मुसलमानों को वोट बैंक समझा जाता है. आप ऑफेंड हो सकते हैं. लेकिन समझा जाता है. इसलिए चुनावों में उन्हें लुभाने की तिकड़में भिड़ाई जाती हैं. तो चुनाव के बाद ये भी तो देखना चाहिए कि उनने वोट किसे दिया, किस पैटर्न पर दिया. जिन 5 प्रदेशों में चुनाव नतीजे आए हैं, उनमें से तीन- असम, केरल और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का अनुपात बहुत ज्यादा है. जम्मू कश्मीरजित्ता नहीं, पर भारत के औसत से ज्यादा है. गुरुवार के नतीजों के बाद वोटों का हिसाब-किताब समझ लीजिए.
कहा जाता है कि जहां सेक्युलर क्षेत्रीय पार्टियां नहीं हैं, वहां मुसलमानों के वोट कांग्रेस ही ले जाती है. लेकिन इस बार राहुल गांधी की पार्टी के लिए बुरी खबर है.
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कांग्रेस और उनके भाई-बंदों को केरल के मुस्लिम बहुल इलाकों में पिछली बार से कम वोट मिले हैं.
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पर यही बात बंगाल में उलट जाती है. वहां कांग्रेस को सीटें और वोट में हिस्सा बढ़ा है. असम में तो एक सीट ज्यादा भी मिली है, लेकिन वोटों में हिस्सा घटा है.
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इन तीनों राज्यों में बीजेपी की ऐसी तमाम सीटों पर बमचक कटी है. उनके वोटों के शेयर बढ़े हैं ऐसी जगहों पर, जहां मुस्लिमों की हिस्सेदारी ज्यादा है.
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असम में कांग्रेस ने 36 में 14 ऐसी सीटें जीतीं हैं, जबकि AIUDF ने 17 जीतीं हैं. असम में कांग्रेस का वोट फीसदी 31 है, बीजेपी का 29.5 और AIUDF का 13 परसेंट.
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असम की मुस्लिम बहुल सीटों में से 8 बीजेपी ने और AGP ने दो सीटें जीतीं हैं.
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केरल में LDF मुसलमानों के ज्यादा वोट बटोर ले गई है. UDF को बड़का चूना लगा है इन सीटों पर.
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पश्चिम बंगाल में लेफ्ट खुश हो सकती है. हारने पर कटाक्ष नहीं कर रहे हैं. मुसलमानों ने उन्हें इस बार पहले से ज्यादा वोट दिए हैं.
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प. बंगाल में TMC ने 65 मुस्लिम बहुल इलाकों में से 38 जीतीं हैं. पिछली बार 30 ही जीतीं थीं. वोट के परसेंट में TMC को लगभग 11% का फायदा हुआ है.
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मुस्लिम बहुल सीटों पर लेफ्ट को नुकसान हुआ है. लगभग 17% का.
10.
प. बंगाल में वोटों के नंबर और टोटल दोनों के मामले में कांग्रेस को बढ़त मिली है. 16 से 18 सीटें हो गईं हैं. और वोट परसेंट भी 5% बढ़ गया है.