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कौन थे राजगोपालाचारी जिनकी प्रतिमा राष्ट्रपति भवन में लगाने के लिए लुटियंस को हटा दिया गया?

लुटियंस की जगह राजाजी की प्रतिमा लगाने का निर्णय तमिलनाडु चुनाव से ठीक पहले लिया गया है. हालांकि तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति में ब्राह्मण राजाजी की कोई असरकारी भूमिका नहीं रह गई है. उनकी जगह पेरियार ने भर दी है. लेकिन राष्ट्रपति भवन में उनकी वापसी को राज्य की द्रविड़ राजनीति के प्रतीकात्मक विलोम के तौर पर देखा जा सकता है.

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्पति भवन में राजगोपालाचारी की मूर्ति का अनावरण किया. (इंडिया टुडे)

राष्ट्रपति भवन में ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस की प्रतिमा की जगह चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित की जाएगी. एडविन लुटियंस ने राष्ट्रपति भवन (तब वायसराय हाउस) का डिजाइन तैयार किया था, वहीं राजगोपालाचारी स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल के तौर पर इस भवन के पहले भारतीय रहवासी थे. स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आजादी के अगले कुछ दशकों तक भारतीय राजनीति को दिशा देने में राजगोपालाचारी की अहम भूमिका रही. उनके इस सफर पर एक नजर डालते हैं.

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राजगोपालाचारी का शुरुआती सफर

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को 'राजाजी' के नाम से भी जाना जाता है. उनका जन्म 10 दिसंबर, 1878 को मद्रास प्रेसीडेंसी के सेलम (मौजूदा तमिलनाडु) के कृष्णागिरी जिले के थोरापल्ली गांव में एक तमिल भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था. माता-पिता ने प्यार से उनको राजन नाम दिया था. राजाजी की शुरुआती पढ़ाई गांव के स्कूल में ही हुई. फिर आगे कानून की पढ़ाई के लिए मद्रास चले गए.

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मद्रास में ही उनको राजनीति और स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में जानकारी मिली. फिर राजाजी इससे अछूते नहीं रह पाए. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रेरित होकर वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े. साल 1906 में उन्होंने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लिया और फिर साल 1907 में सूरत अधिवेशन का भी हिस्सा बने. साल 1911 में 32 साल की उम्र में राजाजी सलेम नगर परिषद के सदस्य के तौर पर चुने गए. 

इसके बाद साल 1916 में वे एनी बेसेंट की होम रूल लीग में शामिल हो गए. सलेम में उन्होंने इसकी एक यूनिट भी स्थापित की. उनकी जीवनी लिखने वाले राजमोहन गांधी ने अपनी किताब ‘राजाजी: ए लाइफ’ में लिखा है कि राजनीतिक तौर पर लगातार एक्टिव राजाजी साल 1917 में सलेम नगर परिषद के अध्यक्ष चुने गए.

महात्मा गांधी के साथ जुड़े 

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राजाजी ने साल 1919 में सलेम छोड़कर मद्रास जाने का फैसला किया. क्योंकि सलेम में रहते राष्ट्रीय राजनीति में भागीदारी की संभावना बेहद सीमित थी. दो महीने बाद महात्मा गांधी मद्रास के दौरे पर आए. इस दौरान उनकी मुलाकात राजगोपालाचारी से हुई. इस मुलाकात में वे गांधीजी से बेहद प्रभावित हुए और उनके असहयोग आंदोलन से जुड़ गए. उनके नेतृत्व में तमिलनाडु में असहयोग आंदोलन को काफी जनसमर्थन मिला. राजाजी ने इसके लिए अपनी जमी जमाई वकालत छोड़ दी और पूरी तरह से गांधीजी के कार्यक्रमों के लिए समर्पित हो गए. उन्होंने चुनाव, सरकारी नौकरी, शिक्षा से जुड़े संस्थानों और आधिकारिक उपाधियों के बहिष्कार की मुहिम चलाई.

साल 1930 में राजाजी ने दांडी मार्च की तर्ज पर दक्षिण में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया. इसे ‘वेदारण्यम नमक सत्याग्रह’ के नाम से जाना जाता है. उन्होंने त्रिची से तंजौर तट पर स्थित वेदारण्यम तक की पदयात्रा की. वहां प्रार्थना सभाएं आयोजित करने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. कुछ समय बाद उन्हें रिहाई दे दी गई. लेकिन बाहर जाने पर शांतिपूर्ण व्यवहार करने का बॉन्ड भरने की शर्त पर. 

राजाजी ने शर्त मानने से इनकार कर दिया. इसके चलते उन्हें फिर से जेल भेज दिया गया. इसके बाद साल 1931 में उनको रिहा किया गया. लेकिन सत्याग्रह के पर्चे बांटने के चलते साल 1932 में फिर से जेल भेज दिया गया.

