फिल्म- हैप्पी पटेल: खतरनाक जासूस
डायरेक्टर- वीर दास, कवि शास्त्री
एक्टर्स- वीर दास, मिथिला पालकर, मोना सिंह, शारिब हाशमी, सृष्टि तावड़
रेटिंग- 4 स्टार
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फिल्म रिव्यू- हैप्पी पटेल
वीर दास की नई फिल्म 'हैप्पी पटेल' कैसी है, जानिए ये रिव्यू पढ़कर.


'हैप्पी पटेल- खतरनाक जासूस' हिंदी सिनेमा की सबसे एक्सपेरिमेंटल कॉमेडी फिल्म है. जो बिल्कुल ही अटपटी, सनकी और अपनी तरह का सिनेमा है. मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा में कॉमेडी फिल्में लंबे समय से एक तय खाके पर बनती आ रही थीं. जो अब तकरीबन उबाऊ हो चला है. हालांकि बीच-बीच में 'डेल्ही बेली' टाइप की फिल्में आती हैं, जो उस एकरसता को तोड़ती हैं. मगर वो नाकाफी हैं. क्योंकि उनकी संख्या बेहद कम हैं. 'हैप्पी पटेल', 'डेल्ही बेली' से भी अलहदा किस्म की फिल्म है. मगर ये फिल्म सबके लिए नहीं है. न ही इसकी कोई टार्गेट ऑडियंस है. ये फिल्म किसी को भी अच्छी लग सकती है और बहुत सारे लोगों को अच्छी नहीं भी लग सकती है. मगर इस फिल्म के मेकर्स ने वो रिस्क लेना चुना. क्योंकि अब हिंदी सिनेमा की ऑडियंस डाइवर्सिफाई हो रही है. ऐसे में एक तबका ऐसा ज़रूर है, जिसे ये फिल्म भाएगी.
'हैप्पी पटेल' अपनी मूर्खता से अनभिज्ञ नहीं है. मगर अपने होने को वो बहुत सीरियसली भी नहीं लेती. और वो जो कुछ भी करती है, उसमें ऑल आउट जाती है. नो हाफ मेजर्स. इसलिए मैंने शुरुआत में ही कहा कि ये फिल्म सबके लिए नहीं है. मगर जिन्हें ये फिल्म पसंद आएगी, उनके लिए कंफर्ट वॉच बनेगी. ये कहानी एक ब्रिटिश लड़के हैप्पी पटेल की है. जिसे ये पता ही नहीं है कि वो इंडियन है. एक मिशन के लिए इंग्लैंड से इंडिया आता है. उसके 'दो बाप' हैं, जो स्पाय हैं. हैप्पी भी उनकी ही तरह बनना चाहता है. मगर उसमें टिपिकल स्पाय वाले गुण हैं नहीं. ये बात उसे भी पता है. इसलिए वो इंडिया आकर फेल होने के लिए रेडी है. क्योंकि न उसे हिंदी बोलनी आती है, न भारत के कल्चरल के बारे में ज़्यादा कुछ पता है.
जब उसे इस मिशन के लिए ट्रेन किया जाता है, तो शाहरुख खान उसके बड़े काम आते हैं. शाहरुख का कल्चर इम्पैक्ट कितना बड़ा है, ये आपको इस फिल्म में मालूम पड़ता है. हैप्पी 'तुम' को 'टॉम' बोलता है. वो फिल्म में जितनी भी बार 'तुम' शब्द बोलता है, उतनी बार बैकग्राउंड से टॉम नाम का एक व्यक्ति निकलकर आता है. वो कई शब्दों को गलत प्रोनाउंस करता है. जो थिएटर में बैठे हर व्यक्ति तो नहीं, मगर कुछ लोगों को ज़रूर फटकर हंसने पर मजबूर करता है.
हैप्पी की मुलाकात गोवा में रूपा नाम की एक लड़की से होती है. जब भी रूपा को कोई टच करता है, वो उसे थप्पड़ मार देती है. ये उसकी मसल मेमरी और रिफ्लेक्स एक्शन का हिस्सा है. क्योंकि वो एक डांसर. खराब डांसर! गोवा में हैप्पी को एक लोकल को-ऑर्डिनेटर दिया जाता है. जिसका नाम गीत है. मगर वो दिखता डिट्टो 'लाल सिंह चड्ढा' जैसा दिखता है. हालांकि इन दोनों ही सेल्फ रेफरेंशियल घटनाओं को फिल्म में कहीं एक-दूसरे से जोड़ा नहीं गया.
अगर आप ये समझने बैठ गए कि फिल्म में क्या चल रहा है, तब आप फन वाला पार्ट मिस कर देंगे. मसलन, फिल्म के क्लाइमैक्स में 'बेस्ट शेफ' नाम का एक कुकिंग कॉम्पटीशन होता है. पीछे बड़े परदे पर इसका शॉर्ट फॉर्म लिखा होता है- BC. हैप्पी को बताया जाता है कि शाहरुख खान की तरह बांहें फैलाने से कोई भी उसके प्रेम में पड़ जाएगा. एक मौके पर जब हैप्पी बांहे फैलाता है, तो गीत कहता है- 'डैडी'. ये ऐसी चीज़ें हैं, जो ट्रोप्स का पार्ट नहीं हैं. अब तक तो लगता था कि इस तरह की चीज़ें सिनेमा के लिहाज से कम गंभीर हैं. मगर ये फिल्म उस कॉन्सेप्ट को खारिज करती है. 'हैप्पी पटेल' बताती है कि सिनेमा में हर किस्म की चीज़ों के लिए जगह है. बस बनाने वाले का कन्विक्शन होना चाहिए. यहां आमिर खान की तारीफ करनी होगी कि वो उन्होंने 'हैप्पी पटेल' जैसी फिल्म को बैक किया, जो सफलता की गारंटी वाले टैग के साथ नहीं आती.
इस फिल्म को वीर दास और कवि शास्त्री ने मिलकर डायरेक्ट किया है. जब आप ये फिल्म देख रहे होते हैं, तो आप तकरीबन ये महसूस कर सकते हैं कि दो दोस्तों ने मिलकर ये फिल्म बनाई है. जो इस तरह के जोक्स करते हैं. आपको बस उन जोक्स में शामिल कर लिया गया है. अगर आपको मज़ा आया, तो ठीक. वरना आप ऑप्ट आउट कर सकते हैं. क्योंकि ये फिल्म खुद अपनी स्पूफ है. किसने सोचा था कि दो महीने के अंतराल में दो ऐसी फिल्में आएंगी, जो स्पाय जॉनर की दशा-दिशा को सिर के बल खड़ा कर देंगी. अब जो भी फिल्ममेकर स्पाय फिल्म बनाने जाएगा, वो वही पुरानी घिसी-पिटी चीज़ें नहीं कर पाएगा. क्योंकि अब इस जॉनर का दायरा बहुत बड़ा हो चुका है.
अगर आप ओवररीड करना चाहें, तो 'हैप्पी पटेल' को समावेशिता से जोड़कर भी देख सकते हैं. क्योंकि एक आदमी विदेश से अपने देश आया है. मगर इस देश में कोई उसका अपना है नहीं. उसे दोस्तियां करनी हैं. प्रेम में पड़ना है. केस सॉल्व करना है. मगर इससे पहले उन्हें वो लोग ढूंढने हैं. अपनी वाइब के लोग, जिसे वो अपनी ट्राइब बना सके. मगर दिल से ये एक एब्सर्ड कॉमेडी फिल्म है, जो आपको हंसाने के लिए नहीं. आपके साथ बैठकर हंसने के लिए बनी है.
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