मियां यूसुफ़, अभी तुमने कोहली को देखा नहीं है!
मोहम्मद यूसुफ़ ने कहा कि इस वक़्त जो रूट हैं सबसे अच्छे बैट्समैन. और फिर शुरू हो गयी रूट और कोहली के बीच 'बेहतर कौन' की बहस.

मोहम्मद यूसुफ़ ने खुद साल 1998 से 2010 तक पाकिस्तान के लिए टेस्ट क्रिकेट खेला है. उन्हें ये तो मालूम ही होना चाहिए कि करियर की शुरुआत में ही किसी प्लेयर के स्टैट्स से उसे बड़ा प्लेयर नहीं बता सकते. जो रूट ने अपना क्रिकेट करियर 2013 में शुरू किया (टेस्ट क्रिकेट 2012 के आखिरी महीने में). जबकि कोहली इंडियन टीम का 2008 से हिस्सा हैं. टी-20 उन्होंने 2010 और पहला टेस्ट 2011 में खेला.
कोहली और रूट के खेलने के तरीके की बात करें तो दोनों ही प्लेयर्स में एक समानता है. वो ये है कि ये दोनों ही प्लेयर्स शरीर से नहीं स्ट्रोक के दम पर ज़मीनी क्रिकेट खेलते हैं.
कोहली और रूट उस लेगसी का हिस्सा बनने के लिए बस लाइन में ही खड़े मालूम देते हैं. ऐसे में एक जो सबसे मुश्किल काम होता है वो है कि ज़मीनी क्रिकेट खेलते हुए अग्रेसिव गेम खेलना. इस काम को करने के लिए जो स्किल और पेशेंस एक बैट्समैन में चाहिए होता है वही तय करता है कि किताबों में उसका नाम कहां दर्ज होगा. इस मामले में कोहली कितनी ही बार रूट को पीछे छोड़ते हुए मालूम देते हैं. विराट कोहली की सबसे बड़ी ताकत है उनकी इनिंग्स को कन्वर्ट करने की फ़ितरत. कोहली एक बार जमे तो जम जाते हैं. उनकी छोटी, संभली इनिंग्स को बड़ी इनिंग्स में कन्वर्ट करने की आदत है. टेस्ट मैचों में 12 सेंचुरी और 12 हाफ़ सेंचुरी हैं. वहीं रूट की 10 सेंचुरी और 21 हाफ़ सेंचुरी हैं. यानी कोहली के पचास रन मारने के बाद उसे सेंचुरी में बदलने के चान्सेज़ 50% होते हैं. जबकि रूट के लिए ये चांसेज मात्र 32.25% ही रह जाता है. और भी आसन भाषा में - कोहली की हर दूसरी हाफ़ सेंचुरी, सेंचुरी में बदलती है जबकि रूट इसके लिए तीन हाफ़ सेंचुरी लेते हैं. 2015 से जून 2016 तक रूट के 19 मैचों में 4 सेंचुरी थीं जबकि 13 हाफ़ सेंचुरी थीं. यहीं पर कोहली बड़े स्कोर की ओर बढ़ते हुए और भी पेशेंट और शातिर हो जाते हैं. उन्हें बड़े स्कोर की भूख है जिसे वो जितना हो सकता है पूरा करते रहते हैं.
हालांकि बाजुओं के दम पर क्रिकेट खेलना भी खेल का एक हिस्सा है लेकिन वो गेल, वार्नर और हेडेन सरीखों के ही हिस्से में आया. क्रिकेट में बल्लेबाजी का पर्याय बन चुके सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और रिकी पोंटिंग ने अपना नाम हवाई शॉट्स से नहीं बल्कि कवर ड्राइव्स और स्क्वायर कट्स से बनाया.
वन-डे मैचों में रूट को कोहली से कम्पेयर न ही करें तो बेहतर होगा. ऐसा करने पर रूट का गेम छोटा दिखने लगेगा. ये वही बात हो जाएगी कि एक लम्बी रेखा के सामने और भी लम्बी रेखा खींच दो तो वो खुद-ब-खुद छोटी दिखने लगती है. रूट बेशक अच्छे प्लेयर हैं लेकिन 163 इनिंग्स में 25 सेंचुरी और 36 हाफ़ सेंचुरी के सामने उनके स्टैट्स बौने लगते हैं. अगर दलील ये दी जाए कि कोहली की खेली हुई इनिंग्स ज़्यादा हैं तो कोहली हर 6.5 इनिंग्स में सेंचुरी ठोंकते हैं जबकि जो रूट 8.5 इनिंग्स खर्च करते हैं. साथ ही कोहली के 51.51 के एवरेज के मुक़ाबले रूट का एवरेज 45 का है. स्ट्राइक रेट में भी कोहली के 90 के सामने रूट के 85 ही हैं. यानी हर 100 गेंदों में कोहली 5-5 रन एक्स्ट्रा बनाकर रूट को पीछे छोड़ रहे हैं.