मद्रास के पहले प्रधानमंत्री बने

साल 1937 में अंग्रेजों ने भारत को कुछ रियायतें दीं और प्रांतीय चुनाव कराने का फैसला किया. इस चुनाव में मद्रास प्रांत में कांग्रेस को जीत मिली और राजाजी को 'मद्रास का प्रधानमंत्री' बनाया गया. इस दौरान उन्होंने राज्य को हिंदी को बढ़ावा देने के लिए एक फैसला किया. क्लास 6, 7 और 8 में छात्रों के लिए हिंदी की क्लास में हाजिरी अनिवार्य कर दी गई. हालांकि हिंदी में फेल होने पर छात्रों को क्लास से निकाले जाने का प्रावधान नहीं था. लेकिन इस योजना का जमकर विरोध हुआ. इसे तमिलनाडु में हिंदी विरोधी भावना के उभार का शुरुआती कदम माना जाता है.

गांधी से मतभेद और सी. आर. फॉर्मूला

असहयोग आंदोलन से लेकर नमक सत्याग्रह की यात्रा में राजगोपालाचारी महात्मा गांधी के सबसे विश्वासपात्र लोगों में से एक बन गए. लेकिन फिर भी राजाजी उनसे असहमति व्यक्त करने से भी कतराए नहीं. साल 1942 के असहयोग आंदोलन को लेकर उनकी राय गांधीजी से अलग थी. उनका मानना था कि यह सोचना निराधार है कि कांग्रेस के नारे देने के जवाब में ब्रिटेन देश छोड़ देगा. इसके बजाय उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौते पर जोर दिया. 

गांधीजी ने उनके प्रस्ताव को पूरी तरह से अस्वाभाविक बताया. इसके बाद राजाजी ने फिर से गांधीजी के सामने कांग्रेस लीग से समझौते का एक प्रस्ताव रखा. इसे ‘सी. आर. फॉर्मूला’ के तौर पर जाना गया. गांधीजी ने इस पर अपनी सहमति दे दी. इस योजना के मुताबिक अखिल भारतीय मुस्लिम लीग को कांग्रस के साथ मिलकर एक अंतरिम सरकार बनाने के लिए तैयार करना था. इसकी शर्त थी कि कांग्रेस पाकिस्तान के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने के लिए तैयार हो जाए.

इस योजना के मुताबिक, ब्रिटेन से पावर ट्रांसफर के बाद भारत के उत्तर पश्चिम और पूर्वी इलाकों के मुस्लिम बहुल जिलों में जनमत संग्रह कराया जाना था. और विभाजन होने की स्थिति में रक्षा, व्यापार, संचार और दूसरे जरूरी हितों की सुरक्षा के लिए आपसी समझौते का प्रस्ताव था. अप्रैल 1944 में राजाजी ने मुहम्मद अली जिन्ना को बताया कि महात्मा गांधी ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है. जिन्ना उस समय प्रस्ताव की स्टडी कर रहे थे. जिन्ना को लगा कि राजाजी का प्रस्ताव उनकी मांगो के अनुरूप नहीं था. उन्होंने सीआर को खबर भिजवाया,

 आपकी योजना मुझे संतोषजनक नहीं लगती.

पहले गवर्नर जनरल और नेहरू से मतभेद

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राजाजी को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया. और फिर लॉर्ड माउंटबेटेन की विदाई के बाद साल 1948 में भारत के पहले और आखिर गवर्नर जनरल बने. 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू होने के बाद यह पद समाप्त कर दिया गया. भारतीय संविधान लागू होने के बाद राजगोपालाचारी को प्रधानमंत्री नेहरू ने मंत्रिमंडल में शामिल किया. कुछ समय वे बिना पोर्टफोलियो के मंत्री रहे. फिर सरदार पटेल के निधन के बाद साल 1950 में गृह मंत्री बनाए गए. लेकिन इस बीच आर्थिक और नीतिगत मुद्दों को लेकर प्रधानमंत्री नेहरू से उनके मतभेद बढ़ने लगे. साल 1951 के अंत तक राजाजी ने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया.

इसके बाद साल 1952 में वे राज्य की राजनीति में लौट गए और मद्रास (अब तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री रहते साल 1953 में उन्होंने स्कूली शिक्षा को लेकर एक योजना शुरू की. इसके तहत हर छात्र को अपने स्कूल के आधे घंटे पारिवारिक व्यवसाय सीखने में बिताने थे. इस योजना की जमकर आलोचना हुई. इसे जाति आधारित व्यवसायों को बढ़ावा देने वाला बताया गया. विवाद इतना बढ़ा कि राजाजी को इस्तीफा देना पड़ा. उनकी जगह कांग्रेस ने के. कामराज को मुख्यमंत्री बनाया. उन्होंने इस योजना को वापस ले लिया.

