आज फिर सुरगा छूटा. सोनिया गांधी की बेटी श्रीमती प्रियंका गांधी वाड्रा यूपी में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी. कुछ ने कहा, 'प्रचार ही क्यों, वही मुख्य चेहरा होंगी.' तब तक खंडन आ गया. 'नहीं नहीं. सिर्फ अमेठी, रायबरेली के बाहर कुछ सीटों पर प्रचार करेंगी.' ये 'कुछ' कितना होगा, किसी किताब में नहीं लिखा. बस इतना बांचा गया है कि प्रियंका अगले महीने इलाहाबाद में एक फोटो प्रदर्शनी में सार्वजनिक रूप से शामिल होंगी और उसे ही शुरुआत मान लिया जाए. मानने की चली तो मैं ये मानता हूं कि ये कांग्रेस की बहुत बड़ी गलती होगी. इन छह वजहों से.
इन छह वजहों से यूपी में फेल होगा प्रियंका गांधी का ट्रंप कार्ड
एक बार फिर सुरगा छूटा है कि श्रीमती प्रियंका गांधी वाड्रा यूपी में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी.


# 1.

प्रियंका गांधी कांग्रेस के लिए प्रचार करेंगी, तो वंशवाद के विरोधियों को एक नया उदाहरण मिल जाएगा. अब तक प्रियंका पर हमला नहीं किया जाता था. ये मान लिया जाता था कि वो गैरराजनीतिक व्यक्ति हैं. सिर्फ मम्मी और भैया की मदद के लिए और एनजीओ टाइप काम देखने के लिए उनके इलाकों में जाती हैं. उन दो लोकसभाओं से बाहर निकलते ही ये तिरिंकाट बिट्टाकाट वाली सुरक्षा खत्म हो जाएगी. प्रियंका गांधी की यही सबसे बड़ी कमी मानी जाएगी. उनके पास सार्वजनिक जीवन का अनुभव ही क्या है. उन्होंने संगठन के लिए, लोगों के लिए आज तक क्या किया है. जब कुछ किया ही नहीं, तो किस मुंह से वोट मांगेंगी.
# 2.

प्रियंका का जिक्र आएगा, तो रॉबर्ट का भी जिक्र आएगा. मसल्स वाले रॉबर्ट. गुड़गांव वाले रॉबर्ट. लैंड-डील वाले रॉबर्ट. किसान रॉबर्ट. तो राहुल गांधी जब किसानों की बात करेंगे, मोदी को किसान-विरोधी बताएंगे, तो भाजपाई कहेंगे, 'अगर रॉबर्ट किसान हैं, तो उनके पीएम के किसान विरोधी होने में क्या बुरा है.' रॉबर्ट वाड्रा की बतौर व्यवसायी तमाम गतिविधियां जांच के घेरे में हैं और प्रियंका के पास इसका कोई तोड़ नहीं.
# 3.

प्रियंका गांधी आएंगी तो नयापन आएगा. वह जनता के साथ ज्यादा सहज हैं. हिंदी बोल लेती हैं. मिलनसार हैं. वगैरह वगैरह. लोगों को उनमें इंदिरा गांधी की छवि भी दिखती है. सब मान लिया. और इस मानने में ये भी मान लिया कि वो कांग्रेस के लिए ट्रंप कार्ड हैं. मगर सवाल ये है कि दूसरी चाल में कोई तुरुप का इक्का फेंकता है क्या. राहुल की तो नहीं कह सकता, पर सोनिया को तो जरूर पता होगा कि यूपी में कांग्रेस की हालत क्या है. 28 सीटें थीं पिछले विधानसभा चुनाव में. बेटे की तमाम भागदौड़ के बावजूद. इस बार वही बच जाएं, तो काफी है. ऐसे में प्रियंका कार्ड चलाने से क्या होगा. कुछ सीटें बढ़ेंगी भी, तो भी लॉन्ग रन में यही मैसेज जाएगा कि प्रियंका बिटिया चुनाव जिताऊ नहीं हैं.
# 4.

