ये आर्टिकल Daily-O में हेमेंदर शर्मा ने लिखा था.
...अगर ऐसा है, तो पंजाब में केजरीवाल का जीतना खतरनाक है
अन्ना से शुरू होकर अब ये चीज यहां पहुंच गई है.
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फोटो - thelallantop
16 अगस्त 2011 को अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में जनलोकपाल बिल के लिये अपना ऐतिहासिक आंदोलन शुरू किया था. इसके कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र मुझसे मिलने आये. वो आरएसएस के प्रचारक रह चुके थे. उस वक्त मैं अन्ना हजारे और India Against Corruption (IAC) के लिये खुल के समर्थन कर रहा था. मेरे प्रचारक दोस्त बोले कि वो मुझे इस बात की बधाई देने आये थे. मेरे लिये ये सरप्राइजिंग था. थोड़ा खोदने के बाद उन्होंने बताया कि उज्जैन में एक सीक्रेट मीटिंग है. संघ के टॉप लोगों की. संघ ने अन्ना को फुल सपोर्ट देने का प्लान बनाया है. कांग्रेस को करप्शन पर घेर देना है इसके माध्यम से. पर ये लोग अपने बैनर से ये काम क्यों नहीं कर रहे थे. बीजेपी क्यों बाहर थी इससे. मेरे दोस्त के पास तर्क था. लास्ट इलेक्शन में आडवाणी जी ने करप्शन को मुद्दा बनाया था. काले धन के ऊपर देश में यात्रा भी की. पर लोगों की नजर में बीजेपी और कांग्रेस में ज्यादा फर्क नहीं था. क्योंकि बीजेपी शासित राज्यों में भी करप्शन था. तो प्लान यही था कि कांग्रेस को बेइज्जत कर दिया जाये. और बीजेपी को इससे बाहर ही रखा जाये. मैंने तर्क दिया कि India Against Corruption (IAC) के पीछे अरविंद केजरीवाल का दिमाग है. जो कि स्मार्ट आदमी है. और आरएसएस को अन्ना आंदोलन को हाईजैक नहीं करने देगा. फिर प्रशांत भूषण भी थे. देश को तलाश थी एक ऑल्टरनेटिव की जो कांग्रेस और बीजेपी दोनों से अलग हो. मेरा दोस्त हंसने लगा और बात खत्म हो गई. जैसे-जैसे अन्ना का आंदोलन बढ़ा इस चीज को मिस करना मुश्किल था. अन्ना के पीछे बैठे उनकी टीम के लोग भारत माता चिल्लाते. फिर वहां आरएसएस के नेता राम माधव और तरुण विजय का स्वागत हुआ. कैडर के लोग खाकी शॉर्ट पहने बिना आये थे. मैंने अपने आर्टिकल में इस चीज को लिखना शुरू किया कि कैसे आरएसएस के लोग India Against Corruption (IAC) में घुसे जा रहे थे. नरेंद्र मोदी ने आंदोलन जॉइन तो नहीं किया था लेकिन अन्ना ने जरूर कहा था कि वो नरेंद्र मोदी के काम से खुश हैं. फिर जन्म हुआ आम आदमी पार्टी का. अन्ना लड़खड़ाते रहे इनको लेकर. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में सरकार बना ली. और इंडिया में सरकार बनाने की सोचने लगे. 56 दिन में दिल्ली की सरकार छोड़ दी. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की खटिया खड़ी हो गई. अरविंद केजरीवाल के ड्रामे के बाद आम आदमी पार्टी भी निपट गई. उसके बाद इतिहास बन गया. फिर 2015 का दिल्ली चुनाव आया. एंटी-बीजेपी और एंटी-मोदी वोट पड़े. आम आदमी पार्टी के लिये सब लोग पिच करने लगे. इतना कि कांग्रेस के एक सपोर्टर ने अपने ही पार्टी के कैंडिडेट से कहा कि भाई साहब, आपको वोट दें तो बर्बाद ही जायेगा. बीजेपी को फायदा हो जायेगा इससे. और अरविंद केजरीवाल को लगा कि पांच साल केजरीवाल ने ये काम कर दिखाया है. दिल्ली की ये जीत उनके दिमाग में घुस गई. जो उनको प्रश्न करता, पार्टी से बाहर भगा दिया जाता. प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को बाउंसर लगा के हटा दिया गया. केजरीवाल का टेप भी आया जिसमें वो योगेंद्र यादव को गाली दे रहे थे. अरविंद ने वो हर काम किया जिसके खिलाफ उन्होंने खड़ा होने की बात की थी. और अब वो पंजाब का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं. बैकडोर से. आरोप हैं कि उनको खालिस्तानियों ने घूस दी है. ये गंभीर आरोप हैं. एक बॉर्डर स्टेट में ये चीज खतरनाक है. आने वाले दिनों में पंजाब को अरविंद केजरीवाल से सतर्क रहने की जरूरत है.
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