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पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI इतनी शातिर है कि उसने CIA को भी मूर्ख बना दिया

अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA को सबसे ताकतवर स्पाई एजेंसी माना जाता है. लेकिन ये दावा गलत है.

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CIA ने सोचा कि उसने तालिबान चीफ मंसूर को मारकर पाकिस्तान का बड़ा नुकसान किया है. करीब 14 महीने बाद जाकर CIA को पता चला कि उसने मंसूर को नहीं मारा, बल्कि ISI ने बड़ी चालाकी से उसके हाथों मंसूर को मरवाया है (फोटो: पीटीआई+रॉयटर्स)
21 मई, 2016. घड़ी ने सुबह के तकरीबन 7 बजाए थे. एक अधेड़ उम्र का पश्तून पठान जेब में पाकिस्तान का पासपोर्ट रखे इरान की ओर से पाकिस्तान में घुसा. सीमा के पास चेकिंग थी. दो घंटे तक वो वहीं फंसा रहा. जब निकला, तो चेकिंग पोस्ट के बाहर एक झक सफेद कार उसका इंतजार कर रही थी. वो कार में बैठा. और कार क्वेटा की तरफ चल दी. क्वेटा, उसका ठिकाना. बलूचिस्तान की राजधानी. करीब आठ घंटे की दूरी थी. दो-तिहाई रास्ता गुजर गया. वो निश्चिंत हो गया होगा तब तक. तभी आसमान के रास्ते बिजली की तेजी से एक ड्रोन प्रकट हुआ. और उसमें हुआ एक जोरदार धमाका. ब्लास्ट में न कार बची. न उसे चलाने वाला ड्राइवर. और न ही वो पश्तून पैसेंजर.
ये आदमी अमेरिका की लगाई फिल्डिंग में मारा गया था. अमेरिका महीनों से उसे मारने की ताक में था. मगर कामयाबी अब जाकर मिली थी.
उस मारे गए आदमी का नाम था- मुल्ला अख्तर मुहम्मद मंसूर. तालिबान का सरगना. मुल्ला मुहम्मद उमर के बाद वाला और मौलवी हिब्तुल्लाह अखुंदजादा से पहले वाला तालिबान चीफ.
ये अमेरिका का A-10 एयरक्राफ्ट है. ये उस खेप का हिस्सा है, जो हाल के दिनों में अमेरिका ने अफगानिस्तान में भेजी है. ताकि तालिबान पर हमले तेज किए जा सकें. अमेरिका लगातार अफगानिस्तान में अपने संसाधन फूंक रहा है. लेकिन हासिल होने के नाम पर उसे कुछ मिल नहीं रहा. नो तो ये लड़ाई खत्म होती दिख रही है और न अफगानिस्तान के हालात ही सुधर रहे हैं (फोटो: रॉयटर्स)
ये अमेरिका का A-10 एयरक्राफ्ट है. ये उस खेप का हिस्सा है, जो हाल के दिनों में अमेरिका ने अफगानिस्तान में भेजी है. ताकि तालिबान पर हमले तेज किए जा सकें. अमेरिका लगातार अफगानिस्तान में अपने संसाधन फूंक रहा है. लेकिन हासिल होने के नाम पर उसे कुछ मिल नहीं रहा. नो तो ये लड़ाई खत्म होती दिख रही है और न अफगानिस्तान के हालात ही सुधर रहे हैं (फोटो: रॉयटर्स)

