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जो कहते हैं कि धोनी को 2019 वर्ल्ड कप नहीं खेलना चाहिए वो कल के मैच की ये बातें नोट कर लें

धोनी यानी टीम इंडिया का शक्तिमान.

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18 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 18 सितंबर 2017, 06:15 AM IST)
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इंडिया वर्सेज़ ऑस्ट्रेलिया. पहला वन-डे मैच. चेन्नई.

इंडिया ने बैटिंग कर ली थी. बारिश हो चुकी थी. ऑस्ट्रेलिया को 21 ओवर में 164 रन का टार्गेट दिया जा चुका था.
ऑस्ट्रेलिया की इनिंग्स का दसवां ओवर खतम हुआ. 2 रन आये. 47 रन पर 4 विकेट. ऑस्ट्रेलिया की टीम जूझ रही थी. मैक्सवेल एकमात्र उम्मीद थे जो अभी सांस ले रहे थे. मैक्सवेल के लिए 13-14 रन प्रति ओवर मारना कोई बड़ी बात नहीं है. आड़ा-तिरछा कुछ भी मार देता है. स्पिनर्स ने दबाव बनाया हुआ था. लेकिन दबाव यानी प्रेशर बनने पर ही कुकर की सीटी बोलती है. मैक्सवेल की सीटी अगले ओवर में बोल उठी. कुलदीप यादव को 1 चौका और 3 लगातार छक्के मारे. क्लीन हिटिंग. कहीं भी कोई मिस-हिट नहीं. कुल 22 रन का ओवर. टाइट सिचुएशन थी. ऐसी ही सिचुएशन से धोनी और पंड्या ने इंडिया को निकाला था. उनके सामने तो लगभग 30 ओवर का खेल था. यहां तो बस ट्वेंटी-ट्वेंटी का मामला था. आसान था. एक ओवर मैच पलट सकता है. ऑस्ट्रेलिया के लिए 22 रन का ओवर वैसा ही मालूम दे रहा था. कुलदीप यादव के मन में क्या-क्या चल रहा होगा. वो नए हैं. अपना आठवां मैच खेल रहे थे. एक मैच की गलती बड़ी मुसीबत बन सकती है.
मैक्सवेल अपने अंदाज़ में बैटिंग कर रहे थे.
मैक्सवेल अपने अंदाज़ में बैटिंग कर रहे थे.

ओवर की आखिरी गेंद डॉट बॉल गई. धोनी दौड़ कर उस छोर पर गए. कुलदीप को आवाज़ दी. उनके साथ 30-40 सेकंड की एक मीटिंग की. कोहली दूर थे. चलते हुए दोनों की तरफ आए. धोनी इतनी देर में कुलदीप को ये समझा चुके थे कि गेंद किस रेज में फेंकनी है. गेंद का टप्पा किधर हो कि मैक्सवेल उसे छू न पाए. गेंद तेज़ न हो और उल्टा कब फेंका जाए. उस वक़्त धोनी एक विकेट कीपर बैट्समैन की भूमिका में नहीं थे बल्कि एक गुरु की भूमिका में थे. उन्हें फ़र्क नहीं पड़ रहा था कि वो अब कप्तान नहीं हैं. एक नॉन-कैप्टन प्लेयर के लिए ये अन-लिखा नियम है कि वो अपने सुझाव जाकर कप्तान को दे. लेकिन धोनी को अपनी ज़िम्मेदारियों के बारे में नियमों से ज़्यादा पता है. उन्हें मालूम है कि उनकी कहां और कब ज़रुरत पड़ सकती है. 30-40 सेकंड की एक क्विक मीटिंग एक खिलाड़ी का जीवन बदल सकती है.


