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हमसे दोस्ती करोगे: ftii के स्टूडेंट्स, नए चेयरमैन अनुपम खेर से

वो Film and Television Institute of India जिसमें डेविड लीन, सत्यजीत रे और घटक जैसों ने पढ़ाया. जहां से दर्जनों लैजेंडरी एक्टर्स, एडिटर्स, टेक्नीशियंस और डायरेक्टर्स निकले. वहां की लैगेसी अब अनुपम के हाथ है.

बुधवार को ही अनुपम खेर को ftii का नया चेयरमैन बनाया गया और उसी दिन जानकारी मिली कि पुणे के इस फिल्म इंस्टिट्यूट ने 5 छात्रों को निकाल दिया है. इसलिए क्योंकि उन्होंने संस्थान प्रशासन के उस फैसले का विरोध किया जहां शूटिंग के नियमों में बदलाव किया गया और तीन दिन का शूट उनसे दो दिन में खत्म करने को कहा गया. 2016 के पूरे बैच ने उसका विरोध करते हुए इस एक्सरसाइज का बहिष्कार किया. और डायरेक्शन, सिनेमैटोग्राफी, साउंड डिजाइन, एडिटिंग और आर्ट डायरेक्शन के वो पांच स्टूडेंट जिन्होंने प्रोडक्शन मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया था उन्हें तीसरे सेमेस्टर के दौरान कैंपस से निकाल दिया गया है.

उन्हें हॉस्टल खाली करने को कहा गया है.

ये फैसला रवाना हो रहे चेयरमैन गजेंद्र चौहान के कहे पर लिया गया या कैसे.. पता नहीं, लेकिन ये घटनाक्रम कला-विरोधी और छात्र-विरोधी है. फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट कोई गांव की पांचवीं की सरकारी स्कूल नहीं है जहां डंडा चलाकर हर चीज मास्टर करता है. ये देश और विश्व में रचनात्मकता और आर्ट के शीर्ष केंद्रों में से एक है. यहां के छात्रों को जब तक आप बराबरी का मनोभाव नहीं देंगे तब तक आप प्रशासनिक रूप से अकुशल ही कहलाएंगे. इतना ही नहीं, चेयरमैन और प्रशासन से भी उम्मीद की जाती है कि वो पढ़ाने में और कोर्स को चलाने के प्रोसेस में भरपूर आज़ादी और इनोवेशन का प्रदर्शन करें.

"दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे" जिसमें अनुपम का पात्र अगली पीढ़ी के बच्चों का अभिभावक नहीं बल्कि उनका दोस्त बनता है. (फोटोः यशराज फिल्म्स)
“दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे” जिसमें अनुपम का पात्र अगली पीढ़ी के बच्चों का अभिभावक नहीं बल्कि उनका दोस्त बनता है. (फोटोः यशराज फिल्म्स)

अपनी नियुक्ति के बाद अनुपम खेर ने बहुत पॉज़िटिव बात कही है और असंतोषजनक भी. उन्होंने कहा, “मेरे लिए ये बहुत महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि कभी-कभी ही होता है जब आपको उस जगह का प्रमुख बनने का मौका मिले जहां आप कभी स्टूडेंट थे. मैं अपनी जर्नी की शुरुआत पिछली बातों के बारे में सोचकर नहीं करना चाहता. मैं बहुत आशावान आदमी हूं और कभी भी चीजों की शुरुआत किसी विवाद या नेगेटिविटी से नहीं करता हूं. मैं क्लियर माइंड के साथ संस्थान में जाऊंगा और जितना ज्यादा काम कर सकूंगा उतना करूंगा.”

ये तो थी उनकी वो बात जो बहुत पॉजिटिव थी.

लेकिन फिर उनसे जब पूछा गया कि क्या आप संस्थान में कुछ बदलाव करने के बारे में सोच रहे हैं तो उन्होंने कहा, “अभी तो मैं बदलाव करने के बारे में सोच भी नहीं रहा हूं. वहां पर काम बहुत तेज गति से चल रहा है.”

ये बात परेशान करती है.

लेकिन फिर उन्होंने ये भी कहा था, “मेरे अंदर का टीचर वहां के स्टूडेंट्स को कुछ चीजें सिखाएगा और बदले में उससे भी बहुत कुछ सीखेगा. मेरे लिए यह कार्यकाल सीखने का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अनुभव रहेगा. सही इरादा होना बहुत जरूरी है, जो मेरा है. मैं वहां जाऊंगा और देखूंगा कि क्या किया जाना चाहिए.”

