कल्पना कीजिए, हालांकि ऐसी कोई कल्पना करना कल्पना में भी ठीक नहीं है मगर अब जो है सो है. कल्पना कीजिए आपकी अचानक से तबीयत खराब हो जाती है या आपके साथ कोई दुर्घटना हो जाती है. ऐसा आपके परिवार के साथ भी हो सकता है. बताने की जरूरत नहीं कि आप नजदीकी अस्पताल का रुख करेंगे. बुरी परिस्थिति है लेकिन आपके हेल्थ इन्शोरेंस है और नजदीक का अस्पताल भी आपकी बीमा कंपनी के कैशलेस नेटवर्क अस्पताल का हिस्सा है. मगर ये क्या, जब आप अस्पताल पहुंचने हैं तो आपसे कहा जाता कि आपके बीमा पर इलाज तो होगा मगर कैशलेस नहीं. ख़बर ये है कि AHPI ने 1 सितंबर से अस्पतालों में Bajaj Allianz के हेल्थ पॉलिसी धारकों को कैशलेस इलाज (Bajaj Allianz cashless news) देने से मना कर दिया है. मैक्स हॉस्पिटल ने ऐसा ही आदेश स्टार हेल्थ के बीमा धारकों के लिए जारी किया है.
अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनियों की लड़ाई में हम और आप क्यों पिस रहे हैं?
AHPI ने 1 सितंबर से अस्पतालों में Bajaj Allianz के हेल्थ पॉलिसी धारकों को कैशलेस इलाज (Bajaj Allianz cashless news) देने से मना कर दिया है. मैक्स हॉस्पिटल ने ऐसा ही आदेश स्टार हेल्थ के बीमा धारकों के लिए जारी किया है. मगर हम आपको आपबीती बताने आए हैं.


हो सकता है इतना पढ़कर आप समझ गए हों कि हमारा इशारा किस तरफ है. मगर हम अखबार और सोशल मीडिया से इतर इस परिस्थिति का सामना कर चुके अपने एक साथी से पहले आपको मिलवाना चाहते हैं. फिर बात करेंगे. हम आपको आपबीती बताने आए हैं.
आपबीतीहमारे एक साथी हैं जिनके किशोर बेटे को कुछ महीने पहले एक गंभीर बीमारी का पता चला. ऐसी बीमारी जिसका नाम ही अपने आप में इंसान को हिला देने के लिए काफी है मगर हमारे साथी ने ये सोचकर खुद की थोड़ी तसल्ली दी कि चलो जो है सो है. अपने पास हेल्थ इन्शोरेंस है जिसमें ये बीमारी कवर है. बीमारी के इलाज में माहिर जिस अस्पताल में इलाज होना है, वो भी बीमा कंपनी के कैशलेस नेटवर्क का हिस्सा है.
कैशलेस मतलब बीमा कंपनी की वो सुविधा जिसकी बदौलत आप और हम नेटवर्क अस्पताल में बिना पैसा दिए इलाज करवा सकते हैं. हालांकि इसकी लिमिट आपको बीमा पॉलिसी पर निर्भर होती है और बाकी शर्तें भी. मसलन कौन सी बीमारी कवर है और कौन सा रूम मिलेगा. मरीज को नेटवर्क अस्पताल में बस अपना बीमा पॉलिसी नंबर या कार्ड बताना होता है. इसके बाद अस्पताल या मरीज अपनी कंपनी को इलाज की सूचना देते हैं और फिर इलाज शुरू हो जाता है. इलाज के बाद संबंधित अस्पताल कागजी प्रक्रिया पूरी करके बीमा कंपनी से पैसा लेता है.
अगर इलाज का खर्च लिमिट से ज्यादा हुआ तो फिर बैलेंस अमाउन्ट मरीज को सीधे अस्पताल को देना होता है. एक लाइन में कहें तो कैशलेस ही वो लालच है जिसकी वजह से ज्यादातर लोग हेल्थ इन्शोरेंस लेते हैं. हमारे साथी भी ऐसे ही एक कैशलेस बीमा पॉलिसी के धारक हैं.
लेकिन आगे जो हुआ वो पहले ही हमने बता दिया. दिल्ली शहर के इस नामी अस्पताल ने उनकी बीमा कंपनी के कार्ड पर कैशलेस इलाज देने से मना कर दिया. अस्पताल इलाज के लिए तो तैयार था मगर पूरा पैसा लेकर. हमारे साथी के पास ऑप्शन था कि वो बिल लगाकर अपनी बीमा कंपनी से पैसा ले सकते थे.
अब जरा सोचिए. सोचकर ही सिरहन दौड़ती है कि इतनी गंभीर बीमारी और ऊपर से अब पैसे का इंतजाम करो. अगर नहीं करना तो फिर दूसरे अस्पताल के चक्कर लगाओ जो कैशलेस इलाज करे. यहां तक पढ़कर अगर आपको लग रहा है कि पक्का हमारे साथी के पास Bajaj Allianz या स्टार हेल्थ का बीमा रहा होगा तो अब झटका लगने की बारी आपकी है.
