अब इन लड्डुओं की फ़ूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड एक्ट, 2006 के तहत जांच की जाएगी. मूर्ति का कहना है कि जो लोग इन्हें बनाते हैं वो ड्रेस में नहीं होते हैं. किचेन में काफी गर्मी होती है. उनके शरीर से पसीना निकलता रहता है. उनके हाथ भी गंदे होते हैं. वो दस्ताने वगैरह नहीं पहनते. जिस जगह ये लड्डू बनते हैं, वो भी नियमों के हिसाब से फिट नहीं है. इनके पास तिरुपति में लड्डू बनाने का लाइसेंस भी नहीं है. अब इस पर भी जांच होगी.
किसलिए फेमस हैं ये लड्डू?
इन लड्डुओं को तिरुपति बालाजी की पहचान माना जाता है. इहें प्रसादम कहा जाता है. इन्हें शुद्ध देसी घी से बनाया जाता है. इन लड्डुओं का इतिहास 300 साल पुराना है. माना जाता है इन्हें पहली बार 2 अगस्त, 1715 को बनाया गया. यहां तीन तरह के लड्डू बनते हैं. पहले, अस्थानम लड्डू. जिन्हें त्यौहारों के लिए बनाया जाता है. दूसरे, कल्याणोत्सव लड्डू (कल्याणोत्सवम में बनने वाले) और तीसरे प्रोक्थम लड्डू जिन्हें रोज आने वाले भक्तों को दिया जाता है. दिन में पांच बार इनसे भोग लगाया जाता है, जिसे नैवेद्यम कहते हैं. पहली बार पल्लवों ने प्रसादम की शुरुआत की थी. फिर देवारय द्वितीय ने इसका भोग लगाना शुरू किया. विजयनगर के राजाओं के समय में प्रसादम को तिरुप्पोंगम और अवसारम कहा जाने लगा. तब तक इसे बूंदी की तरह अलग-अलग ही बांटा जाता था. लड्डू के रूप में ये 1940 में आए. इन लड्डुओं को वडई के साथ दिया जाता है.
कैसे मिलते हैं ये लड्डू?
ये लड्डू ऐसे ही नहीं मिल जाते जैसे लाइन में लगकर लोग भंडारे वाला हलवा खा लेते हैं. यहां पहले दो लड्डू 10-10 रूपये के मिलते हैं. इसके बाद के दो लड्डू लेने के लिए आपको 25-25 रूपए खर्च करने होंगे. इसके लिए लाइन लगानी पड़ती है और पहले कूपन लेना पड़ता है. ये कोई आम कूपन नहीं होता. इस कूपन में सिक्योरिटी कोड और बायोमेट्रिक डेटा होते हैं.
कैसे बनते हैं ये?
इस लड्डू को शुद्ध देसी घी के साथ चने के बेसन, मक्खन, चीनी, काजू, किशमिश और इलायची से बनाया जाता है. इनको बनाने की रेसिपी तीन सौ साल पुरानी है, जो कुछ ख़ास लोगों को ही पता होती है.
जिस किचेन में ये लड्डू बनते हैं, उसे 'पोटू' कहते हैं. यहां हर दिन लगभग तीन लाख लड्डू तैयार होते हैं. ये सारे लड्डू एक ही साइज और वजन के होते हैं. इस तरह का स्पेशल लड्डू 750 ग्राम तक का हो सकता है. जिसकी कीमत 100 रुपए तक हो सकती है. सामान्य लड्डू 175 ग्राम तक होते हैं. ये 25 रुपए तक मिलते हैं.
और क्या ख़ास है इनमें?
इन लड्डुओं को जीआई (GI) टैग मिला हुआ है. यानी ज्योग्राफिकल इंडिकेशन. इसे ये टैग 2009 में मिला. इससे कोई चीज किसी ख़ास जगह से जुड़ जाती है और वही उस जगह की पहचान होती है. इन चीजों की नक़ल नहीं की जा सकती. ये टैग शैम्पेन, दार्जिलिंग टी को भी मिला हुआ है. इस मंदिर के किचेन में सिर्फ लड्डू ही नहीं, करीब सवा लाख तीर्थयात्रियों के लिए खाना भी बनता है. यहां ग्यारह सौ से ज्यादा लोग काम करते हैं. इस किचेन को चलाने के लिए मंदिर के पास दस करोड़ का बजट है. यहां आने वाले लोगों का मानना है कि ये लड्डू खाने से ही यहां की तीर्थ यात्रा पूरी होती है.
इस मंदिर का बोर्ड तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम है. 2015 में तिरुपति लड्डुओं की डायमंड जुबली मनाई गई. 2016-17 के मंदिर के बजट में बताया गया कि लड्डू की वजह से 175 करोड़ रुपये मंदिर में आये. टिकट, मिठाइयों की बिक्री में हर साल 20 से 30 फीसदी बढ़ोत्तरी हो रही है. 2010 में दर्शन और लड्डू को बुक कराने के लिए ऑनलाइन व्यवस्था की गई.
देखिए, कैसे बनते हैं वहां पर लड्डू-
https://www.youtube.com/watch?v=_m-YiZFZiZ8 ये स्टोरी निशान्त ने की है.

















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