राजाजी मुख्यमंत्री पद से हटा दिए गए. इस दौरान नेहरू की समाजवादी और आर्थिक नीतियों से उनका विरोध बढ़ता गया. वे राज्य के नियंत्रण कम करने, मुक्त बाजार और प्राइवेट उद्यम को बढ़ावा देने के पक्ष में थे. धीरे-धीरे यह वैचारिक दूरी राजनीतिक अलगाव में बदल गई. उन्होंने साल 1959 में स्वतंत्र पार्टी के नाम से एक राजनीतिक पार्टी का गठन किया. इस पार्टी में भारत के ढेर सारे राजे रजवाड़े शामिल हुए.

राजाजी आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के समर्थक थे. लेकिन कई राजा रजवाड़ों को पार्टी में शामिल करने की आलोचना करते हुए प्रधानमंत्री नेहरू ने उनकी पार्टी को सामंतों, महलों और जमींदारों के युग का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी बताया.

हिंदी को लेकर बदलता रहा है रुख 
साल 1937 में राजाजी हिंदी के समर्थक थे. लेकिन साल 1965 में तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन के दौरान उन्होंने हिंदी को एकमात्र आधिकारिक भाषा के तौर पर थोपे जाने का विरोध किया. लेखिका वासंथी श्रीनिवासन ने अपनी किताब, 'Gandhi's Conscience keeper' में लिखा है, 

उन्होंने हिंदी को ‘एक गरीब और अविकसित भाषा और एक विजेता की भाषा’ बताया जो अंग्रेजी की जगह नहीं ले सकती और ना ही लेनी चाहिए.

दलितों के मंदिर प्रवेश के समर्थक 

राजाजी हाशिए पर खड़े समुदायों के मंदिर प्रवेश के प्रबल समर्थक थे. अगस्त 1938 में दक्षिण भारत के बड़े दलित नेता एमसी राजा ने दलित समुदाय पर लगाए गए सामाजिक प्रतिबंधों को हटाने का विधेयक पेश किया तो उन्होंने इसका जोरदार समर्थन किया. इस कानून के तहत रोजगार, कुओं तक जाने से रोकने, सार्वजनिक शौचालयों, स्कूलों और कॉलेजों में जाति के आधार पर भेदभाव करने को दंडनीय अपराध बनाया गया.

8 जुलाई, 1939 को उनके मित्र वैद्यनाथ अय्यर ने हरिजन समुदाय के एक समूह का नेतृत्व करते हुए मंदिर में प्रवेश किया. इसके बाद मंदिर के कार्यकारी अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया और शुद्धिकरण समारोह आयोजित कराने की मांग की गई. इस प्रतिक्रिया के बाद राजाजी ने साल 1939 में मद्रास के प्रधानमंत्री रहते मंदिर प्रवेश प्राधिकरण और क्षतिपूर्ति विधेयक (1939) कानून लाकर दलितों को मंदिर में प्रवेश करने का संवैधानिक अधिकार दिया. 

कानून बनने के बाद श्रीरंगम के श्री रंगनाथस्वामी मंदिर के एक पुजारी ने कहा कि शास्त्र मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं देते. इस पर राजाजी ने उत्तर दिया,

शास्त्र अनंत सागर के समान हैं, जिनमें मोती और मूंगे के साथ-साथ कीचड़ और शार्क भी निकाले जा सकते हैं.

राजगोपालाचारी की राजनीतिक विरासत

साल 1954 में राजाजी को भारत रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया. 1972 में उन्होंने आखिरी सांस ली. राजगोपालाचारी को गांधीजी अपनी अंतरात्मा का रक्षक (Conscience keeper) कहते थे. राजाजी ने कई मौकों पर गांधीजी से असहमति जताई, जिसमें राजनीतिक, नैतिक और आध्यात्मिक मसले शामिल हैं. 

राजाजी एक समय जवाहरलाल नेहरू के भी बेहद करीब थे. रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि नेहरू चाहते थे कि राजाजी भारत के पहले राष्ट्रपति बनें. लेकिन कांग्रेस में राजेंद्र प्रसाद के नाम पर व्यापक सहमति थी. हालांकि अपने जीवन के आखिरी सालों में राजाजी कांग्रेस और नेहरू की समाजवादी नीतियों के कट्टर विरोधी हो गए थे.

लुटियंस की जगह राजाजी की प्रतिमा लगाने का निर्णय तमिलनाडु चुनाव से ठीक पहले लिया गया है. हालांकि तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति में ब्राह्मण राजाजी की कोई असरकारी भूमिका नहीं रह गई है. उनकी जगह पेरियार ने भर दी है. लेकिन राष्ट्रपति भवन में उनकी वापसी को राज्य की द्रविड़ राजनीति के प्रतीकात्मक विलोम के तौर पर देखा जा सकता है. 

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