हमारे साथी के पास इन दोनों कंपनियों का नहीं बल्कि एक और बड़ी बीमा कंपनी की पॉलिसी है. उनके साथ ऐसा क्यों हुआ और उसके बाद क्या हुआ. वो बताते हैं मगर पहले जरा इन दोनों कंपनियों को स्टोरी का हिस्सा पूरी तरीके से बना लेते हैं.
Bajaj Allianz और स्टार हेल्थ को नापिछले हफ्ते Association of Healthcare Providers (India) (AHPI) ने निर्णय लिया कि आने वाले 1 सितंबर से अस्पतालों में Bajaj Allianz के बीमा धारकों को कैशलेस इलाज नहीं मिलेगा. इसके तुरंत बाद खबर आई कि मैक्स हॉस्पिटल ने ऐसा ही आदेश स्टार हेल्थ के बीमा धारकों के लिए जारी किया है. (AHPI) और देश के एक बड़े नेटवर्क अस्पताल का ये निर्णय उस समय आया जब देश में बीमा का प्रबंधन देखने वाली संस्था IRDAI अस्पतालों को 100 फीसदी कैशलेस इलाज के लिए जोर दे रही है.
IRDAI ने 1 अगस्त 2024 से ही सभी अस्पतालों को कैशलेस इलाज का आदेश दिया हुआ ताकि मरीजों को दिक्कत कम हो. लेकिन इधर तो अलग ही कहानी है. अपने आदेश के पीछे (AHPI) का कहना है कि वो कैशलेस सर्विस इसलिए नहीं देना चाहते क्योंकि बजाज ने इलाज के खर्चों में पिछले कई सालों से कोई बदलाव नहीं किया है.
(AHPI) ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा,
भारत में चिकित्सा मुद्रास्फीति हर साल 7-8 प्रतिशत के दायरे में रहती है, जो कर्मचारियों, दवाओं, खाने वाली सामग्रियों, और कई अतिरिक्त खर्चों में वृद्धि के कारण बढ़ रही है. अस्पताल अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं, लेकिन पुरानी दरों पर काम करना व्यावहारिक नहीं है, कम दरों पर तो बिल्कुल नहीं. ऐसी शर्तों के तहत काम जारी रखने से मरीज़ों की देखभाल से समझौता होने का खतरा है, जिसकी (AHPI) और उसके सदस्य अनुमति नहीं दे सकते.
आसान भाषा में कहें तो बीमा कंपनी रूम रेंट से लेकर डॉक्टर की फीस और अन्य दूसरे खर्चों को बढ़ाने को तैयार नहीं है और अस्पतालों के लिए वो प्रेक्टिकल नहीं है. कैशलेस में तो उनको लिमिट तक इलाज करना पड़ेगा मगर नगद में ऐसा नहीं है. माने मरीज का चाहे जितना खर्च हो, बीमा कंपनी से उसे कितना मिले. अस्पताल को क्या, उसे तो भुगतान पहले ही हो गया. कुछ ऐसा ही मामला स्टार और मैक्स का भी है.
क्योंकि ये एक गंभीर और जटिल परिस्थिति है तो बीमा कंपनियों का प्रतिनिधितव करने वाली General Insurance Council (GI Council) हरकत में आई. उसने (AHPI) के इस निर्णय का विरोध किया. (GI Council) का कहना है कि ऐसा कोई भी निर्णय अंत में मरीजों पर ही असर डालेगा. उनको दिक्कत होगी. खबर लिखे जाने तक दोनों के बीच मुखामुखम जारी है.
क्या होगा वो तो भविष्य की गोद में मगर आप कहीं मत जाना. क्योंकि आपका वो जानना जरूरी है जो हमारे साथी के साथ घट गया. तो जैसा हमने बताया कि दिल्ली के उस नामी अस्पताल ने कैशलेस इलाज से मना कर दिया. अस्पताल के अपने कारण हैं. मसलन वही कि पैसा टाइम से नहीं आता आदि. हमारे साथी के बच्चे के लिए जरूरी था कि उसका इलाज इसी अस्पताल में हो.
फिर स्टार्ट हुई तमाम तरह की कोशिशें. कस्टमर केयर से लेकर ईमेल का लंबा दौर चला. बीमा कंपनी के मैनेजर से लेकर अस्पताल प्रबंधन से कई दिनों की बातचीत हुई. आपसे क्या छिपाना. अस्पताल को कोर्ट में ले जाने की धमकी भी दी और कई बड़े लोगों से फोन भी करवाया.
आखिरकार प्रयास काम आया और अस्पताल कैशलेस इलाज के लिए मान गया मगर एक शर्त के साथ. सिर्फ इस बार के लिए. आगे कोई भी इलाज होगा तो पैसा देकर.
अब तक आपको समझ आ गया होगा कि हम असल में क्या बताना चाहते हैं. बात Bajaj Allianz या स्टार हेल्थ की नहीं है. क्योंकि हमारे साथी इस दरमियान खूब परेशान रहे तो उनको पता चला कि कैशलेस इलाज से मना करने वाली नौटंकी पिछले कई महीनों से जारी है. अस्पतालों ने अपनी पसंदीदा बीमा कंपनी चुन ली है. अगर बीमा उसका नहीं तो फिर कैशलेस नहीं.
ये एक नई मुसीबत है जो हमारे सामने है. कड़वी हकीकत ये कि इसका कोई इलाज भी नहीं.
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