सरदार पटेल की गुजरात में लगने वाली मूर्ति में किस-किस कंपनी का पैसा लगा है?
बनने के बाद ये मूर्ति दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से भी ज्यादा ऊंची होगी.
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फोटो - thelallantop
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स्टेच्यू ऑफ यूनिटी. यानि लौह पुरुष के नाम से जाने जाने वाले देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की 181 मीटर ऊंची मूर्ति. दुनिया की मशहूर स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी, जो अमेरिका में है, उससे तकरीबन दो गुनी ऊंची. 31 अक्टूबर 2013 को केवड़िया में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधारशिला रखी थी. लागत तकरीबन 3000 करोड़ रुपये आनी है, जिसका सिर बनकर गुजरात पहुंच गया है. सिर की ऊंचाई 8 मीटर है. इस मूर्ति पर कई निजी और सरकारी कंपनियों ने भी पैसे लगाए हैं.
देश की पब्लिक सेक्टर की सबसे बड़ी तेल कंपनियों ने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत इस स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के लिए 121 करोड़ रुपये दिए हैं. कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी वो चीज होती है, जिसके तहत कंपनियां लोगों के हित के लिए अपनी कमाई का एक अंश देती हैं. इसी के तहत कंपनियों ने ये पैसे दिए हैं.

गुजरात में बन रही सरदार पटेल की मूर्ति का प्रस्तावित स्वरूप.
कंपनियों की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक तेल कंपनी ओएनजीसी ने 50 करोड़ रुपये, ओआईएल और एचपीसीएल ने 25-25 करोड़ रुपये और आईओसीएल ने 21.83 करोड़ रुपये दिए हैं. आंकड़ों की माने तो इस साल 92 कंपनियों ने राष्ट्रीय धरोहरों पर 18 सितंबर तक 155.78 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. वहीं पिछले साल इस समय तक कंपनियों ने मात्र 46.5 करोड़ रुपये ही खर्च किए थे.
पब्लिक सेक्टर की कंपनियों की ओर से सरदार पटेल की मूर्ति के लिए पैसे देने पर विवाद भी हुआ था. उस समय कहा गया था कि यह जनता के टैक्स का पैसा है, जिसके लिए कंपनियों और सरकार दोनों को ही जिम्मेदार होना चाहिए. एक ऐसे देश में जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी जरूरतों, सुरक्षा की जरूरत है, वहां एक मूर्ति पर पैसे खर्च करना ठीक नहीं है. ये सीएसआर लॉ एंड कंपनी ऐक्ट 2013 का उल्लंघन है. हालांकि और लोगों ने इसकी मुखालफत की और कहा कि ये उन चीजों में शामिल नहीं है कि जिससे गरीबी दूर करने वाले फंड में कटौती की जाए. इसके पीछे मकसद था कि कॉरपोरेट सेक्टर भी हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित कर सके.
वीडियो में देखें गुजरात के एक शख्शियत की कहानी, जिसका नाम सम्मान से लिया जाता है
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देश की पब्लिक सेक्टर की सबसे बड़ी तेल कंपनियों ने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत इस स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के लिए 121 करोड़ रुपये दिए हैं. कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी वो चीज होती है, जिसके तहत कंपनियां लोगों के हित के लिए अपनी कमाई का एक अंश देती हैं. इसी के तहत कंपनियों ने ये पैसे दिए हैं.

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पब्लिक सेक्टर की कंपनियों की ओर से सरदार पटेल की मूर्ति के लिए पैसे देने पर विवाद भी हुआ था. उस समय कहा गया था कि यह जनता के टैक्स का पैसा है, जिसके लिए कंपनियों और सरकार दोनों को ही जिम्मेदार होना चाहिए. एक ऐसे देश में जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी जरूरतों, सुरक्षा की जरूरत है, वहां एक मूर्ति पर पैसे खर्च करना ठीक नहीं है. ये सीएसआर लॉ एंड कंपनी ऐक्ट 2013 का उल्लंघन है. हालांकि और लोगों ने इसकी मुखालफत की और कहा कि ये उन चीजों में शामिल नहीं है कि जिससे गरीबी दूर करने वाले फंड में कटौती की जाए. इसके पीछे मकसद था कि कॉरपोरेट सेक्टर भी हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित कर सके.
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