भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी भी केस में ट्रायल के दौरान लंबे समय तक कैद रहने के बाद आरोपी अगर बरी भी हो जाए तो कैद में बिताए वक्त की भरपाई नहीं की जा सकती. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एक चर्चा के दौरान उन्होंने ये बातें कहीं. हालांकि, जेल में बंद एक्टिविस्ट उमर खालिद का नाम आने पर पूर्व सीजेआई ने एहतियात बरतते हुए साफ किया कि वो अपने देश के न्यायालय की आलोचना नहीं कर रहे हैं. बता दें कि उमर खालिद को लंबे समय से जमानत नहीं मिली है और 5 साल से ज्यादा वक्त से जेल में बंद हैं. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी थी.
'जल्द सुनवाई संभव नहीं तो जमानत मिले,' उमर खालिद के जिक्र पर पूर्व CJI चंद्रचूड़ क्या बोले?
Umar Khalid पर बात करते हुए पूर्व CJI DY Chandrachud ने तर्क दिया कि संवैधानिक सिद्धांत पूरी तरह साफ है. उन्होंने कहा कि अगर मुकदमे उचित समय के भीतर पूरे नहीं होते हैं तो जेल में रहना ही सजा बन जाता है.


18 जनवरी 2026 को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सीनियर जर्नलिस्ट वीर सांघवी ने पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ से बात की. 'न्याय के विचार' सत्र में बोलते हुए पूर्व CJI ने कहा कि भारतीय कानून की नींव 'निर्दोषता की धारणा' पर टिकी है. पूर्व चीफ जस्टिस ने जोर दिया कि ‘जमानत एक नियम होना चाहिए, अपवाद नहीं.’ इंडिया टुडे से जुड़े देव अंकुर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा,
हर आरोपी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक वह दोषी साबित ना हो जाए.
पूर्व CJI ने आगे कहा,
अगर कोई व्यक्ति पांच या सात साल तक अंडरट्रायल कैदी के तौर पर जेल में रहता है और आखिरकार बरी हो जाता है तो बीते हुए सालों की भरपाई नहीं की जा सकती.
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने आगे बताया कि जमानत सिर्फ तीन स्थितियों में ही नामंजूर की जा सकती है.
1. जब आरोपी समाज के लिए गंभीर खतरा हो.
2. जब आरोपी के भागने का खतरा हो.
3. जब आरोपी द्वारा सबूतों से छेड़छाड़ करने की संभावना हो.
इंडिया टुडे से जुड़ीं रौशनी चक्रवर्ती की खबर के अनुसार, खालिद की लगातार हिरासत का मुद्दा उठा तो एक्स-CJI चंद्रचूड़ ने एहतियात बरतते हुए जवाब दिए. उन्होंने कहा,
मैं अपने न्यायालय की आलोचना नहीं कर रहा हूं.
उन्होंने माना कि सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व करने की वजह से वे मामलों पर टिप्पणी करने में हिचकिचा रहे थे. उन्होंने जोर देकर कहा कि जजों को सबूतों और उनके सामने रखे गए मटेरियल के आधार पर जमानत का फैसला करना चाहिए, न कि जनता के दबाव या बाद के नतीजों की सोच के आधार पर. पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने तर्क दिया कि संवैधानिक सिद्धांत पूरी तरह साफ हैं. उन्होंने कहा कि अगर मुकदमे उचित समय के भीतर पूरे नहीं होते हैं तो जेल में रहना ही सजा बन जाता है. उन्होंने कहा,
आर्टिकल 21 के तहत जीवन के अधिकार में जल्द सुनवाई का अधिकार शामिल है.
इस बात पर जोर देते हुए कि जमानत को प्रतिबंधित करने वाले कानून भी संवैधानिक गारंटी को खत्म नहीं कर सकते, उन्होंने कहा,
अगर मौजूदा हालात में जल्द सुनवाई मुमकिन नहीं है तो जमानत नियम होना चाहिए. अपवाद नहीं.
उन्होंने इस सोच को खारिज कर दिया कि जमानत के फैसले अपने आप राष्ट्रीय सुरक्षा के दावों के आगे झुक जाने चाहिए. उन्होंने कहा कि अदालतें यह जांच करने के लिए बाध्य हैं कि क्या केस में राष्ट्रीय सुरक्षा वास्तव में शामिल है और क्या लंबे समय तक हिरासत उस हिसाब से ठीक है. उन्होंने कहा कि लोग बिना सजा के सालों तक जेल में रहते हैं, जो अपने आप में न्याय में खामी है.
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