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कुत्ते की चेन से गला घोंटा... कहानी अरुणा शानबाग की, जिनके लिए इच्छा मृत्यु पर कोर्ट में बहस हुई थी

हरीश राणा को इच्छामृत्यु देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बीच अरुणा शानबाग की कहानी याद की जा रही है. उन्हें भी इच्छा मृत्यु देने के लिए कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी.

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अरुणा शानबाग की 2015 में मौत हो गई. (तस्वीरेः India Today)

मुंबई का किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल. तारीख थी 27 नवंबर 1973. अरुणा शानबाग नाम की एक महिला नर्स बुरी तरह जख्मी होकर स्टूल के सहारे बेसुध बैठी थीं. उनके गले में मेटल की एक कुत्ते वाली चेन पड़ी थी. चारों तरफ खून फैला हुआ था. अस्पताल में काम करने वाले लोग उनके पास पहुंचे तो वह कुछ बोलना चाहती थीं. लेकिन बोल नहीं पा रही थीं. उन्हें अस्पताल ले जाया गया. डॉक्टरों ने बताया कि चेन से उनका गला घोंटा गया है. उनके साथ रेप भी हुआ है. गला घोंटने की वजह से उनके दिमाग में ऑक्सीजन का फ्लो रुक गया. इसीलिए वह कुछ बोल नहीं पा रही थीं. इस घटना के बाद से शानबाग 42 साल तक कोमा में रहीं. 

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अरुणा शानबाग देश की वो पहली महिला थीं, जिन्हें इच्छा मृत्यु देने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया. यही वो केस है जिसकी बुनियाद पर 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अपना वो ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें 31 साल के हरीश राणा को 'पैसिव यूथेनेशिया' यानी इच्छा मृत्यु का आदेश दिया गया है. हरीश राणा 13 साल पहले चौथी मंजिल से गिर गए थे और तब से कोमा में थे. उनके माता-पिता ने उन्हें इच्छा मृत्यु देने की मांग सुप्रीम कोर्ट से की थी. 

अरुणा शानबाग की कहानी क्या है?

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ये कहानी आज से 53 साल पहले की है. एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 25 साल की अरुणा शानबाग मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में नर्स थीं. 27 नवंबर 1973 को अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद वो अस्पताल से निकलने ही वाली थीं कि उनका सफाई कर्मी सोहनलाल वाल्मीकि से झगड़ा हो गया. इस लड़ाई के बाद शानबाग गंभीर रूप से घायल अवस्था में मिली थीं. उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उनके साथ बलात्कार होने की बात कही. ये भी कहा कि चेन से उनका गला घोंटा गया था.

गला घोंटने की वजह से शानबाग के दिमाग में ऑक्सीजन की सप्लाई रुक गई थी. इससे दिमाग को काफी नुकसान पहुंचा था. उनकी आंखें देख सकती थीं लेकिन दिमाग उन छवियों को प्रोसेस नहीं कर सकता था. उन्हें ब्रेन स्टेम में चोट लगी थी और रीढ़ की हड्डी में भी चोट आई थी. इसके कारण वह कोमा में चली गई थीं. वह बोल नहीं सकती थीं. भावनाएं जाहिर नहीं कर सकती थीं. उनके अंग भी काम नहीं कर रहे थे. 

शानबाग के 8 भाई-बहन थे लेकिन अस्पताल के अधिकारी बताते हैं कि उन लोगों ने कुछ समय बाद उनसे मिलना बंद कर दिया. हालांकि परिवार के लोगों ने इस आरोप पर कहा कि अस्पताल के अधिकारी उनसे अरुणा को घर ले जाने के लिए कहते थे लेकिन उनके पास अरुणा की देखभाल करने के लिए साधन नहीं थे. 

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इस घटना के समय शानबाग अस्पताल में ही काम करने वाले डॉ. प्रताप देसाई के साथ रिलेशनशिप में भी थीं. मुंबई मिरर को दिए 2015 के एक साक्षात्कार में देसाई ने बताया कि हमले के बाद वो कई बार शानबाग से मिलने गए थे. उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था और ये सब देखना उनके लिए काफी दर्दनाक था. देसाई की बाद में 1977 में शादी हो गई और वो अपने जीवन में व्यस्त हो गए.

अस्पताल के कर्मचारियों ने ही 40 साल तक अरुणा शानबाग की देखरेख की. अरुणा शानबाद की एक लेखिका दोस्त थीं, पिंकी विरानी. उन्होंने अरुणा की कहानी पर एक किताब भी लिखी है. विरानी ने कोर्ट में अरुणा की ओर से ‘इच्छा मृत्यु’ की एक याचिका दाखिल की और कोर्ट से मांग की कि अरुणा शानबाद को वेंटिलेटर से हटा दिया जाए ताकि उन्हें गरिमापूर्ण मृत्यु हासिल हो सके. यह उनका अधिकार है. 

विरानी बताती हैं कि इस मामले में सबसे बुरी बात ये थी कि आरोपी वाल्मीकि को रेप के लिए सजा नहीं दी गई क्योंकि उसने योनि से बलात्कार नहीं किया था. उसने गुदा मैथुन किया था. पर वाल्मीकि ने ये आरोप हमेशा खारिज किए हैं. कई इंटरव्यू में उसने कहा कि शानबाग से उसकी बनती नहीं थी. वो उसे परेशान करती थीं. घटना वाले दिन शानबाग ने उसे छुट्टी देने से मना कर दिया था. गुस्से में आकर उसने शानबाग को थप्पड़ मारा और घर चला गया. 

कोर्ट ने स्वीकार कर ली याचिका

शानबाग के साथ हुई इस घटना के 36 साल बाद 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें गरिमापूर्ण मौत देने की याचिका स्वीकार कर ली. कोर्ट ने एक मेडिकल पैनल से सलाह ली, जिसने बताया कि शानबाग स्थायी रूप से कोमा में हैं और इससे उबरने के चांस न के बराबर हैं. 

इसके बाद 7 मार्च 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने आदेश दिया कि मरीज को वेंटिलेटर से हटाने का फैसला उसके माता-पिता, लाइफ पार्टनर या अन्य कोई करीबी रिश्तेदार ले सकते हैं. अगर इनमें से कोई मौजूद नहीं है तो कोई ऐसा व्यक्ति या ग्रुप ये काम कर सकता है जो मरीज का सबसे करीबी मित्र हो.

विरानी ने इस मामले में खुद को शानबाग का दोस्त बताया. लेकिन जिस अस्पताल के लोगों ने शानबाग की देखरेख की थी उन्होंने इससे असहमति जताई. अस्पताल के लोगों ने जोर देकर कहा कि वो शानबाग को जिंदा रखना चाहते हैं. इसके बाद कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की याचिका खारिज कर दी.

कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर अस्पताल के लोग बाद में अपना फैसला बदलते हैं तो वे बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं.

हालांकि, अस्पताल के लोगों ने अपना फैसला नहीं बदला. साल 2015 तक वो शानबाग की देखभाल करते रहे. इसी साल उन्हें निमोनिया हो गया, जिसके बाद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी. 18 मई 2015 को अरुणा शानबाग की मौत हो गई. 

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