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असम में BJP की जीत के नायक: 27 साल की लड़की, 30 का लड़का

सर्बानंद 'चेहरा' थे. राम माधव 'चाणक्य' थे. लेकिन जमीन पर कैंपेन का चरित्र तय किया इन दो लोगों ने.

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23 मई 2016 (अपडेटेड: 23 मई 2016, 06:24 AM IST)
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रजत, शुभ्रस्था
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असम में बीजेपी की जीत के कई विश्लेषण किए गए. कई नायक खोजे गए. लेकिन बीजेपी की कामयाबी में विदेश से लौटे दो नौजवानों का काम भी शामिल है.
ये दोनों आए, आंकड़े बनाए और बीजेपी के लिए स्ट्रैटजी बनाने में बड़ा रोल निभाया. सर्बानंद सोनोवाल अगर पार्टी का चेहरा थे, रणनीति हेमंत बिस्व सरमा की थी, राम माधव चाणक्य बने थे, तो जमीनी स्तर पर आंकड़ों की व्याख्या-विश्लेषण का काम रजत और शुभ्रस्था संभाल रहे थे.
असम चुनाव के लिए राम माधव ने युवाओं की जो कोर-टीम बनाई थी, उसके दो अहम चेहरे यही थे. 27 साल की शुभ्रस्था और 30 साल के रजत सेठी. ये दोनों 6 लोगों की एक टीम की अगुवाई कर रहे थे. असम में बीजेपी जब भी कोई रणनीतिक कदम उठाती, ये टीम कम से कम दो बार इसकी जांच करती.
रजत पिछले साल ही भारत लौटे हैं. शुभ्रस्‍था इससे पहले कांग्रेस के स्ट्रैटजिस्ट प्रशांत किशोर की कंपनी में थीं. उसे छोड़कर वह बीजेपी की टीम से जुड़ गईं. दोनों का कहना है,'ये पैसों से ज्यादा विचारधारा का मामला है.'
IMG-20160521-WA011 राम माधव के साथ युवा रणनीतिकारों की टीम

रजत: संघ के स्कूल से हार्वर्ड तक

रजत कानपुर से हैं. उन्होंने कामरूप तक का सफर वाया IIT खड़गपुर, एमआईटी और हार्वर्ड तय किया है. कानपुर के गोविंद नगर के रहने वाले रजत वहीं के सरस्वती शिशु मंदिर से पढ़े हैं. इसके बाद IIT खड़गपुर से इंजीनियरिंग. एमआईटी से मैनेजमेंट में मास्टर्स. फिर हार्वर्ड से पब्लिक पॉलिसी में मास्टर्स. और इसके बाद जब उन्हें बीजेपी का ये कैपेन असाइनमेंट ऑफर हुआ, तो उन्हें लगा कि ये 'घर वापसी' का सही वक्त है.

शुभ्रस्था: कांग्रेस का साथ छोड़कर आईं

शुभ्रस्‍था इससे पहले बिहार चुनावों में प्रशांत किशोर के लिए काम कर चुकी हैं. तब वह महागठबंधन को जिताने के लिए काम करही थीं. 2014 के लोकसभा चुनावों में भी वह प्रशांत किशोर के साथ थीं. लेकिन हाल में लगा कि वे विचारधारा में संघ के ज्यादा करीब हैं. जिसके बाद उन्होंने प्रशांत किशोर का साथ छोड़ असम चुनावों के लिए बीजेपी का दामन थाम लिया.
दोनों ने दिन-रात काम किया. जिसका असर चुनाव नतीजों पर दिखाई देता है. अमित शाह के निर्देश और राम माधव के नेतृत्व में इन्होंने मिलकर आंकड़ों को परखा, रणनीति बनाई, प्रवक्ताओं को ट्रेनिंग दी और पूरे राज्य की ट्राइब जनता की नब्ज को टटोला. असम में बीजेपी के 'मिशन 84' के लिए इनके पास 6 महीने से भी कम वक्त था. इस दौरान उन्होंने हेमंत बिस्वा सरमा से 150 रैलियां करवाईं. तब तक, जब तक मीडिया ने बीजेपी की साफ जीत घोषित नहीं कर दी.
शुभ्रस्‍था बिहार के नालंदा की रहने वाली हैं. उन्होंने मिरांडा हाउस से 2011 में इंग्लिश में अपना पीजी किया था. वह कहती हैं, 'हमारी तुलना प्रशांत किशोर से नहीं की जानी चाहिए क्योंकि हमारी जिंदगी से अपेक्षाएं अलग हैं.'
शुभ्रस्‍था अभी एक महीने की फेलोशिप पर अमेरिका जा रही हैं. जहां वो सीनेट के साथ अमेरिकी नीतियों और राजनीति को समझने के लिए इंटर्नशिप करेंगीं.
रजत आरएसएस के नॉर्थ-ईस्ट में उदय को लेकर एक किताब लिखने का प्लान कर रहे हैं. उनका मानना है, अपनी टीम के साथ उनका ये काम सच्ची सफलता की कहानी है.

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