अनुजा चौहान की लिखी हुई 'दोज़ प्राइसी ठाकुर गर्ल्स' का हिंदी तर्जुमा है 'डब्बू'.
'डब्बू' जज लक्ष्मी नारायण ठाकुर के परिवार की कहानी है. उनकी 5 बेटियां हैं. बहुत बड़ी सी हवेली है. कहानी का सेटअप 1988 का है. सन 88 में दिल्ली कैसा था. दिल्ली के लोग कैसे थे. ये कहानी काफी कुछ बताती है. शुरुआत में थोड़ी बोरिंग सी लगती है. एकदम टिपिकल चिक-फ्लिक. फिर जैसे-जैसे उसमें कैरेक्टर जुड़ते जाते हैं. पढ़ने में मज़ा आने लगता है. लक्ष्मी नारायण ठाकुर का खानदान पहले बहुत अमीर हुआ करता था. कई हवेलियां थीं उनके पास. फिर बंटवारे हुए. लोग बढ़ते चले गए. हवेलियां बिकती चली गईं. दिल्ली के हेली रोड जैसे पॉश इलाके में कुछ ही हवेलियां अब जिंदा हैं. लक्ष्मी नारायण ठाकुर और उनके छोटे भाई अशोक नारायण ठाकुर की हवेलियां उन्हीं में से हैं. लक्ष्मी नारायण की हवेली बाहर से देखने वाले अक्सर सोचते हैं,
बहुत मालदार पार्टी होगी. लेकिन सच्चाई लक्ष्मी नारायण और उनकी पत्नी ममता ठाकुर ही जानते हैं. पांच में से तीन बेटियों की शादियां हो चुकी हैं. जज साहब रिटायर हो चुके हैं. ज़िन्दगी अब मुश्किल हो गई है. दो बेटियों की शादी कैसे होगी. उनका खर्च ना जाने कैसे निकलेगा. यही सोच-सोच कर लक्ष्मी नारायण और उनकी पत्नी ममता अक्सर परेशान रहते हैं.
दो चीज़ों के दीवाने जज लक्ष्मी नारायण
पहली चीज़ है
अल्फाबेट्स. जज साहब को इंग्लिश के अल्फाबेट्स से बहुत ज्यादा प्यार है. उन्होंने अपनी पांचों बेटियों के नाम भी इंग्लिश के शुरुआती पांच अल्फाबेट A,B,C,D,E से ही रखे हैं.
अंजनी, बिनोदिनी, चंद्रलेखा, देबजानी और ईश्वरी. दो लोगों की आपस में बनेगी या नहीं, ये भी वो उनके नामों के अल्फाबेट्स जोड़कर बता देते हैं. दूसरी चीज़ है
कोटपीस. ताश का वो खेल जो दोपहर के आखिरी पहर में उनके लॉन में शुरू होता है. और देर शाम तब तक चलता रहता है. जब तक उनके दोस्तों में से किसी को घर ना लौटना हो. या अंधेरा बहुत घना ना हो गया हो. जज साहब के कोटपीस के साथी हैं
ब्रिगेडियर शेखावत, बालकिशन बाउ और उनके छोटे भाई अशोक नारायण. लेकिन पिछले कुछ दिनों से ठाकुर भाइयों की आपस में लड़ाई हो गई है. इस वजह से अब अशोक नारायण कोटपीस खेलने नहीं आते. अब उनकी जगह बालकिशन बाउ की पार्टनर बनती है
जज साहब की फेवरेट बिटिया, डब्बू यानी देबजानी. खेल चलता रहता है. ममता जी बीच-बीच में मैगी बना कर लाती हैं. हर रोज़ का यही रूटीन है.
DD न्यूज़ वाली देबजानी 'डॉली' ठाकुर

