फिल्म- बॉर्डर 2
डायरेक्टर- अनुराग सिंह
एक्टर्स- सनी देओल, वरुण धवन, मोना सिंह, दिलजीत दोसांझ, सोनम बाजवा, अहान शेट्टी, मेधा राणा
रेटिंग- 3 स्टार
फिल्म रिव्यू- बॉर्डर 2
कैसी है सनी देओल स्टारर कल्ट फिल्म 'बॉर्डर' का सीक्वल 'बॉर्डर 2' जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.
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जब 1997 में जेपी दत्ता की 'बॉर्डर' आई थी, तब वो सिर्फ एक फिल्म थी. जो कि कारगिल वॉर के तुरंत बाद आई. लोगों ने उससे कनेक्ट किया. जब भी वॉर फिल्मों का ज़िक्र होगा, 'बॉर्डर' हिंदी सिनेमा की सबसे मुकम्मल फिल्म मानी जाएगी. जो लाउड भी है. जिंगोइस्टिक भी है. और futility of war के बारे में भी बात करती है. खत्म भी बड़े वास्तविक और खूबसूरत तरीके से होती है. बेसिकली उस फिल्म के पास पर्पस था. वो चीज़ 'बॉर्डर 2' में नहीं मिलती. बाकी एक फिल्म के तौर पर ये ओरिजिनल फिल्म के काफी करीब पहुंचती है. स्केल बड़ा है. कैनवस ब्रॉड है. इमोशंस ऑन पॉइंट हैं. बस अपनी आवाज़ नहीं है. मगर ये किसी कुंठा से उपजी नहीं लगती. प्रेम की बातें ज़्यादा करती है. मगर पाकिस्तान को उस स्पेस से बाहर रखती है. कुछ एक खामियों से इतर 'बॉर्डर 2' एक वॉचेबल फिल्म है. इसकी त्रासदी ये है कि इससे कुछ ही दिन पहले 'इक्कीस' आई थी. जिसमें धर्मेंद्र ने काम किया. इस फिल्म में सनी देओल को Son Of Dharmendra नाम का क्रेडिट दिया गया है. जो कि थोड़ा विरोधाभासी लगता है. न ये फिल्म 'धुरंधर' और न 'इक्कीस'. क्योंकि ये इन दोनों ही फिल्मों से उन्नीस है.
'बॉर्डर 2' भी 1971 वॉर के दौरान की कहानी है. ये फिल्म आर्मी, नेवी और एयर फोर्स, तीनों फ्रंट पर जाती है. पाकिस्तान ने भारत पर तीनों तरफ से हमले किए हैं. उससे निपटने की ज़िम्मेदारी तीन लोगों की है. मेजर होशियार सिंह दहिया. फाइटर पायलट निर्मलजीत सिंह सेखों. और महिंद्र सिंह रावत, जो कि नेवी ऑफिसर हैं. इनके सीनियर ऑफिसर और ट्रेनर हैं फतेह सिंह कलेर. इन लोगों का फ्लैशबैक दिखाया जाता है कुछ वर्ष पहले, जब कलेर भी उनकी अकैडमी में तैनात थे. फ्लैशबैक के बाद उनकी कहानी वर्तमान में लौट आती है, जब वॉर चल रहा है. पाकिस्तान को तीनों मोर्चे पर ये लोग जवाब देते हैं. और जब इन तीनों से नहीं होगा, तो फतेह सिंह हैं ही. बाकी बातें वही हैं, जो आप आसानी से गेस कर सकते हैं.
'बॉर्डर 2' कुछ मौकों पर सरप्राइज करती है. मसलन, फिल्म के तीनों नायकों को युद्ध के मैदान में धकेलने से पहले वो उनकी निजी ज़िदगियों झांकती है. है वो टिपिकल चीज़ ही. मगर उसे मज़ेदार तरीके से बरता गया है. काफी हद तक जूही चतुर्वेदी माफिक. इसका ह्यूमर भी काफी टंग इन चीक है. जो कि बहुत ऑर्गैनिकल लगता है. इसलिए शुरुआती डेढ़ घंटे फिल्म के सबसे एंटरटेनिंग हिस्से हैं. क्योंकि उसके बाद मामला सीरियस हो जाता है.
फिल्म जब अपने पात्रों के पर्सनल स्पेस में घुसती है, जब बड़ी मार्मिक हो जाती है. फतेह और उसकी पत्नी वाला हिस्सा बहुत इफेक्टिव है. ये जोड़ा एक असहनीय पीड़ा से गुज़र रहा है. यहां थोड़ा सा 'दीवार' है, थोड़ी 'तलाश' है. 1971 के युद्ध में जाने से पहले फतेह की पत्नी उनसे कहती हैं- "मैंने जिस फतेह से प्यार किया था, वो कोई जंग नहीं हारा." मगर ये फिजिकल वर्ल्ड में चल रहे जंग की बात नहीं है. ये फतेह के भीतर बैठे उस घाव, उस अपराधबोध की बात है. जिसे पूरी संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ तैयार किया गया है.
