कोहली का ये एक काम पूरी टीम को लंबे वक्त तक पहुंचा सकता है नुकसान
विराट कोहली क्रिकेट के खेल से बड़े क्यूं हो गए हैं?
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फोटो - thelallantop
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चैम्पियंस ट्रॉफी ख़त्म हुई और उसी के साथ अनिल कुम्बले का कॉन्ट्रैक्ट भी ख़त्म हुआ. इंडियन टीम वेस्ट इंडीज़ के दौरे पर निकली लेकिन उनके साथ कुम्बले नहीं गए. टीम इंडिया ने एक टूर बिना कोच के निकाल दिया और अब अगले टूर की तैयारी में है. इस बार भी कोच साथ नहीं होगा. श्री लंका का टूर 26 जुलाई से शुरू होना है. टीम इंडिया का कोच अब तक तय हो जाना था लेकिन दूध के जलों की माफ़िक सचिन, गांगुली और लक्ष्मण की तिकड़ी फूंक-फूंक कर छाछ पी रही है.
एडवाइज़री कमेटी ने लालचंद राजपूत, टॉम मूडी, सहवाग, रवि शास्त्री, रिचर्ड पायबस का इंटरव्यू लिया. लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए. अच्छी बात ये है कि पिछली बार की तरह रवि शास्त्री ने स्काइप पर इंटरव्यू नहीं दिया और न ही सहवाग ने ट्वीट किये. लेकिन फिर भी सौरव गांगुली ने बताया कि पैनल किसी भी डिसीज़न पर पहुंचने से पहले किसी आपाधापी में नहीं है.
गांगुली का मेन इशारा था विराट कोहली की तरफ और इसे उन्होंने आगे साफ़ भी कर दिया. उन्होंने कहा कि वो चाहते हैं कि कोहली के टूर से वापस आने के बाद उनसे बात की जाए और उन्हें समझाया जाए कि एक कोच किस तरह से डील करता है. कोहली से एडवाइज़री कमेटी बात करना चाहती है और उन्हें समझाना चाहती है. सौरव गांगुली के अनुसार कोहली के साथ बात की जानी इसलिए भी ज़रूरी है जिससे सभी एक ही लेवल पर आकर चीज़ों को देखें और सभी को आपस में एक दूसरे की बातें और ऐंगल मालूम हों.
सारी मुश्किलें और समस्याएं यहीं हैं. विराट कोहली. इंडियन टीम के कप्तान. 6 साल पहले अपना पहला वर्ल्ड कप खेलते हुए पहले ही मैच में सेंचुरी मारी थी. लेकिन अभी उन्होंने कप्तानी करते हुए इतना वक़्त नहीं गुज़ारा है कि उन्हें सीनियर कप्तान कहा जाए. इतने ही कम वक़्त में कोहली ने वो कर लिया है कि सब कुछ उन्हें केंद्र में रखकर किया जा रहा है. अब कोच भी ढूंढा जा रहा है तो वैसा जो कोहली-कम्पैटिबल हो. अभी तक सिर्फ हार्ड डिस्क ऐसी ढूंढी जाती थी जो मैक-कम्पैटिबल हो. फ़िलहाल कोहली वो नखरीली मैकबुक बन गए हैं जिसके साथ चल सकने वाली हार्ड डिस्क ढूंढी जा रही है. यही समस्या है.
ये सुनना भी अजीब लगता है. ये वैसा ही है कि एक उद्दंड क्लास के लिए जब टीचरों की भर्ती हो तो उनकी क्वॉलिफ़िकेशन के साथ-साथ ये भी देखा जाए कि वो इन उद्दंडों को झेल लेगा और क्या इनके पैरामीटर पर वो टीचर खरा उतरता भी है या नहीं. कप्तान का काम अपनी टीम को रिप्रेज़ेंट करना होता है. वो उनके अच्छे-भले की बात हर जगह रख सकता है. इस काम से उसे कोई रोक नहीं सकता. लेकिन जब किसी अगले के आने के पहले ही वो उसके रस्ते में खड़ा मालूम दे तो गड़बड़ लगता है.
सचिन तेंदुलकर ने 90 के दशक के अंतिम हिस्से में प्रहलाद कक्कड़ को पेप्सी के ऐड में एक सीक्वेंस करने से मना कर दिया था. उस सीक्वेंस में सचिन को स्टम्प से गेंद को मारना था और उसके बाद कुछ चमत्कारी होने वाला था. सचिन ने ये कहा कि ऐसा करना उन्हें क्रिकेट के खेल से बड़ा दिखाएगा जो कि कतई सच नहीं है. वो जो भी थे, क्रिकेट की वजह से ही थे. उस खेल से बड़ा कोई नहीं था. प्रहलाद को वो सीक्वेंस बदलना पड़ा था. कोहली शायद एक-एक कर के सचिन के सभी रिकॉर्ड्स तोड़ दें. वो रिकॉर्ड्स के शिखर पर जा बैठें लेकिन सचिन की ये पेप्सी के ऐड वाली ही एक बात है जो कोहली को इस जेंटलमेन्स गेम में शामिल जेंटलमेन की लिस्ट में कुछ नीचे खिसका देगी.