अमेरिका को लगा कि मंसूर को मारकर उसने बड़ा तीर मारा है. कि वो जो करना चाहता है, वो उसने अपने बूते कर लिया है. मंसूर का मारा जाना बड़ी कामयाबी थी. ऐसा इसलिए कि-
- एक, एक साल भी नहीं हुआ था जब उसका सरगना मुल्ला मुहम्मद उमर मारा गया था. अब अमेरिका को लगा कि तालिबान बात करने को राजी होगा. मतलब, उसे राजी होना होगा. - दो, पाकिस्तान को 'कड़ा संदेश' जाएगा. कि अमेरिका से पैसे लेकर खजाने भरने वाला देश इस तरह अमेरिका के दुश्मनों को अपने यहां पनाह नहीं दे सकता है. हालांकि अमेरिका लंबे समय से जानता था कि पाकिस्ताना एक नंबर का 'झुठ्ठा' है. 2009 में जब बराक ओबामा राष्ट्रपति बने, तो CIA ने उन्हें पहली ब्रीफिंग दी. उसने दो-टूक कह दिया कि पाकिस्तानी 'झूठ्ठे' हैं.
मंसूर को मार कर बहुत दिनों तक अमेरिका ने अपनी पीठ थपथपाई. लेकिन उसने जैसा सोचा था, वैसा कुछ नहीं हुआ. तालिबान बातचीत के लिए न पहले राजी था. न मंसूर के मारे जाने के बाद राजी हुआ. बल्कि उसने अफगानिस्तान में हमले और बढ़ा दिए. 2009 से जोड़ें, तो मरने-मारने के लिहाज से 2016 बड़ा खराब बीता अमेरिका के लिए. 11,000 से ज्यादा आम अफगानिस्तानी मारे गए इस साल. अफगान सेना और सुरक्षाबलों के 6,700 से ज्यादा लोग काम आए. तकरीबन 11,800 जख्मी हुए.
अमेरिका की तमाम जिम्मेदारियों में एक जिम्मेदारी अफगान सैनिकों को प्रशिक्षित करने की भी है (फोटो: रॉयटर्स)
अमेरिका की तमाम जिम्मेदारियों में एक जिम्मेदारी अफगान सैनिकों को प्रशिक्षित करने की भी है (फोटो: रॉयटर्स)

ये सारे झटके फिर भी कम थे. उस झटके के सामने जो अमेरिका को लगने वाला था. जब उसे पता चला कि मंसूर को मारने में उसकी अपनी कोई वाहवाही नहीं. बल्कि वो, यानी अमेरिका को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया है. कि शिकारी, यानी अमेरिका खुद शिकार हो गया है.
मतलब?
मतलब ये कि पाकिस्तान ने अमेरिका को इस्तेमाल किया.
हुआ ये था कि एक टाइम में मंसूर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के बहुत करीब था. मगर फिर चीजें बदल गईं. दोनों में ठन गई. मंसूर ISI की बात नहीं मान रहा था. ISI चाहता था कि तालिबान अफगानिस्तान के अंदर इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला करे. अस्पताल तोड़े, सड़कें उड़ाए, पुल ढहाए. मंसूर ये सब नहीं कर रहा था. इसके अलावा वो सिराजुद्दीन हक्कानी को भी प्रमोट नहीं कर रहा था. न ही वो अफगान सरकार के साथ भविष्य में होने वाली बातचीत में पाकिस्तान की कही बातें उठाने में दिलचस्पी ले रहा था. मतलब पाकिस्तान के फायदे वाले काम नहीं कर रहा था. इतना ही नहीं, बल्कि वो तो अफगान सरकार के साथ शांति वार्ता के लिए भी राजी था. उसने अपने कमांडरों को ये बात बता दी थी. मंसूर चाहता था कि तालिबान के ऊपर ISI की जो पकड़ है, वो कम हो. इसके लिए वो सारी तरकीबें आजमा रहा था. ईरान के साथ भी उसकी बातचीत चल रही थी. ताकि पाकिस्तान पर उसकी निर्भरता खत्म हो सके.
ओबामा 2009 में पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने. 2016 के जनवरी में उन्होंने बतौर राष्ट्रपति अपना दूसरा और आखिरी कार्यकाल खत्म किया. उनके जाते समय अफगानिस्तान की हालत ये थी कि यहां के 40 फीसद से ज्यादा जिले या तो सीधे-सीधे तालिबान के कब्जे में थे. या फिर इन्हें लेकर वो लड़ रहा था. तालिबान के अलावा ISIS भी अफगानिस्तान में काफी पैर पसार चुका है (फोटो: रॉयटर्स)
ओबामा 2009 में पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने. 2016 के जनवरी में उन्होंने बतौर राष्ट्रपति अपना दूसरा और आखिरी कार्यकाल खत्म किया. उनके जाते समय अफगानिस्तान की हालत ये थी कि यहां के 40 फीसद से ज्यादा जिले या तो सीधे-सीधे तालिबान के कब्जे में थे. या फिर इन्हें लेकर वो लड़ रहा था. तालिबान के अलावा ISIS भी अफगानिस्तान में काफी पैर पसार चुका है (फोटो: रॉयटर्स)

