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डराने वाली देशभक्ति का छोटा रिचार्ज कितने का है?

सवाल इतना ही नहीं और भी हैं? जैसे देश को खतरा किससे है? इंसाफ को कौन कंट्रोल कर रहा है? और जवाब सिर्फ आप जानते हैं.

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फोटो - thelallantop
बहुत चिल्ड आउट आदमी हूं. कोई तकलीफ मेरे ऊपर कुंडली जमा कर नहीं बैठ पाती. कोशिश करता हूं हमेशा हंसते रहने की. दुखी होने की कोई वजह भी नहीं है. लेकिन अचानक एक खयाल आता है और मैं डर जाता हूं. वो डर का एहसास जो कई साल पहले खत्म हो गया था, अचानक पता नहीं कहां से आ धमका. उसकी वजह क्या है. आगे तफ्सील से बताता हूं. मैं बचपन में डरता था. सांप से, अंधेरे से, भूतों से, बच्चा पकड़ने वाले गिरोहों से, सन्नाटे से. लेकिन फिर धीरे धीरे सब डर गायब हो गए. ऐसा दौर आया कि दिमाग ने ये मान लिया था कि ये डर वर सब टूचियापा है. आदमी में जिगरा है तो कोई साला कुछ उखाड़ नहीं सकता. दुनिया को भुनगे भर समझने के चक्कर में बेतहाशा भागा जा रहा था कि आज एक दोस्त ने औकात याद दिला दी.
उसका फोन आया सोनीपत हरियाणा से. बताया कि "भाई 3 दिन हुए, कमरे से नहीं निकला. फैक्ट्री भी नहीं गया काम करने. पता नहीं बची कि फूंक दी गई." मैं एक पल को सिहर गया. ये मेरे बचपन का दोस्त. हमने कोई 12 साल एक साथ पढ़ाई की. इतना वक्त साथ बिताने वाला साथी कहां मिलता है आसानी से. उसके साथ अभी तक कुछ बुरा नहीं हुआ. उम्मीद है आगे भी नहीं होगा. लेकिन उसने मुझे बचपन के उस एहसास में ला खड़ा किया है कि डर से पत्ते की तरह कंपकपा जाएं.
भीड़ के हाथ इंसाफ है. भीड़ कभी बचाने नहीं आती. बचाने वाले एक दो ही निकलते हैं. भीड़ सिर्फ फैसला करती है. दिल्ली में भीड़ बेतहाशा है. बदहवास भीड़. अगर कोई आदमी पीछे से चिल्ला दे कि "वो मेरा पर्स लेकर भागा". तो तुम्हारे जिस्म पर खाल शायद ही रह जाए. कोई पूछेगा नहीं तुमसे कुछ. तुम्हारा पक्ष, तुम्हारी सफाई सब बत्ती बना कर रख लो. यहां जो भीड़ कह दे वही सही है. वो भीड़ चाहे आरक्षण मांगने वालों की हो या देशभक्ति मीटर्स की. देशभक्ति मीटर्स नए फैशन की चीज हैं. बदहवास भीड़ का एक हिस्सा, जो देशभक्ति का स्टॉकिस्ट बन गया है. अगर कहीं कोई फिल्म देखने गए हो. वहां राष्ट्रगान बज जाए और आपके उठने तक खत्म हो जाए. वैसे तो वो 52 सेकेंड का होता है लेकिन कोई हमेशा तैयार नहीं रहता. तो भीड़ जो फिल्म देखने आई है, वो आपको 'देख लेगी'. वहीं पकड़ कर पेल सकती है. आपके पास न कोई एक्सक्यूज न कोई बहाना होगा. हर हाल में पिट कर वापस आना होगा. कोई सध ले कि देशद्रोही घोषित करना ही है तो आप लोटा लेकर खेत में बइठे होगे. वो राष्ट्रगान बजा देगा.