कोच आते-जाते रहेंगे. खिलाड़ी आते-जाते रहेंगे. एक खिलाड़ी की ज़िम्मेदारी होती है कि वो जिस हालत में खेल से जुड़े, उसे छोड़ते वक़्त उस खेल को एक बेहतर कंडीशन में छोड़े. कोहली इस कोच के एपिसोड से जो इग्ज़ाम्पल सेट कर रहे हैं, वो खटक रहा है.
ॐ शांति!
ये जो हो रहा है, क्रिकेट में आने वाली नस्लों के लिए बुरा उदाहरण बन सकता है. महेंद्र सिंह धोनी और गैरी कर्स्टन की जोड़ी. इंडियन क्रिकेट की सफलतम कप्तान-कोच की जोड़ी. धोनी को एक बात जो नापसंद थी वो थी प्रैक्टिस वाले दिन की शुरुआत में होने वाली स्विमिंग. लेकिन चूंकि कोच का आदेश था और धोनी कप्तान थे इसलिए पूल के किनारे सबसे पहले कदम जिसके पड़ते थे उसने 2011 वर्ल्ड कप का आखिरी छक्का मारा था और उसी के घंटे भर बाद उसके कोच को वानखेड़े स्टेडियम में नीली जर्सी से लदे कन्धों पर बिठा कर घुमाया जा रहा था. अब कहानी उलट चुकी है. अब कोच को कप्तान के हिसाब से चलना होगा.
क्या कोहली इंडियन क्रिकेट से बड़े हो गए हैं? कोहली ने जब ये कहा कि कुम्बले उनकी टीम के लिए सही नहीं हैं तो वो एक स्टैंड ले रहे थे. कुम्बले के खिलाफ़ नहीं. उनके ओहदे के खिलाफ़ नहीं. बल्कि उनकी उस टेक्नीक के ख़िलाफ़ जो कोहली के खिलाड़ियों को परेशानी में डाल रही थी. और यहां कोहली पूरी तरह से सही थे. उन्हें ऐसा कहने का पूरा हक़ था. कोहली की कही बात मानी भी गई और कुम्बले को कोच के पद से हटना पड़ा. लेकिन अब जो हो रहा है वो शायद स्वीकार्य नहीं है. ये जो हो रहा है वो ये स्थापित करता है कि कोहली का कद इतना बढ़ गया है कि वो सूर्य बन गए हैं और हर छोटे बड़े ग्रह को उसी के चारों ओर मंडराना होगा. क्रिकेट में ही नहीं, किसी भी खेल में ये बहुत बड़ी मुसीबत का संकेत होता है. ये निशानी होती है उस महाबदतमीज़ लड़के की जिसे उसके घरवाले सड़क से हर चीज दिलवाते हैं क्यूंकि ऐसा न होने पर वो सड़क पर लोट-लोट कर बाप की इज्ज़त मिट्टी में मिला देगा. कहते हैं न, 'नंगे से दुनिया हारी है.'
ये सुनना भी अजीब लगता है. ये वैसा ही है कि एक उद्दंड क्लास के लिए जब टीचरों की भर्ती हो तो उनकी क्वॉलिफ़िकेशन के साथ-साथ ये भी देखा जाए कि वो इन उद्दंडों को झेल लेगा और क्या इनके पैरामीटर पर वो टीचर खरा उतरता भी है या नहीं. कप्तान का काम अपनी टीम को रिप्रेज़ेंट करना होता है. वो उनके अच्छे-भले की बात हर जगह रख सकता है. इस काम से उसे कोई रोक नहीं सकता. लेकिन जब किसी अगले के आने के पहले ही वो उसके रस्ते में खड़ा मालूम दे तो गड़बड़ लगता है.
सचिन तेंदुलकर ने 90 के दशक के अंतिम हिस्से में प्रहलाद कक्कड़ को पेप्सी के ऐड में एक सीक्वेंस करने से मना कर दिया था. उस सीक्वेंस में सचिन को स्टम्प से गेंद को मारना था और उसके बाद कुछ चमत्कारी होने वाला था. सचिन ने ये कहा कि ऐसा करना उन्हें क्रिकेट के खेल से बड़ा दिखाएगा जो कि कतई सच नहीं है. वो जो भी थे, क्रिकेट की वजह से ही थे. उस खेल से बड़ा कोई नहीं था. प्रहलाद को वो सीक्वेंस बदलना पड़ा था. कोहली शायद एक-एक कर के सचिन के सभी रिकॉर्ड्स तोड़ दें. वो रिकॉर्ड्स के शिखर पर जा बैठें लेकिन सचिन की ये पेप्सी के ऐड वाली ही एक बात है जो कोहली को इस जेंटलमेन्स गेम में शामिल जेंटलमेन की लिस्ट में कुछ नीचे खिसका देगी.
कोच आते-जाते रहेंगे. खिलाड़ी आते-जाते रहेंगे. एक खिलाड़ी की ज़िम्मेदारी होती है कि वो जिस हालत में खेल से जुड़े, उसे छोड़ते वक़्त उस खेल को एक बेहतर कंडीशन में छोड़े. कोहली इस कोच के एपिसोड से जो इग्ज़ाम्पल सेट कर रहे हैं, वो खटक रहा है.
ॐ शांति!
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