विराट कोहली अपने साथ ही साथ एक भार और भी लिए चल रहे हैं. टेस्ट टीम की कप्तानी. साथ ही टी-20 और वन-डे के अगले कप्तान भी वही होने वाले हैं. अंडर-19 वर्ल्ड कप जीतने के बाद टीम इंडिया में आने से लेकर आज जहां कोहली हैं वो वाकई किसी आश्चर्य से कम नहीं है. ऐसा इसलिए है क्यूंकि टीम में आने के बाद अपने करियर को बैलेंस कर पाने में इन्हें दिक्कतें हुई. शायद कोहली को सफ़लता कुछ ज़्यादा ही जल्दी मिल गयी या ऐसा कि वो मिली सफ़लता को संभाल नहीं पाए. उस दंभ और बदतमीज़ी से भरे विराट कोहली के लिए 'भटका हुआ नौजवान' का फ्रेज़ बिलकुल फिट बैठता है. लेकिन वहां से कुछ सीनियर मेम्बर्स की नसीहतों और उनकी मदद से कोहली के अन्दर जो बदलाव आये वो किसी भी क्रांति से कम नहीं हैं. कोहली जिस तरह से अग्रेशन और पेशेंस का एक ख़तरनाक कॉकटेल लेकर खुद को बारम्बार खंरोचते हुए खुद को दोबारा बुना है. और आज वो टीम की बैटिंग को न केवल लीड करते हैं बल्कि सचिन के उत्तराधिकारी बन बैठे हैं. दूसरी ओर जो रूट अपनी बड़ी इनिंग्स के बावजूद वो कॉन्फिडेंस नहीं जगा पाए हैं, जिसे इंग्लैण्ड की टीम को सख्त ज़रुरत है.
इन सभी दलीलों का ये कतई मतलब नहीं है कि विराट कोहली को रूट से बेहतर बैट्समैन स्थापित कर देना चाहिए. जो रूट जहां इंग्लैण्ड के लिए एक अड़ियल ताकत बनते जा रहे हैं वहीं कोहली टीम इंडिया के लिए ऐसी ही एक ताक़त बन चुके हैं. कोहली के दम पर टीम इंडिया मैदान में उतरती है, रूट के लिए ऐसा होने में अभी वक़्त है. हालांकि आने वाले समय में उन्हें इंग्लैण्ड का कप्तान बनते हुए देखा जायेगा. दोनों ही बल्लेबाजों के बड़े अटैक्स के खिलाफ़ रन बनाये हैं. रूट ने जहां ऐशेज़ 2015 में 2 सेंचुरी मार इंग्लैण्ड की जीत में एक बड़ा रोल प्ले किया वहीं कोहली ने ऑस्ट्रेलिया में दोनों इनिंग्स में सेंचुरी मारकर खुद के जिद्दी होने का बेमिसाल नमूना पेशा किया.
मुंबई में वर्ल्ड टी-20 में हुए साउथ अफ्रीका के साथ मुकाबले में 229 रनों का पीछा करते हुए जो रूट ने धीमी शुरुआत की. 12 गेंदों में ग्यारह रन मारने के बाद 44 गेंदों में 83 रन मारकर इंग्लैण्ड को जीत दिलाई. लेकिन टी-20 में कोहली के नाम ऐसी तमाम इनिंग्स दर्ज हैं. कोहली की ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ टी-20 वर्ल्ड कप में ही 51 गेंदों पर खेली 82 रन की इनिंग्स उसका एक नमूना है. इसके साथ ही 40 ओवरों में 320 रन का टार्गेट चेज़ करते वक़्त 86 गेंदों में 133 रन बनाकर कोहली ने ये स्थापित कर दिया था कि टार्गेट चेज़ करने में उनसे पार पाना मुश्किल है.
क्रिकेट की बात जब भी होती है, 'बेहतर कौन' की बहस आस पास हमेशा मौजूद रहेगी. लेकिन बेहतर ये होगा कि ऐसी बहसों के लिए टाइमिंग सही रक्खी जाए. रूट और कोहली के बीच ऐसे कम्पेयरिज़न और 'बेहतर कौन' की ऐसी बहस के लिए फिलहाल ये सही समय नहीं है.
पोंटिंग जब रिटायर हुए थे तो बोलकर गए थे कि उनके जैसा बल्लेबाज वो आखिरी ही हैं. उनके बाद मैदान पर सिर्फ 'दानव' ही खेलेंगे. रूट और कोहली, दोनों ही खिलाड़ियों ने पोंटिंग को झूठा साबित करते हुए टाइमिंग, क्लास और न हारने की ज़िद के दम पर आज हमें इस बात पर बहस करने के लिए मजबूर कर दिया है कि आखिर इन दोनों में बेहतर है कौन.

