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गोद लिए बेटे को सरकारी नौकरी मिल सकती है? हाईकोर्ट ने हिंदू कानूनों का हवाला देते हुए दिया फैसला

Orissa High Court ने कहा कि हिंदुओं में आम तौर पर यह मान्यता है कि बिना बेटे के व्यक्ति को ‘स्वर्ग और मोक्ष’ नहीं मिलता है और इसी से ‘गोद लेने’ की प्रथा का जन्म हुआ है. कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की.

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कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की. (सांकेतिक फोटो: आजतक)

ओडिशा हाईकोर्ट (Orissa High Court) ने रेलवे से जुड़े एक मामले पर अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने हिंदू कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि गोद लेने का दस्तावेज अगर कर्मचारी की मौत के बाद रजिस्टर्ड हुआ हो, तो इससे दत्तक पुत्र की वैधता खत्म नहीं होती.

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क्या है पूरा मामला?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, के. साधु पात्रा रेलवे में टेक्नीशियन थे. साल 2008 में ड्यूटी के दौरान उनकी मौत हो गई. इसके बाद उनके दत्तक पुत्र ने अनुकंपा नियुक्ति (compassionate appointment) के तहत नौकरी की मांग की. रेलवे ने यह कहकर मांग खारिज कर दी कि गोद लेने का रजिस्ट्रेशन 2010 में हुआ, यानी कर्मचारी की मौत के बाद.

‘अनुकंपा नियुक्ति’ के तहत जब किसी सरकारी कर्मचारी की सर्विस के दौरान मौत हो जाती है, तब उसके परिवार के किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी मिलती है.

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दत्तक पुत्र ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में मामला दायर किया. CAT ने रेलवे का फैसला रद्द कर दिया और रेलवे को 60 दिन में दोबारा मामले पर विचार करने का आदेश दिया. इसके बाद रेलवे ने ओडिशा हाईकोर्ट में रुख किया और CAT के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की.

कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस दीक्षित कृष्ण श्रीपाद और जस्टिस सिबो शंकर मिश्रा की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि हिंदुओं में आम तौर पर यह मान्यता है कि बिना बेटे के व्यक्ति को ‘स्वर्ग और मोक्ष’ नहीं मिलता है और इसी से ‘गोद लेने’ की प्रथा का जन्म हुआ है. 

कोर्ट ने कहा कि रेलवे कर्मचारी ने 2003 में बेटे को गोद लिया था. जबकि दस्तावेज 2010 में रजिस्टर्ड हुआ. कोर्ट ने रेलवे की उस पॉलिसी पर भी ध्यान दिया, जिसमें यह प्रावधान था कि अनुकंपा नियुक्ति (compassionate appointment) के लिए कर्मचारी की मौत से पहले गोद लेने की प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है. 

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लेकिन कोर्ट ने आगे कहा, 

गोद लेने का दस्तावेज बाद में रजिस्टर्ड होना, गोद लेने की वैधता को खत्म नहीं करता.

अपने 6 जनवरी के आदेश में, हाईकोर्ट ने CAT के आदेश को सही ठहराया और रेलवे को निर्देश दिया कि वह दो महीने के भीतर दत्तक पुत्र को नौकरी देने के मामले पर दोबारा विचार करे. 

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