ऋत्विक घटक और सत्यजीत रे के साथ मृणाल सेन ही थे जिन्होंने भारत में ऐसी फिल्मोंका दौर शुरू किया जिनमें कहानियां बिलकुल यथार्थपरक होती थीं, उनमें कोई कमर्शियलमनोरंजन की बाध्यता वाली मिलावट नहीं होती थी. लेकिन वे बांधकर रखने वाली होती थीं.और बेहद जरूरी, वे विश्व स्तर के फिल्म आर्ट की बराबरी करने वाली थीं. ऐसी फिल्मोंको आलोचकों ने समानांतर सिनेमा कहकर बुलाना शुरू किया. इन फिल्मों की नींव सेन, रे,घटक व अन्य ने रखी.