जाहिर है, मंसूर की ये सारी बातें पाकिस्तान का नुकसान करतीं. ISI ये कतई नहीं होने देना चाहता था. वो मंसूर को रास्ते से हटाना चाहता था. और इसके लिए उसने अमेरिका का इस्तेमाल किया. वो भी बिना अमेरिका को खबर लगे. तो जब CIA को लगा कि उसने खुद की कोशिशों से मंसूर को ट्रेस कर लिया है. तब असल में हुआ ये था कि ISI ने जान-बूझकर ऐसे सबूत छोड़े थे. ताकि CIA मंसूर को खोज ले और उसे मार दे. मतलब कि जब तक ISI नहीं चाहता था, तब तक CIA को मंसूर नहीं मिला. मतलब कि एक ISI अमेरिका और उसकी CIA, दोनों पर भारी है.
CIA की एक हार और भी थी. कि ये सारी बातें उसे मंसूर की मौत के 14 महीने बाद पता चलीं. तब तक अफगानिस्तान अमेरिका की सुपरपावर इमेज पर बट्टा बन चुका था. अमेरिकी इतिहास में सबसे लंबे वक्त तक चलने वाला युद्ध. जिसमें इतना गंवाने, लगाने, झोंकने के बाद भी अमेरिका को कुछ हासिल नहीं हुआ. जहां अमेरिका की हालत ऐसी है कि वो एक ही गोल घेरे में चक्कर काटे जा रहा है. बेदम हो रहा है. और इतना करने पर भी उसे कुछ हासिल नहीं हो रहा है.
 ये 2017 की तस्वीर है. तस्वीर में दिख रहे शख्स ने एक बम धमाके में अपना बेटा खोया. ये एक फिदायीन अटैक था. बेटे के मातम में बेजार हो रहे बाप को चुप करा रहे लोग उसके चेहरे पर पानी छिड़क रहे हैं. अफगानिस्तान में बम धमाके रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं (फोटो: रॉयटर्स)
ये 2017 की तस्वीर है. तस्वीर में दिख रहे शख्स ने एक बम धमाके में अपना बेटा खोया. ये एक फिदायीन अटैक था. बेटे के मातम में बेजार हो रहे बाप को चुप करा रहे लोग उसके चेहरे पर पानी छिड़क रहे हैं. अफगानिस्तान में बम धमाके रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं (फोटो: रॉयटर्स)

ये किस्सा एक किताब में पढ़ा मैंने. मस्त सी किताब है. बहुत कम किताबें होती हैं, जिनके पहले शब्द से जेम्स बॉन्ड 007 की फीलिंग आए. द मोस्ट डेंजरस प्लेस, अ हिस्ट्री ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स. ये ऐसी ही रोमांच वाली किताब है. इसको लिखा है श्रीनाथ राघवन ने. राघवन सैन्य इतिहासकार हैं. एक देश दूसरे देश के साथ जैसे बरतता है, उसको डिप्लोमसी कहते हैं. तो राघवन इस डिप्लोमसी की भी हिस्ट्री बताते हैं. किताब 18 जून को रिलीज हो रही है. राघवन ने इसमें भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे दक्षिण एशियाई देशों के अंदर अमेरिका का कच्चा-चिट्ठा खोला है. अंदर की बातें. बड़ी घटनाओं के अंदरूनी किस्से बताए हैं. राघवन की खासियत है कि वो आपको पतीला भरकर जानकारी देते हैं. लेकिन इतने दिलचस्प तरीके से देते हैं कि आपका पेट नहीं फटता. पढ़ने में मजा आता है. आप किताब उठाएंगे, तो पलटते चले जाएंगे.
श्रीनाथ राघवन की किताब- द मोस्ट डेंजरस प्लेस: अ हिस्ट्री ऑफ
श्रीनाथ राघवन की किताब- द मोस्ट डेंजरस प्लेस: अ हिस्ट्री ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स इन साउथ एशिया का कवर पेज. इसमें से पहचानिए, आप कितने अमेरिकी राष्ट्रपतियों को पहचानते हैं.

किताब का नाम- The Most Dangerous Place, A history of the United States in South Asia लेखक- श्रीनाथ राघवन पब्लिशिंग हाउस- पेंग्विन कीमत- इसके हार्डकवर की ऑनलाइन कीमत करीब 599 रुपये है


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