इसमें तो कोई दो राय नहीं है कि 'बॉर्डर 2' इसलिए नहीं बनी क्योंकि वो बेहद ज़रूरी फिल्म है. जो बननी ही चाहिए थी. ये आर्टिस्टिक से ज़्यादा कॉमर्शियल मूव है. फिल्म के गानों से वो चीज़ ज़ाहिर भी होती है. 'घर कब आओगे' और 'तो चलूं' के रीमिक्स वर्जन आपको यहां बार-बार सुनने को मिलते हैं. ताकि आपको सनद रहे कि ये वही 'बॉर्डर' है. हालांकि फिल्म पर बाज़ारवाद कभी हावी नहीं होता. इसका क्रेडिट डायरेक्टर अनुराग सिंह दिया जाना चाहिए. क्योंकि उन्होंने फिल्म को उस धागे के पार नहीं जाने दिया, जहां फिसलन थी. दर्शकों के इमोशन को कैश करना कभी इसका मक़सद नहीं लगता.
इन दिनों हिंदुस्तान में कोई ऐसी फिल्म सफल नहीं हो सकती, जिसमें पाकिस्तान को बेहतर लोगों से बना मुल्क बताया जाए. पाकिस्तान हमारा 'दुश्मन' है. उस फ्रंट पर ये फिल्म कोई समझौता नहीं करती. मगर कई जगह कोमलता बड़ी पेश आती है. फिल्म में एक सीन है, जब युद्ध पर जाने से पहले निर्मलजीत सिंह का किरदार अपनी मां से मिलता है. मां उनकी लंबी उम्र का आशीर्वाद देती हैं. जब निर्मल अपने दुश्मनों को मारने की बात करता है, तो वो उससे कहती हैं- वो भी किसी के बच्चे हैं, जो अपनी मांओं से लंबी उम्र का आशीर्वाद लेकर आए हैं.
मगर कुछ चीज़ें ऐसी भी हैं, जो कचोटती हैं. जैसे युद्ध में मारे जाने वाले लोगों की शहादत का सेलीब्रेशन. अव्वल तो ये कि युद्ध अच्छी चीज़ नहीं है. इसमें लोगों की जाने जाती हैं. मगर बिना लड़े शांति भी नहीं आएगी. मगर इसका जश्न नहीं होना चाहिए. जब मैंने इस रिव्यू की शुरुआत में लिखा कि इस फिल्म के पास पर्पस नहीं है, तो इससे मेरा यही मतलब था. फिल्म का कोई फर्म स्टांस नहीं है. उसके हिसाब से युद्ध सही है या गलत, इस पर बात नहीं होती. सारा फोकस इस बात पर है कि फिल्म एंटरटेनिंग होनी चाहिए.
टेक्निकल डिपार्टमेंट में दो चीज़ें मन खट्टा करती हैं. पहला फिल्म का VFX, जो नेवी वाले सीन्स में बहुत ही नकली लगता है. और दूसरी फिल्म की लंबाई. ये 3 घंटे 19 मिनट लंबी फिल्म है. जिसे बड़ी आसानी से ट्रिम किया जा सकता था. जो इस फिल्म को और टाइट करती है. फिल्म देखने के अनुभव को बेहतर करती है.
पहली वाली 'बॉर्डर' के कास्ट से सनी देओल इकलौते एक्टर हैं, जो इस फिल्म का भी हिस्सा हैं. आपको फिर से अहसास होता है कि उस आदमी के ग्रैविटास और स्क्रीन प्रेज़ेंस की इतनी तारीफ क्यों होती है. दिलजीत दोसांज फिल्म के सबसे फाइन परफॉर्मर साबित होते हैं. क्योंकि अनुराग सिंह के साथ उन्होंने पहले भी काम किया है. इसलिए एक अंडरस्टैंडिंग है. प्लस उनका कैरेक्टर भी पंजाबी है, इसलिए वो इसमें बेहद सहज हैं. इंटेन्स और फनी के बीच उनका ट्रांजिशन प्रभावित करता है. वरुण धवन को फिल्म की रिलीज़ से पहले जितना ट्रोल किया गया था, उन्होंने उसका जवाब फिल्म में दिया है. हालांकि ये भी नहीं कहा जा सकता कि ये उनका बेस्ट काम है. मोना सिंह ने सनी देओल के फतेह सिंह की पत्नी का रोल किया है. वो इस फिल्म की इकलौती फीमेल कैरेक्टर हैं, जिनके हिस्से कुछ काम आया है. इस फिल्म में उनका काम सबसे मेमोरेबल है. मेधा राणा ने होशियार सिंह की पत्नी का रोल किया है. जो उनकी सीवी को मजबूत करेगा.
'बॉर्डर 2' निसंदेह एक अच्छी फिल्म है. मगर ये ओरिजिनल फिल्म की लेगेसी को चैलेंज नहीं कर पाएगी. ओरिजिनैलिटी इसका मुख्य गुण नहीं है. ये चीज इसके आड़े आती है. इसे एक मनोरंजक फिल्म माना जाएगा. मगर लंबे समय याद नहीं रखा जा सकेगा.
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