मानने पर उतारू हों, तो ये भी मान लें कुछ देर के लिए कि प्रियंका गांधी के आने के बाद कांग्रेस 50 सीटें पार कर जाएगी. श्रेय प्रियंका को मिलेगा. और फिर झिड़की उनके भैया राहुल गांधी के हिस्से आएगी. अभी ही तमाम नेता-विधायक पीठ-पीछे तो छोड़िए, सामने आकर उनके नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं. अगर प्रियंका सफल हो गईं, तो फिर राहुल का पार्टी चलाना मुश्किल हो जाएगा. प्रियंका लाओ का कोरस तेज हो जाएगा.
# 5.

कांग्रेस फौरी फायदा देख रही है, जबकि उसकी चिंता 2019 का लोकसभा चुनाव होना चाहिए. आम आदमी पार्टी और नीतीश कुमार जैसे स्थानीय क्षत्रप तेजी से उसकी जमीन खा रहे हैं. यही आलम रहा, तो तीसरे-चौथे मोर्चे जैसे एक संयुक्त विपक्ष में भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी नहीं रहेगी. 44 सीटें लाना भी मुश्किल हो जाएगा. मगर फैसले लोकसभा के लिहाज से नहीं किए जा रहे हैं. कांग्रेस उन सब सूबों में जूनियर पार्टनर बनने को तैयार है, जहां दो-ढाई दशक पहले तक वो अपने दम पर सत्ता संभालती थी. प्रशांत किशोर का भागकर मुलायम के पास जाना और फिर कुछ ही दिनों में मुलायम का गठबंधन की बातों को दुत्कार देना, कांग्रेस का बचा-खुचा रसूख घटाता है.
# 6.

प्रियंका गांधी के आने के बाद शीला दीक्षित का क्या होगा, जिन्हें जोर-शोर से बस में बिठाकर यूपी नापने भेज दिया गया था. और राज बब्बर, जो खुद को किसी सीएम कैंडिडेट से कमतर नहीं समझते. जो प्रशांत किशोर को कुछ नहीं समझते. और कांग्रेस यही नहीं समझती कि उसे किसके सहारे चलना है. पीके की रणनीति या कांग्रेस का झंडा ढो रहे नेताओं-कार्यकर्ताओं के हिसाब से.
कांग्रेस यूपी में तीन टुकड़ों में मरी. पहला, जब राजीव गांधी को ये खुशफहमी हुई कि वो अयोध्या में ताला खुलवाकर हिंदुओं के वोट बटोर लेंगे. इसी भरम के चलते 1989 में उन्होंने चुनाव प्रचार की शुरुआत अयोध्या से की. नतीजे आए तो लोकसभा में बीजेपी 2 से 88 पर पहुंच चुकी थी और सूबे में कांग्रेस 100 से नीचे पहुंच गई थी 425 सदस्यीय विधानसभा में.
दूसरा, जब जून 1996 में कांग्रेस अध्यक्ष नरसिम्हा राव ने यूपी में बीएसपी के साथ गठजोड़ किया. कांशीराम ने पंजे को कितनी सीटें दीं? सिर्फ 125. उस दिन के बाद से कांग्रेस गठबंधन के लिए लालायित पार्टी भर रह गई. सत्ता पर सीधा दावा खत्म हो गया.

कांग्रेस का एक समर्थक.
तीसरी बार तब, जब उसने पहले तो दावा किया कि सीएम कैंडिडेट लाएंगे, किसी से गठबंधन नहीं करेंगे और फिर भाग-भागकर सब पार्टियां समेटने में लग गई. इस छीछालेदर की शुरुआत 2014 में ही हो गई थी. जब सूबे में सांसदों के नाम पर सिर्फ दो, मां और बेटा, जिनकी सरकार चली गई. बाकी सब मंत्री हार गए. बेनी प्रसाद वर्मा तो हारे और पार्टी छोड़ चले गए. जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह लुटियंस दिल्ली की राजनीति में मगन हैं. सूबे में न काम किया, न छवि बना पाए. और ऐसे में प्रियंका गांधी को उतारने के बाद भी अगर 28 का आंकड़ा पार नहीं हुआ, तो फिर अगली कांग्रेस कौमी एकता दल और पीस पार्टी की जूनियर पार्टनर बन चुनाव लड़े, तो ताज्जुब नहीं होगा.
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