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भाजपा ने छीन ली तीन दशकों की सत्ता, BMC चुनाव में उद्धव को भाई राज ठाकरे ले डूबे?

BMC Election Result: लगभग तीन दशकों तक मुंबईवासियों ने शिवसेना को BMC पर राज करते देखा. लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं. सवाल उठ रहे हैं कि क्या ‘मराठी अस्मिता’ की राजनीति ने उनका खेल बिगाड़ा या राज ठाकरे के कटु और विभाजनकारी बयान उन्हें ले डूबे?

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BMC चुनाव के नतीजों से महाराष्ट्र के ‘ठाकरे ब्रांड’ को करारा झटका लगा है. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)

‘हम तो डूबेंगे ही सनम, तुमको भी ले डूबेंगे.' महाराष्ट्र के बृहन्मुंबई नगर निगम चुनाव (BMC) में भी यही हुआ. कहां तो उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना (यूबीटी) के लिए यह चुनाव 'कमबैक' का अच्छा मौका था और कहां वो सिर्फ 65 सीटों पर सिमट गए. तकरीबन 3 दशकों की बीएमसी की सत्ता भी हाथ से निकल गई. अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या ‘मराठी अस्मिता’ की राजनीति ने उनका खेल बिगाड़ा या राज ठाकरे के ‘कड़वे’ और ‘विभाजनकारी’ बयान उन्हें ले डूबे? 

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तकरीबन तीन दशकों तक मुंबई ने शिवसेना को BMC पर राज करते देखा. ज्यादातर समय गठबंधन में ही लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं. भारत के सबसे अमीर नगर निगम पर अब बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन का कब्जा होगा. 

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, महायुति ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है. बीजेपी गठबंधन ने कुल 227 सीटों में से 118 सीटों पर जीत हासिल की है. इनमें बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को 29 सीटें मिली हैं. दूसरी तरफ, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने 65 सीटें जीतीं और राज ठाकरे वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) को महज छह सीटें मिलीं.

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इस नतीजे से महाराष्ट्र के ‘ठाकरे ब्रांड’ को करारा झटका लगा है. दशकों पहले अलग होने के बाद इस चुनाव में पहली बार साथ आए शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और उनके चचेरे भाई ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ (MNS) के अध्यक्ष राज ठाकरे का हर दांव इस चुनाव में फेल होता दिखा.  

चुनाव प्रचार के दौरान ‘मनसे’ ने क्या किया?

चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में राज ठाकरे सुर्खियों में छाए थे. लेकिन ज्यादातर गलत कारणों से. ऐसा लगता है कि उन्हें अहसास हो गया था कि उनके पैरों तले जमीन खिसक रही है. इसके बाद उन्होंने दशकों पुरानी ‘चाल’ चलने की कोशिश की. उनके कार्यकर्ता उत्तर भारतीयों को थप्पड़ मारकर ‘गुंडागर्दी’ करते रहे. पार्टी के मुखिया ने भी कल्याणकारी योजनाओं पर ध्यान देने की बजाय ‘उठाओ लुंगी, बजाओ पुंगी’ जैसे नारे देने शुरू कर दिए. यहां तक कि बीजेपी नेता अन्नामलाई को ‘रसमलाई’ तक कह डाला. 

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इससे पार्टी को कोई खास फायदा नहीं हुआ. सिवाय इसके कि उनके चाचा बाल ठाकरे की ‘आक्रामक’ राजनीति की कड़वी यादें ताजा हो गईं, जिसकी शुरुआत उन्होंने 1960 के दशक में की थी.

बाल ठाकरे ने 1960 में वीकली मैगजीन 'मार्मिक' (कार्टून) की शुरुआत की थी और 1966 में शिवसेना की स्थापना की थी. इस मैगजीन में उन्होंने तीखी बयानबाजी के जरिए ‘मराठी अस्मिता’ की राजनीति के बीज डाले. यह मैगजीन अक्सर दक्षिणी राज्यों से आए प्रवासियों को निशाना बनाती थी. दूसरी तरफ, शिवसेना (यूबीटी) ने अपनी इमेज सुधारने के लिए काफी कोशिश की और ऐसे मुद्दों पर ध्यान दिया, जिनसे किसी भी समुदाय को अलग-थलग महसूस न हो. कुछ हद तक इसका असर भी नतीजों में देखने को मिला.

बीएमसी का चुनाव 15 जनवरी को हुआ. 16 जनवरी की शाम तक MNS ने 52 वार्डों में चुनाव लड़ा और केवल 6 वार्डों में जीत हासिल की. यानी उसका स्ट्राइक रेट 11% रहा. वहीं, शिवसेना (यूबीटी) का स्ट्राइक रेट 40% रहा और उसने 164 वार्डों में से 66 पर कब्जा जमा लिया लेकिन एक बात जो उद्धव ठाकरे को सबसे ज्यादा खली, वो यह कि महायुति को भारी बहुमत से जीत नहीं मिली है. ऐसे में उद्धव के लिए MNS की थोड़ी सी मदद भी बहुत मायने रखती. हालांकि, उनके चचेरे भाई की पार्टी उनके लिए सिर्फ एक बड़ी मुसीबत बनकर उभरी. 

इस बीच, विपक्ष के बिखराव ने भी अहम भूमिका निभाई. अगर विपक्ष एकजुट होता तो महाविकास अघाड़ी (MVA) बहुमत के और भी करीब पहुंच सकता था. कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले ने भी स्थिति को और पेचीदा बना दिया.

महायुति कैसे जीता चुनाव?

महायुति गठबंधन ने भी हिंदुत्व और मराठी अस्मिता की राजनीति की, लेकिन MNS की तरह खुलकर नहीं. उन्होंने हिंदू-मराठी महापौर की वकालत जरूर की, लेकिन विकास पर ध्यान दिया. मसलन मेट्रो और सीवेज व्यवस्था ने उन्हें साउथ मुंबई में पैर जमाने में मदद की. एक बात और ध्यान देने वाली है. मुंबई की जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) में भी अब काफी बदलाव आया है. जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, मराठी भाषी लोगों की संख्या 1951 में 44 प्रतिशत से घटकर 2011 तक 36 प्रतिशत हो गई. इसलिए महायुति ने ‘सबको साथ’ लेकर चलने की राजनीति की. 

दूसरी बात, युवा मतदाताओं की संख्या है, जिसमें भारी बढ़ोतरी हुई है. इनमें 35 साल से कम आयु के 30% से ज्यादा वोटर्स शामिल हैं. इस ‘एज ग्रुप’ ने पुरानी मराठी अस्मिता की विचारधारा से कोई खास जुड़ाव नहीं दिखाया. 

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महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़े एक्सपर्ट्स ने इंडिया टुडे को बताया कि मराठी पहचान का मुद्दा एक छोटे से वर्ग पर ही असर डालता है. दूसरी तरफ, Gen-Z लोग राजनीति में बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते, लेकिन वो किसी भी समुदाय के प्रति नफरत को छोड़कर हर चीज को प्राथमिकता देते हैं. कुल मिलाकर, राज ठाकरे के लिए इस तरह की रणनीति बार-बार विफल रही है. MNS का रिकॉर्ड खुद ही सब कुछ बयां करता है. 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं. लोकसभा चुनाव में अब तक एक भी सीट नहीं मिली. 2017 के BMC चुनावों में सिर्फ एक सीट. 

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