डब्बू ने ग्रेजुएशन पूरी कर ली है. उसने DD में न्यूज़ एंकर बनने के लिए ऑडिशन दिया था. हजारों लड़कियों में से वो अकेली सिलेक्ट हुई है. पूरा परिवार बहुत एक्साइटेड है. जिस दिन डब्बू की न्यूज़ रिकॉर्डिंग होनी है. पूरा परिवार उसको स्टूडियो छोड़ने जाता है. DD पर न्यूज़ पढ़ने के बाद डब्बू काफी फेमस हो गई है. लेकिन जब फेम आया है. आलोचनाएं भी आएंगी ही. इंडिया पोस्ट नाम के एक न्यूज़ पेपर में उसकी एंकरिंग की बुराई छप गई. उस पोस्ट में लिखा था,
मिस 'डॉली ठाकुर' कुछ ज्यादा ही स्टिफ थीं. उनमें वो बात नहीं है जो DD की एंकर में होनी चाहिए. सिर्फ खूबसूरत दिखना ही काफी नहीं होता. 'डॉली' कहकर उसकी तुलना प्लास्टिक की गुड़िया से की गई थी. ज़ाहिर सी बात है. डब्बू को बहुत बुरा लग गया. उसने सोचा था अब DD वाले कभी उसको न्यूज़ पढ़ने नहीं बुलाएंगे.
मुंबई की हर लड़की की फैंटेसी, डिलन सिंह शेखावत

ठाकुर लक्ष्मी नारायण के दोस्त ब्रिगेडियर शेखावत का बेटा है डिलन सिंह शेखावत. इंडिया पोस्ट अख़बार में काम करता है. इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट है. बंबई में रहता है. बहुत बड़ा वाला फ़्लर्ट है. पचासों गर्लफ्रेंड्स हैं. सेटल उसको होना नहीं है. इसलिए बिना किसी गिल्ट के ऐश की ज़िन्दगी जी रहा है. जो भी लड़की उससे मिलती है. उसकी मुरीद हो जाती है. लेकिन डिलन का जुनून कुछ और है.
सन 84 के दंगे. चार साल पहले सन 84 में सिखों पर जो हमले हुए थे. डिलन उनकी जांच-पड़ताल कर रहा है. उस केस में एक नेता हरीश मोटला गिरफ्तार हुआ था. लेकिन अब मोटला को क्लीनचिट दे दी गई है. वो इस फैसले से बहुत नाराज़ है. इसीलिए डिलन फिर से पूरा केस पढ़ना चाहता है. लेकिन बंबई में बैठे-बैठे वो काम होगा नहीं. इसलिए वो दिल्ली अपने घर आया है. पापा के साथ उनके दोस्त ठाकुर साहब के घर गया. जब डब्बू को उसने देखा. उसको डब्बू से प्यार हो गया.
फिर पता चलता है कि इंडिया पोस्ट के जिस आर्टिकल में डब्बू की बुराई की गई थी. वो डिलन ने लिखा था. लड़ाइयां होती हैं. बातचीत बंद हो जाती हैं. दोनों परिवारों के रिश्ते भी खराब हो जाते हैं. इसमें भी ढेर सारी गलतफहमियां आ गईं. लेकिन जैसा कि अक्सर ऐसी कहानियों में होता है. हैप्पीज एंडिंग्स!
दोज़ प्राइसी ठाकुर गर्ल्स

डब्बू की बहनों के कैरेक्टर बहुत देखे-सुने से हैं. पढ़कर लगता है कि ऐसी लड़कियों को तो हम असल में भी जानते हैं. सबसे बड़ी बहन
अंजनी बहुत बड़ी फ़्लर्ट है. अपनी खूबसूरती पर उसको घमंड भी है. कोई भी बात कहीं से भी शुरू हो. अंजनी उसको अपनी पॉपुलैरिटी, अपने पीछे पड़े दीवानों की बातों तक ले ही आती है.
उसकी शादी अनंत से हुई थी. अनंत बहुत अमीर और खूबसूरत हैं. उनकी पहली पत्नी मर चुकी थी. उससे उनका एक बेटा है, समर. अंजनी और अनंत के रिलेशन अच्छे नही चल रहे. इसलिए अनंत अक्सर अमेरिका में रहते हैं. और अंजनी समर के साथ अपने मायके में.
बिनोदिनी बहुत चंट है. उसकी पूरी नज़र अपने हिस्से की प्रॉपर्टी पर लगी हुई है. वो चाहती है, जल्दी से उसके पापा ये घर बेच दें. और उसके हिस्से के पैसे उसको मिल जाएं. उसका पति भी बहुत लालची है. एक के बाद एक बिज़नेस शुरू करता है. लेकिन सबमें सिर्फ नुकसान ही होता है. वो बिनोदिनी से कहता है कि वो अपने बाप से पैसे मांगे. इसी लालच में बिनोदिनी भी अपने मायके में ही पड़ी रहती है.
चंद्रलेखा अपनी शादी वाले दिन ही किसी अंग्रेज़ के साथ भाग गई थी. अब घर में कोई उसकी बात नहीं करता. वैसे लोग बताते हैं कि थोड़े दिनों पहले ही उसका बच्चा हुआ है. जज ठाकुर और ममता जी उसके बच्चे को देखने के लिए अंदर से तो मरे जा रहे हैं. लेकिन सामने से ऐसे दिखाते हैं कि कोई फर्क ही नहीं पड़ता.

