आगे आप जो बेहद मजेदार किस्से पढ़ेंगे, वो हमने पढ़े हैं संजय मांजरेकर की किताबमें. ये संजय की ऑटाबायोग्राफी है. टाइटल है इम्परफेक्ट. इसे हार्पर कॉलिन्स नेछापा है.एक क्रिकेटर का एक छोटा सा कदम, किसी संभावित क्रिकेटर की जिंदगी बदल सकता है. संजयमांजरेकर के साथ भी ऐसा ही हुआ. भारत के महान ओपनर सुनील गावस्कर उनके पिता विजयमांजरेकर के जूनियर थे. विजय मांजरेकर को सुनील की मां राखी बांधती थीं.इन सबके चलते सुनील, विजय सर को बहुत मानते थे. एक बार उन्होंने सुनील से कहा, "जबइंग्लैंड टूर से लौटना तो संजय के लिए ग्रे निकोल ( एक कंपनी) का बैट ले आना." येअस्सी के दौर की शुरुआत थी. सुनील अपने करियर और मशहूरियत के चरम पर थे. फिर भीउन्होंने एक प्रेरक काम किया.संजय उस दिन साउथ मुंबई के क्रॉस मैदान में मैच खेल रहे थे. तभी एक लड़का उनकी तरफआया और बोला, "सुनील गावस्कर तुम्हें खोज रहे हैं. वो उस पेड़ के नीचे तुम्हाराइंतजार कर रहे हैं."संजय को पहले भरोसा नहीं हुआ. मगर जब पेड़ की दिशा में देखा तो उन्हें गावस्कर नजरआए. संजय भागकर पहुंचे. सुनील ने उन्हें बैट दिया. कहा, "तुम्हारे पापा ने कहा थाये लाने को. तुम्हारे लिए." बैट के अलावा सुनील ने उन्हें उस बैट कंपनी का एकपोस्टर भी दिया. इसमें ग्रेग चैपल कंपनी का स्टीकर लगा बल्ला लिए खड़े हैं.संजय लिखते हैं कि ये सुनील गावस्कर की महानता थी. वह किसी नौकर से बल्ला भिजवासकते थे. मगर वो खुद देने आए. शायद उन्हें इलहाम होगा कि छोटे क्रिकेटर्स के लिए इसतरह की प्रेरणा किस तरह काम करती होगी.ऐसे भी एक बार सुनील गावस्कर ने सचिन तेंदुलकर को खत लिखा था. सचिन बहुत निराश थेक्योंकि उन्हें बेस्ट जूनियर क्रिकेटर का अवॉर्ड नहीं मिला था. सुनील ने उन्हेंसमझाया कि और कई बड़े अवॉर्ड उनका इंतजार कर रहे थे.फट्टू का टैगऐसा नहीं है कि सीनियर प्लेयर्स सिर्फ हौसला ही बढ़ाते थे. अगर वजह वाजिब हो तोहौंकते भी थे. संजय मांजरेकर को भी ये लताड़ पड़ी. बात 1987 के पहले हफ्ते की है.देवधर ट्रॉफी का मैच था. ये दिलीप ट्रॉफी का वन-डे वर्जन होता है. इसमें स्टेट्सनहीं बल्कि जोन खेलते हैं. संजय मांजरेकर वेस्ट ज़ोन टीम में थे. उन्हें अच्छाप्रदर्शन करना ही था, ताकि वह टीम इंडिया में लौट सकें. इंडिया के लिए वह इससे पहलेएक टेस्ट खेल चुके थे. वेस्टइंडीज के खिलाफ. संजय इस मैच में सुपर फ्लॉप रहे थे.उन्होंने पहली पारी में 5 और दूसरी में 10 रन बनाए थे. इसके बाद उन्हें श्रीलंकादौरे के लिए नहीं लिया गया. पर उसके बाद पाकिस्तान की टीम आने वाली थी. और संजय कोउम्मीद थी कि अगर वह देवधर में अच्छा खेलते हैं तो उन्हें मौका मिल सकता है.मैच हुआ. वेस्ट जोन के कैप्टन और इंडिया के टेस्ट प्लेयर रहे अंशुमन गायकवाड़ औरश्रीकांत कल्याणी की जोरदार पार्टनरशिप हुई. तीसरे विकेट के लिए. अब बाकी प्लेयर केपास एक ही विकल्प था. मैदान में जाओ, ताबड़तोड़ मारो, ताकि विपक्षी टीम को आउट करनेके लिए वक्त बचे. संजय को लगा कि ये बेकार स्थिति है बैटिंग के लिए. अगर वह जातेहैं और तीसेक रन बनाकर आउट हो जाते हैं तो कोई नोटिस नहीं करेगा. और अगर इकाई मेंही आउट हो गया बड़ा शॉट खेलने के फेर में तो सेलेक्शन कैसे होगा.