सचिन तेंदुलकर जब टीम के कप्तान हुआ करते थे तो वो अनिल कुंबले को अब्दुल क़ादिर के पास ले गए थे. उस वक़्त कुंबले बहुत परेशान थे. वो परेशान थे क्यूंकि उनकी गेंद टर्न नहीं ले रही थीं. अब्दुल क़ादिर ने कुंबले से सिर्फ एक बात कही, "तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें बताऊं कि मेरी गेंदें कैसे घूमती हैं. जबकि हकीक़त ये है कि तुम्हारी गेंदें कभी नहीं घूमेंगी. तुम्हें उस पर काम करना चाहिए. तुम वेरिएशन पर काम करो. बहुत आगे जाओगे." कुंबले कहां गए, ये रिकॉर्ड बुक्स पलटने पर मालूम चल जायेगा. फिलहाल बारी इंडिया के चाइनामैन की थी जिसे धोनी बेहद शांत दिमाग के साथ समझा रहा था.



dhoni kuldeep yadav
कुलदीप ने मैच में कुल 2 विकेट लिए.

22 रन का ओवर फेंकने के बाद ऐसी सिचुएशन में किसी भी बॉलर को हटा लिया जाता है. लेकिन कुलदीप को नहीं हटाया गया. क्यूंकि विकेटकीपर धोनी को उसपर विश्वास था. और कप्तान कोहली को ये बात मालूम थी. कुलदीप ने अगले ओवर में पहली 2 गेंदों में एक भी रन नहीं दिया और तीसरी गेंद मिडविकेट पर खड़ी हो गई जहां नए हेयरकट के साथ खड़े जडेजा ने कैच किया. कुलदीप को उस वक़्त दोबारा जिला दिया गया था. और ये सारा किया धरा था धोनी का. वो धोनी जिसे आज से कुछ डेढ़-दो महीने पहले संन्यास लेने के लिए कहा जा रहा था.

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पाकिस्तानी शायर सऊद उस्मानी ने ये शेर अगर धोनी को देखने के बाद नहीं लिखा तो शायद उन्होंने इसे लिखने में कुछ जल्दबाज़ी कर दी. तमाम वेबसाइट्स और स्पोर्ट्स चैनलों और न्यूज़ चैनलों पर बैठने वाले क्या ख़ाक एनालिसिस करते होंगे? मैच की असली एनालिसिस धोनी की खोपड़ी में हो रही होती है. बाल सफ़ेद ऐसे नहीं हुए हैं. उसकी खोपड़ी काफ़ी बड़ी लगती भी है. एक सवाल पूछा गया था. क्रिकेट के खेल में धोनी से ज़्यादा खतरनाक कौन है? जवाब था, बिना हेलमेट के खेलता हुआ धोनी.
मैच ख़त्म होने को था. 5 गेंदों में 34 रन चाहिए थे. इम्पॉसिबल काम था. बुमराह बॉलिंग कर रहा था. ऑफ स्टम्प के काफी बाहर फेंकी हुई गेंद पर फॉकनर ने बल्ला लगा दिया. खोंचा लग के गेंद धोनी के सामने डिप कर रही थी. धोनी कूद पड़े. कैच लपक लिया. बॉलर विकेट का जश्न मनाने लगा. धोनी उठे, आगे बढ़े और हाथ हिलाकर इशारा किया कि वो श्योर नहीं हैं. अम्पायर ने थर्ड अंपायर के पास मामला रेफ़र कर दिया. इसी बीच भुवनेश्वर कुमार ने उंगली दिखाई और बोला कि फॉकनर आउट हैं. टीवी पर रीप्ले में मालूम चला कि गेंद ज़मीन में लग गई थी. नॉट-आउट. सभी लोग वापस अपनी पोज़ीशन पर पहुंच गए. धोनी इससे पहले ही फॉकनर को ये समझाते हुए देखे जा सकते थे कि गेंद उनके ग्लव्स के बीच से ज़मीन छू चुकी थी.