डब्बू यानी
देबजानी से छोटी है
ईश्वरी. बारहवीं क्लास में पढ़ती हैं. स्पोर्ट्स में भी आगे है. और लड़कों को हड़काने के मामले में भी. पक्की दिल्ली वाली लड़की है. वो भी मॉडर्न स्कूल वाली. वो हमेशा डब्बू को सपोर्ट करती है. और एक हैं
भूदेवी चाची. यानी अ
शोक नारायण ठाकुर की पत्नी. बहुत वहमी हैं. उनको लगता है उनकी सास की आत्मा उनके अन्दर आती है. उनकी सास उसी हवेली से गिरकर मरी थीं. जिसमें वो लोग रहते हैं.

अब अशोक नारायण वो हवेली एक बिल्डर को बेचने वाले हैं. वो बिल्डर हवेली को तोड़कर वहां एक बड़ी बिल्डिंग बनवायेगा. जिसमें एक फ्लैट वो अशोक नारायण के परिवार को भी दे देगा.
भूदेवी को लगता है कि उसकी सास वो हवेली टूटने नहीं देगी. इसीलिए बार-बार उसकी बॉडी में आ जाती है. और कहती है, मैं यहां कुछ भी बनने नहीं दूंगी. अशोक नारायण का अपनी नौकरानी से अफेयर चल रहा है. भूदेवी एक दिन दोनों को साथ देख लेती है. अब वो बवाल काट देती है. अशोक नारायण नौकरानी के साथ चला जाता है. भूदेवी डब्बू के कमरे में रहने लगती है. बहुत दिनों बाद अशोक नारायण वापस आ जाता है. माफ़ी मांगता है. भूदेवी माफ़ कर देती है.
कहानी बहुत सुनी-सुनाई सी है. हिंदी तर्जुमा कहीं-कहीं पर बहुत उबाऊ है. वाक्य इतने लंबे हैं कि कभी-कभी पूरा पैराग्राफ सिर्फ एक ही वाक्य है. आज के डार्क और रियल फिक्शन वाले टीवी सीरियल और किताबों के बाद ये पढ़ना बहुत बचकाना सा लगा. शायद 15 साल की उम्र में ये नॉवेल बहुत अच्छी लगी होती. एक बार में पूरी पढ़ने का मन नहीं करता. ब्रेक ले-लेकर कई दिनों में पढ़ी जाने वाली किताब लगी. भूत-प्रेत वाला हिस्सा जबरदस्ती का घुसेड़ा गया सा लगा. ना तो वो मजाकिया था. ना डरावना. ना ही उससे कहानी आगे बढ़ी. बस वहीं गोल-गोल चक्कर लगाती रही. जर्नलिज़म और पॉलिटिक्स थोड़ी और होती तो ज्यादा मज़ा आता पढ़ने में. क्योंकि वही हिस्से सबसे बांधने वाले हैं, जहां 84 के दंगों की तहकीकात का ज़िक्र है. डब्बू एक साधारण सी लड़की है. कभी डरी हुई सी. प्यार के लिए आंसू बहाती हुई. अपने प्यार डिलन के धोखे की वजह से ग़मज़दा सी लड़की. लेकिन आखिर में इतनी हिम्मती कि देश की राजनीति ही पलट देती है.
इस नॉवेल में कई जगह जेन ऑस्टिन की 'प्राइड एंड प्रेजुडिस' पढ़ने वाली फीलिंग आती है. जिस तरह से डिलन की ख़ूबसूरती को बताया गया है. तीखी नाक. उठी हुई ठुड्डी. खूबसूरत आंखें. प्राइड एंड प्रेजुडिस वाले डार्सी को पढ़ने जैसा लगता है. बड़ा परिवार है. शादियां हैं. रिश्ते बन रहे हैं. टूट रहे हैं. फिर बन रहे हैं. एक फैमिली ड्रामे के अलावा सिखों पर अत्याचार, पॉलिटिक्स, प्रधानमंत्री और एंटी-डेफिमेशन बिल जैसी चीज़ें हैं, जो पढ़ना इंटरेस्टिंग लगता है.