेकिन पार्टी ने बंगाल में अपना विस्तार करना शुरू कर दिया था. 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी के खेमे में तृणमूल के कई अहम नेता शामिल हो चुके थे. जिनमे से सबसे बड़ा नाम मुकुल रॉय का था. ये भारत के पूर्व रेल मंत्री और ममता बनर्जी से सेकंड इन कमांड माने जाते थे. रॉय के बीजेपी में जाने से तृणमूल को बड़ा धक्का लगा था. उसके बाद सीपीएम के विधायक और आदिवासी नेता खगेन मुर्मू, तृणमूल सांसद अनुपम हज़रा, सौमित्र खां और विधायक अर्जुन सिंह सब एक-एक कर बीजेपी का दामन थामने लगे. और इन्हें इसका लाभ भी मिला, खगेन, अर्जुन सिंह और सौमित्र अब बीजेपी सांसद हैं. हाल के उदाहरण कई हैं और उन पर काफ़ी खबरें आपने पढ़ी होंगी, जैसे की सुवेंदु अधिकारी, उत्तर बंगाल के तृणमूल नेता मिहिर गोस्वामी आदि. ये सारी राजनीतिक आवाजाही राज्य में बीजेपी की बढ़ती ताक़त की तरफ़ इशारा करती हैं. दलबदल के राजनीतिक मायने लेकिन दलबदलू नेताओं को पार्टी में शामिल कराना हमेशा फ़ायदेमंद साबित हुआ है, ऐसा नही है. इसके उलट भी कई उदाहरण हैं. इसको समझने के लिए अलग-अलग पार्टियों में इससे हुए बदलावों को देखते हैं: कांग्रेस दलबदल का सबसे ज़्यादा नुक़सान कांग्रेस पार्टी को हुआ है. अगर हम बंगाल में सिर्फ़ 2016 के विधानसभा चुनाव से अब तक की बात करें तो, 44 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के पास अब महज़ 27 विधायक बच गए है. बाक़ी 17 तृणमूल में शामिल हो चुकें हैं. इनमे से सबसे बड़ा नाम पूर्व प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे मानस रंजन भुइयां हैं. भुइयां 2016 में सबंग सीट से विधायक चुने गए. चुनावों के कुछ ही महीनों के बाद वो तृणमूल ने शामिल हो गए. तृणमूल ने उन्हें राज्यसभा सीट से नवाज़ा. 2016 में कांग्रेस ने वामपंथी पार्टियों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाया और उसका क्या हश्र हुआ ये हम सब जानते हैं. ममता दीदी ने दोबारा सरकार बनाई और 294 सीटों में से 211 सीटों में जीत दर्ज़ की. सीपीएम 34 साल तक बंगाल में सत्ता पर बने रहने वाली पार्टी सीपीएम ने 2019 में महज़ 6% वोट हासिल किए और एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं रही. सीपीएम के बड़े नेता जो पार्टी छोड़ चुकें हैं उन नामों में अब्दुल रज़ाक़ मोल्ला, लक्ष्मण सेठ, खगेन मुर्मू, छाया डोलोई जैसे नाम शामिल हैं. यह लिस्ट ज़्यादा लंबी नही है. लेकिन सीपीएम के वोटों की एक मुश्त बीजेपी में शिफ़्ट हो जाना पार्टी के लिए विशेष चिंता का विषय है. और ख़ासकर सीपीएम जैसी पार्टी जो एक ख़ास विचारधारा पर चलने वाली “काडर” आधारित पार्टी है. तृणमूल कांग्रेस के बाद दूसरा नंबर तृणमूल का है. ममता दीदी के ख़ास नेताओं के बीजेपी में शामिल होने की लिस्ट अब बहुत लंबी हो गई है. पार्टी के महत्वपूर्ण पदों और दायित्व संभालने वाले लोग अब बीजेपी के महत्वपूर्ण पदों पर हैं. इससे तृणमूल को सीटों का नुक़सान तो हुआ ही है, साथ ही पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक भी नेताओं के साथ ही चले गए. ऐसा किसी भी व्यक्ति आधारित पार्टी से होना लाज़मी है, इसमें कोई नई बात नहीं है. बीजेपी बीजेपी की बंगाल में एंट्री ममता दीदी ने ही करवाई थी. साल था 1999 का और मौक़ा था लोकसभा चुनाव. बीजेपी और तृणमूल ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था. बीजेपी ने दो लोकसभा सीटों में जीत दर्ज़ की. फिर 2004 में वापस शून्य पर आ गई. पार्टी को दोबारा अपने प्रदर्शन को दोहराने में बीजेपी को 12 साल लग गए. लेकिन 2016 के बाद से ही बीजेपी ने तृणमूल पर निशाना साधना शुरू कर दिया था. आरोप कई थे, घोटालाख़ोरी, आतंक, सिंडिकेट राज, आदि. लेकिन ज़िन नेताओं को बीजेपी टार्गेट कर रही थी वो दागदार नेता बीजेपी के गोद में आ बैठे. ऐसे ही दाग़दार नेता जिनकी धुलाई बीजेपी ने की है वो आज बंगाल चुनाव में उनके लिए सबसे अहम भूमिका निभाते दिख रहे हैं. मुकुल रॉय, सुवेंदु अधिकारी और भी कई हैं. दलबदल के कारण पार्टी को राजनीतिक हिंसा का सामना भी करना पड़ा है. बंगाली अख़बारों में अक्सर तृणमूल और बीजेपी की झड़प की ख़बर आपको देखने को मिलेंगी. कई लोग मारे भी गए हैं. मारे जाने वालों में सबसे ज़्यादा वो लोग हैं जो तृणमूल छोड़ बीजेपी में शामिल हुए थे. पार्टी के अंदर भी तृणमूल नेताओं की भर्ती का विरोध हुआ है. आसनसोल के सांसद बाबुल सुप्रियो ने तो कई नेताओं के तृणमूल से इस्तीफ़ा देने और बीजेपी में शामिल होने की खबरों के बाद अपने आधिकारिक फ़ेसबुक अकाउंट से एक वीडियो जारी करते हुए यह कह दिया, “वो मन से इन नेताओं का बीजेपी में शामिल होना नहीं मान सकते.” जिसके बाद जितेंद्र तिवारी को तृणमूल में वापस लौटना पड़ा. हाल ही में बीजेपी के बंगाल प्रभारी कैलाश वजयवर्गी ने दावा किया था कि उनके पास 41 तृणमूल विधायकों की सूची है. अगर सारे विधायकों को वो बीजेपी में शामिल कर लें तो ममता दीदी की सरकार गिर जाएगी. लेकिन फिर उन्होंने सफ़ाई देते हुए कहा कि दाग़दार छवि वाले नेताओं को बीजेपी में कोई जगह नहीं मिलेगी. कुल मिलाकर बीजेपी के खेमे में आए नेताओं से बीजेपी को फ़ायदा तो ज़रूर हुआ इसमें कोई दो राय नहीं है. लेकिन पार्टी के अंदर और बाहर, हर जगह तीखी आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा है.  

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement