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संभाजी भिडे के आम खाकर बच्चे पैदा करने वाले बयान की निंदा करना बड़ी गलती है!

इस कलयुग में संभाजी भिडे एक मात्र सतयुगी आदमी हैं.

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संभाजी भिडे
कंट्रोवर्सियल नेता संभाजी भिडे के बयान की काट खोजना किसी के बस की बात नहीं है. सिर्फ बिप्लब देब से कुछ उम्मीद थी लेकिन अब वो भी नहीं रही. संभाजी ने नासिक में स्पीच दी कि उनके बगीचे के आम खाकर तमाम नि:संतान जोड़ों को 'पुत्र रत्न' की प्राप्ति हुई. आंकड़ा भी पेश किया. कहा 180 के लगभग दम्पत्तियों ने उनके बगीचे के आम खाए. 150 को संतान लाभ हुआ. ये आंकड़ा कहां से निकला प्लीज क्वेस्चन मत करना. जो बात उन्होंने बताई है वो इधर कलयुग में कम ही सुनने को मिलती है. हालांकि इन्हीं तरीकों से सतयुग, त्रेता और द्वापर में संतानें उत्पन्न होती रही हैं. न यकीन आए तो ये लिस्ट देख लो. जिसके बाद कोई संभाजी की बात का विरोध नहीं कर पाएगा.

कथा नंबर एक

बिहार और पूर्वी यूपी में जीवित पुत्र व्रत रखा जाता है. इसके पीछे कथा ये है कि एक गांव में एक बार भारी बारिश हो रही होती है. हफ्तों सूरज नहीं निकलता. एक विधवा सूरज से प्रार्थना करती है कि आप प्लीज बारिश रोक दो तो मैं अपनी बेटी से आपकी शादी करा दूंगी. सूरज उसकी बात सुनकर सिर्फ उसके घर पर धूप कर देते हैं, बारिश बंद कर देते हैं. उसके कुछ समय बाद विधवा की बेटी बड़ी होती है. सूरज भगवान कई बार आते हैं लेकिन बुढ़िया टरका देती है. आखिर सूरज भगवान गुस्सा हो जाते हैं और एक दिन आकर उसके घर के बाहर बोए साग पर सूसू कर देते हैं. विधवा की बेटी साग बनाकर खाती है तो प्रेगनेंट हो जाती है. बच्चा हो जाता है वो भी बिना ब्याह. उसे गांव वाले चिढ़ाते हैं. आखिर सूरज भगवान आकर कहते हैं कि ये मेरा बच्चा है. उसी के लिए ये व्रत रखा जाता है.

कथा नंबर दो

ये दरअसल एक नंबर पर होनी थी लेकिन दो पर है तो भी क्या दिक्कत. रामायण की कथा है. दशरथ के बच्चे नहीं हो रहे थे. उन्हें गुरु वशिष्ठ ने खीर दी और दशरथ ने अपनी तीनों पत्नियों को खिलाया. जिससे उनके घर चार पुत्र रत्न उत्पन्न हुए.
दशरथ घर किलकारी
दशरथ घर किलकारी

कथा नंबर तीन

रामायण की ही कथा है कि वन में माता सीता का पुत्र लव खो गया था. सीता जी हैरान परेशान वशिष्ठ के पास पहुंचीं. गुरु जी ने कुश की पत्तियों से बालक की आकृति तैयार करके प्राण फूंक दिए. इस तरह कुश का जन्म हुआ. बाद में लव भी मिल गए.
लव कुश
लव कुश

कथा नंबर चार

सीता माता की खोज में लंका पहुंचे हनुमान जी. वहां जब उनकी पूंछ में आग लगा दी गई तो बुझाने के लिए समुद्र तट पर आए. आग बुझाने में उनके पसीने की एक बूंद मछली ने पी ली. जिसके गर्भ से एक बालक पैदा हुआ. नाम पड़ा मकरध्वज.

कथा नंबर पांच

ऋषि दुर्वासा के वरदान से कुंती को किसी भी देवता को बुलाने का बल मिला हुआ था. उन्होंने वरदान की टेस्टिंग के लिए सूर्य देव को बुला लिया. सूर्य आए तो कहा कि मैं भी वरदान देता हूं. पुत्र का. कुंती की शादी से पहले ही कान से बच्चा उत्पन्न हुआ. नाम पड़ा कर्ण.
इन पांचों कथाओं से स्पष्ट होता है कि पहले जिन तरीकों से बच्चे पैदा होते रहे हैं, उन्हीं तरीकों से संभाजी करा रहे हैं. इसमें न तो कुछ नया है न अनैतिक.


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