जब महात्मा गांधी ने भारतीय खिलाड़ी से पूछा, 'तुम्हारे साथी को दौरे से लौटा दिया, तुमने क्या किया?'
साल 1936. इंडियन क्रिकेट टीम इंग्लैंड दौरे पर गई. अब भी क्रिकेट में महाराजों का दबदबा जारी था.

साल 1932. आज़ादी से ठीक 15 साल पहले. इंडिया को आज़ाद मुल्क का स्टेटस मिलने में अभी वक्त था. लेकिन हमारी क्रिकेट टीम को तब तक टेस्ट स्टेटस मिल चुका था. टीम ने इसी साल अपना पहला विदेशी टूर किया, हम इंग्लैंड गए. इस टूर के रिज़ल्ट्स बहुत ज़्यादा याद करने वाले नहीं रहे.
लेकिन हम बात करेंगे इंडिया के अगले इंग्लैंड टूर की. वो टूर, जिसमें मैदान के अंदर के खेल से ज़्यादा चर्चा बाहर के ‘खेल’ ने बटोरी. यहां तक कि टूर के बाद इस बारे में महात्मा गांधी ने भी एक प्लेयर से इसकी चर्चा कर डाली थी. तो चलिए अब शुरू करते हैं.
साल 1936. इंडियन क्रिकेट टीम इंग्लैंड दौरे पर गई. अब भी क्रिकेट में महाराजों का दबदबा जारी था. रसूखदार विजयनगरम के महाराजकुमार विज़ी को इस दौरे की कप्तानी सौंपी गई. विज़ी ने इस रेस में पटियाला के महाराजा को पीछे छोड़ा था. विजी इस दौरे के प्रायोजक थे और इसी हैसियत से उन्हें सेलेक्टर बनाया गया. सेलेक्टर बनने के बाद उन्होंने सबसे पहला फ़ैसला लेते हुए खुद को टीम का कप्तान घोषित कर दिया.
और जैसा कि कहते हैं ना ताक़त सही चीज़ है, लेकिन अगर वो ग़लत व्यक्ति के हाथ में हो तो सब तबाह भी हो सकता है. विज़ी कप्तानी मिलते ही तानाशाही पर उतर आए. उन्होंने दौरे के बीच में ही स्टार ऑलराउंडर लाला अमरनाथ से लड़ाई कर ली. जिसके बाद लाला को टीम से बाहर कर दिया गया. सीरीज़ शुरू होने से पहले एक टूर मैच में भारत के एक-एक कर विकेट्स गिर रहे थे. लेकिन लाला से खुन्नस पाले बैठे विजी उन्हें बैटिंग के लिए जाने ही नहीं दे रहे थे.
उन्हें नंबर 5, नंबर 6 तक भी नहीं खिलाया गया. इसके बाद दिन का खेल खत्म होने से ठीक पहले लाला अमरनाथ की बैटिंग आई. और जब वो बैटिंग कर वापस लौटे तो गुस्से में उन्होंने अपने ग्लव्स पटक दिए. और पंजाबी में चिल्लाए,
'मैंनू पता है कि की हो रया है.'
इसके बाद कप्तान ने लाला की शिकायत करते हुए उन्हें वापस घर भेज दिया. मेजर जैक ब्रिटिन जोन्स उस दौरे पर टीम इंडिया के मैनेजर थे. उन्होंने ही लालाजी का सामान बंधवाकर वापस घर भिजवाया. कई लोगों का ऐसा भी कहना था कि विज़ी, अमरनाथ से महाराजा ऑफ पटियाला का बदला ले रहे थे.
ये घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई. एक इंटरव्यू में पूर्व भारतीय क्रिकेटर दीपक शोधन ने ये भी बताया था कि इस घटना पर महात्मा गांधी ने भी सीनियर बल्लेबाज़ विजय मर्चेन्ट से सवाल पूछा था. गांधीजी ने पूछा,
'तुम उस भारतीय टीम में थे जो इंग्लैंड गई थी. एक भारतीय खिलाड़ी को वापस भेज दिया गया. तुम्हारे खिलाड़ियों ने इस बारे में क्या किया?'
महात्मा गांधी की ये बात सुन विजय मर्चेंट हैरान रह गए थे.
इस दौरे पर भारत ने लॉर्ड्स में खेला गया पहला टेस्ट नौ विकेट से गंवाया. इसके बाद भारत ने विजय मर्चेंट और सैय्यद मुश्ताक अली की शानदार पारियों से दूसरा टेस्ट ड्रॉ करवाया. यहीं पर मुश्ताक अली विदेश में शतक जमाने वाले पहले भारतीय बने. दोनों बल्लेबाज़ों ने दूसरी पारी में पहले विकेट के लिए 203 रन की पार्टनरशिप की और मैच को इंग्लैंड की पकड़ से दूर कर दिया.
हालांकि, इसके बाद 15 अगस्त के दिन खेले गए सीरीज़ के तीसरे टेस्ट में भारत कुछ खास कमाल नहीं कर पाया और मुकाबला नौ विकेट से हार गया. आखिरी मुकाबले में भी विजय मर्चेंट और मुश्ताक अली ने बेहतरीन बल्लेबाज़ी की लेकिन खराब कप्तानी इस मुकाबले में भी टीम इंडिया को ले डूबी.
1936 के इस दौरे पर विज़ी की कप्तानी को 'डिज़ास्ट्रस' करार दिया गया. उस दौरे पर गई भारतीय टीम को इतिहास में सबसे खराब नेतृत्व वाली टीम माना गया. इस दौरे के बाद 1937 में एक जांच कमेटी का गठन किया गया. जिसकी रिपोर्ट में लाला अमरनाथ निर्दोष पाए गए.
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