ये इस मैच का एकमात्र मौका नहीं था जब ऐसा हुआ था. 12वां ओवर. दूसरी गेंद. यजुवेंद्र चहल की गेंद पर मैक्सवेल ने स्वीप मारा और गेंद स्क्वायर लेग पर खड़े रोहित शर्मा के हाथ में गई. रोहित ने अपील में हाथ उठा दिए. अपील कैच की थी. चहल भी सपोर्ट में दिखे. अम्पायर ने नॉट-आउट का सॉफ्ट सिग्नल देते हुए फिर से थर्ड अम्पायर की शरण में जाना उचित समझा. धोनी विकेट के पीछे अब भी खड़े थे और अपने हाथ से सभी प्लेयर्स को वापस अपनी जगह पर जाने का इशारा कर रहे थे. उन्हें मालूम था कि गेंद बल्ले से लगने के बाद टप्पा खाकर शर्मा के हाथ में गई है. ऐसा सिर्फ इसलिए संभव हुआ था क्यूंकि वो इंसान गेंद पर नज़र रखता है. मैच का एक भी पहलू ऐसा नहीं होता है जो उसकी नज़रों में पड़ने से चूक जाए. क्विक स्टम्पिंग में बैट्समैन का पैर ज़मीन से पौन इंच भी ऊपर हो तो उसे मालूम रहता है. मालूम देता है कि उसकी आंखों से सब कुछ 60 नहीं बल्कि 1000 फ़्रेम पर सेकंड की रफ़्तार से कैद होता है.


कप्तानी छोड़े हुए अरसा हो गया है. जबसे कप्तानी छोड़ी है, 89.57 का शानदार ऐवरेज है. डे-नाइट मैचों में ये ऐवरेज 101.50 का हो गया है. पहले बैटिंग करते हुए ऐवरेज 141.66 का है. चेज़ करते वक़्त सारा काम अब कोहली ही कर देता है इसलिए धोनी की ज़्यादा ज़रुरत नहीं पड़ी है. लेकिन फिर भी कप्तानी छोड़ने के बाद चेज़ करते हुए जीते मैचों में धोनी का ऐवरेज 119 का है.



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धोनी ने पहली 66 गेंदों में एक भी बाउंड्री नहीं मारी थी.

इस सबके बावजूद धोनी का खेल नंबर्स तक सीमित नहीं है. विराट कोहली ने धोनी के 300वें मैच में धोनी को एक गिफ्ट पकड़ाते हुए कहा था, "आप हमेशा हमारे कप्तान रहेंगे." ये कोई बतकही नहीं थी. कोहली ने वो बात कही थी जो वो खुद जानता था और महसूस करता था. आज भी टाइट सिचुएशन में धोनी को फ़ील्ड जमाते हुए देखा जा सकता है. कोहली दौड़ता हुआ धोनी के पास पहुंचता है और मशवरा करता है. आज भी घर में होने वाले बड़े कार्यक्रमों में बुज़ुर्गों से सलाह लेकर ही आगे बढ़ा जाता है. धोनी यकीनन टीम के बुज़ुर्ग हैं. इस बात को कहने में न ही कोई संकोच होना चाहिए और न ही कोई शर्म. लेकिन जब ये बुज़ुर्ग हाथ में बल्ला लेकर मैदान में उतरता है तो चेन्नई के आसमान में जो शोर गूंजता है वो इस बात के लिए आश्वस्त करता है कि जंग बंदूकों में लगती है, बल्लों में नहीं. शायद इसीलिए बल्ले लकड़ी के बनाये गए होंगे. धोनी का बल्ला लोहे का भी होता तो जंग न खाता.
चेन्नई में बैटिंग करने के लिए उतरते धोनी के लिए मचते शोर ने वो वक़्त याद दिलाया जब दुनिया के किसी भी मैदान में सचिन के उतरने पर शोर उठा करता था. हमें इस बात को समझ लेना चाहिए कि धोनी एक खिलाड़ी नहीं बल्कि एक घटना है. हम ख़ुशकिस्मत हैं कि उस घटना को अपनी आंखों के सामने घटते देख रहे हैं. आने वाली नस्लों को बताया जाएगा कि एक धोनी था. लेकिन जब तक धोनी है, धोनी रहेगा. ये बात बेहद पर्सनल लग सकती है लेकिन मैं इसे अंतिम सत्य मानता हूं कि हम, आप या इस धरती पर पाया जाने वाला कोई भी इंसान इतनी ताकत नहीं रखता कि वो ये कह सके कि अब धोनी को रुक जाना चाहिए. अगर ऐसा करने की कोई कोशिश भी करता है तो करे. मैंने लोगों को चांद पर थूकने की कोशिश भी करते देखा है.
;)


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