पंजाब का चुनाव आग पकड़ रहा है. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इसे अपना आखिरी चुनाव बताकरवादों का टैंक लेकर घूम रहे हैं. अरविंद केजरीवाल बार-बार मजीठिया को जेल में डालनेकी बात कर रहे हैं. वहीं बादल सरकार और भाजपा, प्रधानमंत्री मोदी के दम पर पर दोनोंको हराने की बात कर रहे हैं.पंजाब जगह ही हमेशा ऐसी रही है. इतिहास में देखें तो इंडिया में घुसकर राज करने कारास्ता यही था. सबको पहले यहीं जीतना होता था. अंग्रेजों ने रणजीत सिंह के बाद जबतक पंजाब को खुद में मिलाया नहीं, उनको चैन नहीं आया. और यही पंजाब का विधानसभाचुनाव था, जिसने पाकिस्तान बना दिया था.मुस्लिम लीग नहीं थी मुसलमानों की पार्टीकांग्रेस के नेता हर जगह छाए रहते थेस्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस का रौला बहुत था. कांग्रेस खुद को पूरे देश केलोगों की प्रतिनिधि पार्टी बताती थी. पर इतने बड़े देश में सबका प्रतिनिधि बननाआसान बात नहीं थी. कांग्रेस के साथ ही कई और पार्टियां निकल आई थीं. किसी का मुद्दाजाति थी, किसी का धर्म, किसी का कुछ. क्योंकि भारत विविधताओं का देश है और समस्याएंभी यहां विविध हैं.मुस्लिम लीग खुद को भारतीय मुसलमानों की पार्टी बताती थी. पर 1940 के दशक तक ऐसा होनहीं पाया था. क्योंकि कांग्रेस में भी बहुत से मुसलमान नेता थे. मुहम्मद अलीजिन्ना मुस्लिम लीग के सबसे बड़े नेता थे. उन्होंने बंबई में रिपोर्टर्स से बातकरते हुए कहा था कि कांग्रेस से ज्यादा मुसलमान नेता मुस्लिम लीग को सबसे ज्यादाहार्म कर रहे हैं.जिन्नाकई सारी पार्टियां जमीयत-ए-उलेमा-हिंद, मजलिस-ए-अहरार और खाकसार मूवमेंट जिन्ना सेअलग ही चलते थे. इन पार्टियों के लोग जिन्ना के मुस्लिम देश की थ्योरी से सहमत नहींथीं. कांग्रेस के मुस्लिम नेता भी बिल्कुल सहमत नहीं थे. जनता में अलग देश को लेकरकोई भावना ही नहीं थी. ये आइडिया सबसे पहले 19वीं शताब्दी के मुस्लिम बुद्धिजीवीसैयद अहमद खान और आमिर अली ने दिया था. पर उस वक्त भी ये बहुत ज्यादा पॉपुलर नहींहुआ था. जिन्ना तो हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत कहे जाते थे. पर धीरे-धीरे जिन्नाने इस आइडिया को फैलाना शुरू किया था.पर विरोधी मुस्लिम पार्टियों का मानना था कि भारत में मुस्लिम एक-तिहाई हैं. तोयहां पर किसी भी तरह से कोई समस्या नहीं होगी. पहला लक्ष्य अंग्रेजों से आजादी हीहोनी चाहिए. उनका ये भी कहना था कि इस आधार पर देश बनाना भी यूरोपियन विचार है.हमें कोई जरूरत नहीं है.तो जब भी चुनाव होते मुस्लिम लीग को मुस्लिम मेजॉरिटी वाले क्षेत्रों में भी हार कासामना करना पड़ता. उस वक्त के भारत में बंगाल और पंजाब में सबसे ज्यादा मुस्लिम थे.बंगाल में तो धीरे-धीरे मुस्लिम लीग का प्रभाव बढ़ने लगा था. क्योंकि ढाका के नवाबभी मुस्लिम लीग के साथ हो गये थे. पर पंजाब में 1940 के दशक तक मुस्लिम लीग को कोईविशेष फायदा नहीं हुआ था.1945 में चुनाव की घोषणा हुई, मुस्लिम लीग का ये आखिरी मौका था1945 में ब्रिटिश सरकार ने एनाउंस किया कि नेशनल और लेजिस्लेटिव असेंबलीज के लिएचुनाव होंगे. पंजाब में फरवरी 1946 में चुनाव होने थे. यहां पर कांग्रेस का जीतनाबहुत जरूरी हो गया था. इसके साथ ही बाकी जगहों पर भी जीतना था. ताकि देश और राज्योंमें सरकार बनाई जा सके. मुस्लिम लीग का टारगेट था पंजाब और बंगाल में जीतना. साथ हीबाकी मुस्लिम बहुल इलाकों में जीतना ताकि कहा जा सके कि मुस्लिमों की पार्टी हैमुस्लिम लीग.