ये नए किस्म की देशभक्ति है. चौराहे पर खड़ा कोई भी उचक्का आपसे आकर कह सकता है. यहां खड़े होना है तो भारत माता की जय बोलो. नहीं तो तुम देशद्रोही हो. और मेरी देशभक्त सेना तुमको कूट देगी. क्या करोगे तुम? बेट्टा यहां देशभक्ति के नाम पर कातिया का कुत्ता बनाने की होड़ मची है. वो कहें तो भौंको, वो कहें तो काटो. उनके पास कोई अद़श्य पैमाना भी होगा देशभक्ति मेजरमेंट करने का. डेढ़ सौ वंदेमातरम प्रति 15 किलो देशभक्ति. या डेसिबल में नापते होंगे. 200 डेसिबल की आवाज में भारत माता की जय= देशभक्ति का एक घंटा. फिर ये देशभक्ति खत्म भी होती होगी. उसका रिचार्ज भी कराना होगा. सबसे छोटा रिचार्ज कित्ते का है?
ये स्थिति उन डंडे और झंडे वालों के लिए फनी है. लेकिन हमारे लिए डरावनी है. क्योंकि हमारे लिए देशभक्ति दांत चियार कर पसार देने वाली चीज नहीं है. और ईमानदारी से कहें तो हम हैं भी नहीं देशभक्त. किसी भी देश में, जाति में, धर्म में, कालखंड में पैदा होने पर हमें गर्व क्यों होगा? क्या हमने वो कमाया है? वो तो कुदरत ने हमें जहां धकेला हम वहां के हो गए. सच्ची बात तो ये है कि अपने धर्म, जाति, देश पर गर्व करने वाले किसी न किसी हीन भावना से दबे हैं बॉस. हमें अपने देश से, जमीन से प्यार है. जिससे आप प्यार करते हो उससे रूठ सकते हो. झगड़ सकते हो. अपनी जिद मनवा सकते हो. हमारे लिए देश सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है नक्शे में खिंचा. उससे बहुत आगे की चीज है. अब पूछोगे कि हमें किस पर गर्व है? तो भैया अभी तक कोई काम गर्व करने वाला किए नहीं हैं हम. कर लेंगे तो गर्व हो जाएगा. थोड़ा बहुत, KB या MB में नप जाने लायक गर्व होगा तो अपनी मानवता पर. जो किसी देश, काल, जाति या धर्म में बंधी नहीं. दुनिया के इस छोर से उस छोर तक पसरी इंसानियत जो है. हमें गर्व है उस पर. और कौन तय करेगा कि नारे देशभक्ति का मानक हैं? अगर कोई चीख चीख कर भारत माता की जय नहीं बोलता तो वो देशद्रोही कैसे हो गया. और कैसे यकीन किया जाए कि जो वंदेमातरम बोल रहा है वो देशभक्त है. अगर कोई आतंकी भारत माता की जय बोल दे तो उसे क्या कहोगे? भैया साफ बात है. आपको पैमाने बदलने होंगे. नारों से डराना बंद करना होगा. देश को खतरा नारों से नहीं है. किसी यूनिवर्सिटी से नहीं है. देश को सबसे बड़ा खतरा है डरे हुए जाहिल आदमी से. तो किसी को डराओ मत. डर में बावला आदमी तुम्हारी भीड़ पर भारी पड़ सकता है. जिस हिंदू संस्कृति की तुम बात करते हो. उसी संस्कृति से संस्कृत का वो श्लोक हमने पढ़ा बचपन में. तुमने भी पढ़ा होगा. लेकिन मुझे याद रह गया. चलो फिर से रिवाइज कर लो.
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानाम्तु वसुधैव कुटुंबकम्।।
इसे हिंदी में कहेंगे- ये मेरा है, ये उसका है, ऐसी गिनती छोटे दिल वाले, मने छोटी सोच वाले करते हैं. विशाल चरित्र वालों के लिए तो पूरी दुनिया ही उनका परिवार है.

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