तो क्या किया जाना चाहिए उसकी लिस्ट ftii की स्टूडेंट कम्युनिटी ने उनके वहां जाने से पहले ही दे दी है. इस फिल्म संस्थान के छात्र संगठन ने गुरुवार को अनुपम के नाम एक ओपन लेटर लिखा. इसमें उन्होंने अपनी पढ़ाई और कैंपस को लेकर व्यावहारिक परेशानियां बताई हैं जो पूरी तरह जायज हैं. उम्मीद है ‘बहुत आशावान आदमी’ अनुपम खेर इस ख़त को पढ़ेंगे और छात्रों की सारी मांगें पूरी करेंगे.

मि. अनुपम खेर
प्रिय सर,

1. FTII देश का एक शीर्ष संस्थान है जिसे इस उद्देश्य से शुरू किया गया था कि यहां फिल्ममेकिंग के अलग-अलग पहलुओं की शिक्षा दी जा सके. लेकिन धीरे-धीरे इसे ऐसे इंस्टिट्यूट में बदला जा रहा है जहां पैसे कमाने के लिए शॉर्ट कोर्स चलाए जा रहे हैं. हमारा पूरी विनम्रता से मानना है कि यहां चल रहे ये शॉर्ट टर्म कोर्स इतनी कम अवधि में फिल्म मेकिंग का ज्ञान नहीं दे सकते.

जैसे यहां “Short Course in Fiction Writing for Television” चलाया जा रहा है जो सिर्फ 20 दिन का है और जिसके लिए हर स्टूडेंट से 20,000 रुपए लिए जा रहे हैं. एक लघु अवधि के कोर्स के हिसाब से और समाज के खास तबकों से आने वाले स्टूडेंट्स के लिए ये बहुत ज्यादा महंगा है.

दिग्गज अमेरिकी एक्टर रॉबर्ट डिनीरो के साथ अनुपम जिनके वे बड़े फैन हैं. एक एक्टर को शिक्षित करने का तरीका डर नहीं हो सकता. (फोटोः अनुपम खेर)
दिग्गज अमेरिकी एक्टर रॉबर्ट डिनीरो के साथ अनुपम जिनके वे बड़े फैन हैं. एक एक्टर को शिक्षित करने का तरीका डर नहीं हो सकता. (फोटोः अनुपम खेर)

एक सरकारी संस्थान जिसका मकसद सभी वर्गों के स्टूडेंट्स को शिक्षा देना है उसका एजेंडा पैसे कमाना नहीं होना चाहिए. जो कि अभी इन लघु अवधि के कोर्सेज़ का उद्देश्य लग रहा है. ये न सिर्फ यहां है बल्कि देश के बाकी सरकारी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में भी हो रहा है.

2. पिछले एक साल में यहां के प्रशासन ने “ओपन डे” और “फाउंडेशन डे” जैसे आयोजनों पर फिज़ूल पैसा बहाया है. हम छात्र-छात्राओं का मानना है कि जितना रुपया कैंपस के सामने लाइट्स और सेट के टुकड़े खड़े करने में किया जा रहा है वो यहां के बुनियादी ढांचे पर खर्च किया जा सकता है. उस रुपये से ऐसे नए उपकरण खरीदे जा सकते हैं और पुराने उपकरणों की मरम्मत की जा सकती है जिनसे हमें अपने प्रोजेक्ट समय पर खत्म करने में मदद मिलेगी.

3. नया सिलेबस (CBCSS) जो लाया गया उसमें दिक्कतें हैं. चलते सेमेस्टर के बीच में सिलेबस में से वर्कशॉप और कक्षाएं घटा दी गई हैं. इसके अलावा नए क्रेडिट बेस्ड सिस्टम को लेकर तो फैकल्टी के बीच में भी कनफ्यूजन है. एक साल हो गया है ये सिलेबस आए, अब इसकी समीक्षा की जानी चाहिए ताकि सुधार हो सके.

इसके अलावा एडमिशन के वक्त ही स्टूडेंट्स को पूरा सिलेबस दे दिया जाना चाहिए जो FTII प्रशासन ने अभी तक नहीं किया है.

4. अभी जितने भी लाइट-मैन हैं वो ठेका-मजदूर हैं जो पहले नियमित हुआ करते थे. ये संस्थान हफ्ते में 5 दिन चलता है. ऐसे बहुत से मौके रहे हैं जब इन्होंने हफ्ते में 6 से 7 दिन काम किया है. जब कभी भी छठा दिन हो जाता है तो लाइट-मैन को उसका पैसा नहीं दिया जा रहा.

5. देश भर के संस्थानों और विश्वविद्यालयों में अभी कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर ही फैकल्टी रखने का कल्चर बढ़ रहा है. ftii में भी अभी ज्यादातर फैकल्टी कॉन्ट्रैक्ट बेस पर है. उन्हें नियमित फैकल्टी जैसे लाभ भी नहीं मिल पा रहे हैं. वे ऐसे माहौल में जी रहे हैं जहां हर समय डर सताता है कि कब प्रशासन उन्हें नौकरी से निकाल देगा.