पंजाब में 57 प्रतिशत आबादी मुस्लिम थी. यहां पहले मुस्लिम लीग हार चुकी थी. इस बारहार जाती तो पत्ता साफ ही था. उस वक्त यहां पर यूनियनिस्ट लोगों का डॉमिनेन्स था.इसमें जमींदार और मुस्लिम पीर थे. हिंदू और सिख नेता भी थे. 1937 के चुनाव मेंयूनियनिस्टों ने 175 में से 95 सीटें जीती थीं.तो मुस्लिम लीग को हराने के लिए मास्टरमाइंड सरदार पटेल और मौलाना अबुल कलाम आजादने माहौल बनाना शुरू कर दिया. कांग्रेस अपने चुनाव के साथ ही यूनियनिस्टों को भीप्रमोट कर रही थी. बाकी खाकसार और जमीयत जैसी पार्टियों का भी प्रमोशन किया जानेलगा. अहरार और खाकसार के नेताओं ने मुस्लिम लीग को ब्रिटिश एजेंट बताना शुरू किया.पटेल और आजादजिन्ना की सरकार तो नहीं बनी, पर बाजी मार ले गयेजिन्ना उस वक्त तक रेशनल नेता थे. पर इस बार पंजाब के प्रेसिडेंट ममदोत के खान केसाथ हर तरह की ट्रिक लगाने लगे. दोनों ने कॉलेज और यूनिवर्सिटी से लड़के-लड़कियोंको गांवों-शहरों में भेजना शुरू किया. ये लोग जा के बताते कि कैसे मुस्लिम लीग हरतरह की समस्याओं को मिटा देगी. मुसलमानों की. साथ ही अहरार और खाकसारों पर आरोपलगाना शुरू किया कि ये लोग हिंदुओं के अंगूठे के नीचे रहते हैं. धीरे-धीरे पीरमुस्लिम लीग के साथ आने लगे. लोगों को लगने लगा कि यही है सही मौका जब खुद को ताकतमिलेगी और सारी समस्याओं का समाधान ढूंढ़ लिया जाएगा.स्टूडेंट मुस्लिम लीग के समर्थन मेंकांग्रेस और यूनियनिस्ट पार्टियों को अपने जीतने की पूरी संभावना नजर आ रही थी.हालांकि डर भी था थोड़ा-थोड़ा. पर उस वक्त हर चीज तुरंत पता नहीं चलती थी. पब्लिकका मूड कितना चेंज हुआ है, पता करने में वक्त लगता था. पर जब रिजल्ट आया तो सब लोगशॉक्ड रह गये. मुस्लिम लीग को 175 में से 73 सीटें मिलीं. यूनियनिस्टों को 20.कांग्रेस को 51 और अकाली दल को 22. अहरार और खाकसारों को एक भी सीट नहीं मिली.मुस्लिम लीग को मुसलमानों का 65 प्रतिशत वोट मिला.हालांकि पंजाब में माइनॉरिटी गवर्नमेंट कांग्रेस ने ही बनाई. पर मुस्लिम लीग नेअपना सिक्का जमा लिया. बंगाल की 230 में से 113 और सिंध की 60 में से 27 सीटेंमुस्लिम लीग को ही मिलीं. पर पंजाब में नंबर वन आना मुस्लिम लीग को हर तरह की बहसमें बैठाने के काबिल बना गया. इससे पहले सब कुछ भावनाओं में था कि मुस्लिम लीगमुसलमानों की पार्टी है. पर इसके बाद लिखित में आ गया. नंबरों की इस दौड़ में येभुला दिया गया कि कांग्रेस को भी मुस्लिम वोट मिले थे. कई जगहों पर. पाकिस्तान बनगया. और उसी पाकिस्तान में मुस्लिम लीग कुछ ही सालों में खत्म हो गई. अब तो इनकीकोई मौजूदगी ही नहीं है. ताज्जुब की बात है कि इंडिया में मुस्लिम लीग सीटें जीतलेती है. यूपी में तो पार्टी इस बार भी चुनाव लड़ रही है. हालांकि ये लोग अपनेपुराने ट्रेडिशन से ही लड़ते हैं. औरतों को टिकट नहीं देते. सीढ़ी है इनका चुनावचिह्न.(Dawn से इनपुट)--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़िए-सिर्फ तीन शब्द लिखकर कैप्टन अमरिंदर ने केजरीवाल की मौज ले लीपंजाब चुनाव: इन लोगों के हाथ में है बीजेपी की नैय्यापंजाब में आप की उम्मीदोंं को बड़ा झटकाक्या केजरीवाल के 3 करीबी नेता टिकट के बदले औरतों का शोषण कर रहे हैं?अमृतसर से बीजेपी ने उस नेता को मैदान में उतारा है, जिससे सिद्धू बहुत चिढ़ते थे