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भारत-पाक मैच में 'किसी भी कीमत पर जीत चाहिए' की शुरुआत कब और कैसे हुई?

"जावेद मियांदाद के छक्के के बावजूद मेरे लिए भारत पाकिस्तान का मैच क्रिकेट मैच ही था. दुख बहुत था. रोना धोना भी हुआ खाना भी नहीं खाया. मगर वह फिर भी एक क्रिकेट मैच की हार थी, अना की हार नहीं."

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13 अक्तूबर 2023 (पब्लिश्ड: 08:21 PM IST)
India Pakistan match in World Cup
तस्वीर साभार: पीटीआई (फाइल फोटो- इंडिया टुडे)
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भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेटीय स्पर्धा का जुनून में बदल जाना, जीत या मौत की बात हो जाना, एक खेल से ज्यादा हो जाना, "किसी भी कीमत पर" जीत ही चाहिए जैसी स्थिति का आम हो जाना भारत के लिए कब शुरू हुआ, मैं नहीं जानता.

हां, यह जरूर जानता हूं कि मेरी पीढ़ी का ट्रिगर प्वाइंट क्या था.

जावेद मियांदाद के छक्के के बावजूद मेरे लिए भारत पाकिस्तान का मैच क्रिकेट मैच ही था. दुख बहुत था. रोना धोना भी हुआ खाना भी नहीं खाया.

मगर वह फिर भी एक क्रिकेट मैच की हार थी, अना की हार नहीं.

सन 1987 तक भी यह एक क्रिकेट मैच ही था जब इडेन गार्डन में सातवें नंबर पर बल्लेबाजी करने आए सलीम मलिक ने मात्र 36 गेंदों पर 72 रन मारकर जीत हमारे हाथों से छीन ली थी. उनका विजय शॉट मार कर उछलना आज भी जेहन में बैठी एक बुरी याद है. मगर कड़वी याद नहीं.

खेल था. पिताजी का वही पुराना फलसफा… "खेल है, होता है चलता है, दुनिया है" समझाते और हम भी एकाध दिन रोकर अपने गली क्रिकेट में रम जाते.

ऐसा ही चलता रहता, अगर 1989-90 का पाकिस्तानी दौरा रद्द हो जाता. नहीं हुआ.

हमें सचिन मिले और साथ ही मिली उम्र भर की खटास.

बाबरी मस्जिद विवाद चरम पर था. हुआ करे. हमें क्या. उनका जो फर्ज है वो अहले सियासत जानें. हमें क्रिकेट से मतलब था.

मगर क्रिकेट भी कब तक नामुरादों से अछूता रहता. बाबरी से नाराज किसी शख्स ने कप्तान श्रीकांत पर हमला कर दिया. उस नौ उमरी में वह विवाद हमें कुछ समझ नहीं आता था. हां, वह हमला याद रह गया. और…

हम फिर रोए. पिताजी ने फिर बहलाया. होता है, चलता है दुनिया है. बालमन रो-धो कर शायद यह घाव भी भूल जाता…

अगर उसी दौरे में एक घृणित दृश्य और न देख लिया होता. हमारे सहित एक पूरी पीढ़ी ने देखा कि पाकिस्तानी दर्शकों ने तिरंगे पर लात मार दी.

हम पिता जी से नहीं पूछ पाए कि यह कैसी दुनिया है. पिताजी के पास शायद इसका कोई जवाब नही था.

वह दिन रहा और आज का दिन है कि भारत पाकिस्तान मैच में हमारी पीढ़ी यह नहीं मान पाती कि होता है, चलता है, दुनिया है.

इसलिए मुकाबले में..."जीत से कुछ भी कम, हार ही है."

(ये आर्टिकल लेखक सत्य व्यास ने लिखा है.)

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