पिछले साल ftii में कॉन्ट्रैक्ट वाले सफाईकर्मी स्टाफ के लोगों को निकाल दिया था, तब स्टूडेंट्स उनके समर्थन में धरने पर बैठे.
पिछले साल ftii में कॉन्ट्रैक्ट वाले सफाईकर्मी स्टाफ के लोगों को निकाल दिया था, तब स्टूडेंट्स उनके समर्थन में धरने पर बैठे.

6. हमारे संस्थान के स्टाफ और फैकल्टी को उनकी सैलरी भी टाइम पर नहीं मिल रही है. ऐसे वाकये रहे हैं जब उनकी सैलरी 3 महीने तक लेट हुई है. अपने संस्थान में सब कोर्स चलाने के लिए पर्याप्त संख्या में फैकल्टी भी नहीं है और इसी वजह से सिलेबस लागू करने में दिक्कत हो रही है.

7. स्टूडेंट्स से लिखित में लिया जा रहा है कि वो अपने कोर्स ‘टाइम पर’ खत्म कर ही लेंगे. लेकिन वहीं दूसरी ओर प्रशासन के लोग उन्हें वो ज़रूरी संसाधन ही नहीं दे रहे जिनकी मदद से प्रोजेक्ट टाइम पर पूरे किए जा सकते हैं.

8. नए सिलेबस में एक्सरसाइज के नियमों में सीमाएं लाई गई हैं. जैसे कि सैकेंड ईयर में डायलॉग एक्सरसाइज़ में जो नियम लाए गए हैं. ये सीमाएं व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हैं. जैसे 3-दिन 8 घंटे की शिफ्ट को घटाकर 2-दिन 12 घंटे की शिफ्ट कर दिया गया है जो कि बेहद थका देने वाला है. लाइट-मैन, कारपेंटर, पेंटर, मेक-अप आर्टिस्ट और एक्टर लोगों को इतने लंबे तक काम करने के लिए मजबूर करना अमानवीय है.

और चूंकि स्टूडियो में ये पहली co-ordinated गतिविधि होती है, ऐसे में स्टूडेंट्स को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए. क्योंकि प्रमुख रूप से एक छात्र या छात्रा के सीखने के पहलू को प्राथमिकता दी जानी चाहिए न कि जल्दबाज़ी में उस एक्सरसाइज़ को खत्म करने की राह देखनी चाहिए. जब हम स्टूडेंट्स ने नियम में नए बदलाव पर सवाल उठाया तो हमें जवाब दिया गया कि ये कायदा तो ऐसे ही रहेगा. फिर जब हमने तय किया कि सब स्टूडेंट इस एक्सरसाइज का बहिष्कार करेंगे तो बिना कारण बताओ नोटिस के पांच स्टूडेंट्स को निकाल दिया गया.

9. फरवरी 2017 में हमारे छात्र संगठन को एक मेल मिला जिसमें लिखा गया था कि गवर्निंग काउंसिल ने तय किया है अब से एकेडमिक्स, सिलेबस, अनुशासन, फीस के ढांचे, स्टाफ, फैकल्टी और प्रशासन से जुड़े जितने भी मसले होंगे उनसे जुड़ी एकेडमिक काउंसिल की बैठक-चर्चाओं से छात्र प्रतिनिधियों को बाहर रखा जाएगा. स्टूडेंट तो एकेडमिक काउंसिल के प्राथमिक साझेदार और वोटिंग मेंबर हैं ऐसे में उनके प्रतिनिधियों को बाहर रखने का ये कदम असंवैधानिक है.

शनिवार को गुज़रे कुंदन शाह को ftii कैंपस में श्रद्धांजलि. वे यहीं के छात्र थे, यहां पढ़ाते भी थे. उन्हीं की शिक्षा यहां के स्टूडेंट्स कैरी करते हैं.
शनिवार को गुज़रे कुंदन शाह को ftii कैंपस में श्रद्धांजलि. वे यहीं के छात्र थे, यहां पढ़ाते भी थे. उन्हीं की शिक्षा यहां के स्टूडेंट्स कैरी करते हैं.

10. FTII ऐसे फिल्ममेकर्स पैदा करता रहा है जो कई मंचों पर काम कर रहे हैं. कुछ फिल्म इंडस्ट्री में काम करना चुनते हैं और कुछ दूसरे वैकल्पिक रास्ते ढूंढते हैं. लेकिन यहां कई बार देखा गया है कि स्टूडेंट्स को फिल्म इंडस्ट्री के ऐसे चलन को देखने को कहा गया है जिनमें सिनेमा को एक वस्तु की तरह देखा जाता है, एक आर्ट फॉर्म की तरह नहीं. वो आर्ट जो ज्यादा बड़े मानवीय उद्देश्यों की सेवा में लगता है.

शुक्रिया. (रॉबिन जॉय- प्रेसिडेंट, रोहित कुमार- जनरल सेक्रेटरी)

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