सचिन और संजयसंजय लालचंद राजपूत के पास पहुंचे. लालचंद ध्यान हैं न आपको? जो 2007 की टी-20विक्ट्री के समय इंडिया के कोच थे. उन्होंने भारत के लिए दो टेस्ट खेले हैं. खैर,संजय ने लालचंद को सब बात बताई. कि वह अपनी तय पोजिशन पर नहीं खेलना चाहते. लालचंदने कहा ओके. मगर इसके साथ अजीब ढंग से घूरा भी. संजय को समझ नहीं आया. फिर कुछ देरमें वेस्ट जोन के विकेटों का पतझड़ शुरू हो गया. संजय को 10वें नंबर पर बैटिंग केलिए जाना पडा. वह जीरो पर आउट हुए. मैच नॉर्थ जोन ने जीता. इसमें मनोज प्रभाकर औरसुरिंदर खन्ना नॉर्थ जोन के लिए चमके. संजय की कहानी मैच के साथ खत्म नहीं शुरूहोती है. इस मैच के बारे में अखबारों में ज्यादा लिखा नहीं गया. संजय को लगा किसीने नोटिस नहीं किया होगा. मगर वह गलत थे. मुंबई के क्रिकेट सर्किल में इस तरह कीखबरें छिपती नहीं.संजय को अगला मैच मुंबई के लिए खेलना था. रणजी ट्रॉफी क्वार्टरफाइनल. कर्नाटक केखिलाफ. इसके लिए वानखेडे में प्रैक्टिस हो रही थी. टीम इंडिया के प्लेयर रविशास्त्री और दिलीप वेंगसरकर तब दौरे पर नहीं थे. उन्हें जल्द आने वाली पाकिस्तानीटीम के लिए तैयारी करनी थी. तो वह भी नेट प्रैक्टिस के लिए आ गए.शास्त्री अपनी लेफ्ट आर्म स्पिन कर रहे थे. संजय मांजरेकर बैटिंग कर रहे थे.शास्त्री ने बॉल फेंकी. संजय ने आगे बढ़कर कवर पर मारा. बॉल सीधे मैदान के किनारेबनी लकड़ी की बेंच पर गिरी. शास्त्री गुस्से से मांजरेकर की तरफ बढ़े और बोले,देवधर में ऊपर खेलकर ऐसे क्यों नहीं मारा. संजय का चेहरा सफेद पड़ गया. उस मैच केदौरान तो रवि शास्त्री कटक में श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट मैच खेल रहे थे. फिर संजयको पता चला कि मुंबई क्रिकेट सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है, फट्टू क्रिकेटर नहीं. डरसबसे बड़ी कमजोरी माना जाता है. और अपने स्वार्थ को टीम के ऊपर रखना भी.संजय ये सबक आखिरी तक दोहराते रहे. जब नब्बे के दशक के बीच में साउथ अफ्रीका की टीमभारत आई तो संजय ने अपना आखिरी टेस्ट खेला. वह किसी भी कीमत पर टेस्ट टीम में रहनाचाहते थे. इसके लिए ओपनिंग को भी तैयार थे. जबकि पूरी जिंदगी उन्होंने मिडल ऑर्डरमें खेला. संजय को ओपनिंग के लिए कहा गया, क्योंकि एलन डोनाल्ड, फैनी डि विलियर्सऔर ब्रॉयन मैकमिलन को कोई भी पहले सेशन में खेलना नहीं चाहता था. संजय को फट्टू टैगयाद था. वह नहीं डरे और खेले. 34 रन पर आउट हुए. मगर स्पिनर की बॉल पर. ये उनकेकरियर का आखिरी टेस्ट था. दूसरी पारी में वह 5 रन पर आउट हुए. पर भारत ने वह टेस्टजवागल श्रीनाथ की बॉलिंग के दम पर जीता.-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ें:महान भारतीय क्रिकेटर कोच बना, खिलाडी को थप्पड़ मारा और नौकरी गंवा दीजब फॉलो-ऑन हटाने के लिए 24 रन चाहिए थे और कपिल ने लगातार 4 छक्के मार दिएवो मैच जिसमें इंडिया को ऑस्ट्रेलिया ने नहीं अम्पायरों ने हराया थादेखिये साल 2017 में धोनी के मारे सभी छक्के, मात्र 50 सेकंड मेंसाल 2017 के वो 12 मैच जो इंडिया जीत नहीं सका