महेंदर सिंह धोनी. टेस्ट क्रिकेट से रिटायर हुए दो साल होने ही वाले हैं. टी-20वर्ल्ड कप 2007, वर्ल्ड कप 2011, चैंपियंस ट्रॉफी 2013, टेस्ट चैंपियनशिप. ये सभीट्रॉफी अपने कैबिनेट में सजवाने वाला इंडियन क्रिकेट के इतिहास का सबसे सफ़ल कप्तान.ओमकारा ने कहा था, "शरत घोड़ों पर लगाते हैं कठोर, शेरों पर नहीं." धोनी वही शेर है.सबसे बड़ा लड़इय्या. खुद ओमकारा. और ये बात आजकल सिर्फ़ हरे मैदान पर ही नहीं, बंदथियेटर में भी लागू हो रही है. हिंदुस्तान के इतिहास में ये बायोपिक के मामले मेंसबसे बड़ी फ़िल्म है. पहले दिन 21.30 करोड़ रुपये. साल 2016 में सुल्तान के बाद दूसरीसबसे बड़ी ओपेनिंग. तो क्या हुआ कि बैटिंग लाइन-अप में धोनी ऊपर नहीं आता था, उसकीफ़िल्म की ओपनिंग ताबड़तोड़ है. कुल 3 दिनों में 66 करोड़. सलमान खान के बाद बॉक्स ऑफिसपे धोनी का दम दिखा है. धोनी की फ़िल्म की बात आते ही दो चेहरे दिखते हैं. एक तो खुदधोनी और दूसरा उन्हें स्क्रीन पर जीने वाला सुशांत सिंह राजपूत. हालांकि थियेटर सेनिकलने वाला हर इंसान सुशांत सिंह के बारे में बात करते नहीं थक रहा है, लेकिनशुरुआत में पहुंची भीड़ सुशांत नहीं बल्कि धोनी की खातिर गयी थी. नकली धोनी यानीसुशांत पर असली धोनी की प्रायॉरिटी की पुष्टि तब ही हो गयी थी, जब पूरी फ़िल्म केदौरान सबसे ज़्यादा शोर फ़िल्म के आखिरी 8-10 सेकंड्स में स्क्रीन पर असली धोनी दिखाईदेता है. 2011 वर्ल्ड कप जीतने के बाद, टीम के साथ मैदान का चक्कर लगाते हुए. सबसेपीछे. जैसे आराम करना चाह रहा हो. सब हो-हल्ले से दूर. उसने टीम को जश्न मनाने कीपावर ऑफ़ अटॉर्नी ट्रांसफर कर दी थी. खुद किसी कोने में बाल घुटवाने की तैयारी मेंलग गया. लेकिन थियेटर के अन्दर धोनी का सिक्का चला है. और इससे हमें साफ़ तौर परइंडियन क्रिकेट में उनकी अहमियत के बारे में पता चलता है. धोनी की वो कहानी जोकमोबेश सभी को मालूम ही है, को बड़े पर्दे पर देखने जाना लोगों के दिल और दिमाग मेंधोनी के लिए प्यार ही दिखाता है. बड़ी स्क्रीन पर धोनी का वो आखिरी छक्का देखनासचमुच ऐसा सुख देता है, जिसको हम काफ़ी समय से तलाश रहे होते हैं. और ये कहना कि वोवर्ल्ड कप का आखिरी शॉट महज़ क्रिकेट प्रेमियों के लिए ही अहमियत रखता है तो येनिहायती ग़लत स्टेटमेंट होगा. उस एक शॉट ने देश भर को एक कर दिया था. धोनी का हालकहीं न कहीं वैसा ही है, जैसा द्रविड़ का था. राहुल द्रविड़, इंडिया की दीवार. जबक्रिकेट को अलविदा कहकर गए तो अचानक हमें इस बात का अहसास हुआ कि हमारे बीच अब क्यामौजूद नहीं है. और ऐसे में हमें राहुल द्रविड़ की असल वैल्यू मालूम चली. और सच,राहुल द्रविड़ रिटायरमेंट के बाद वहां पहुंच गए जहां हमेशा उनका होना अपेक्षित था.धोनी के साथ भी बहुत कुछ ऐसा ही है. कोहली भरी जवानी में टेस्ट कैप्टन बने हैं.धोनी ने अपने बाल पांच दिन की धूप में उजले करवा लिए. धोनी के टेस्ट मैच से विदालेने पर एक गड्ढा बना है. उसे भरा जाना हाल-फिलहाल में तो संभव नहीं दिखता. और येबात हम सभी जानते हैं. ऐसे में तीन घंटो को ही सही, धोनी को देखने के लिए लोग निकलपड़े हैं. ये वो अहसास है जो शायद एक सेट ग्रुप ऑफ़ ऑडियंस को सलमान खान को देखनेमात्र से आता है. उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता कि फिल्म की कहानी क्या है, क्या स्क्रिप्टहै, क्या मामला है. उन्हें महज़ उस शख्सियत को पर्दे पर ज़िन्दा होते हुए देखना होताहै. इसके लिए टिकट की कीमत, समय और संगत मैटर नहीं करती. एम एस धोनी- द अनटोल्डस्टोरी की तगड़ी ओपेनिंग के पीछे भी यही ख़याल है. और यही फिलहाल, धोनी को क्रिकेट कीफ़ील्ड का सलमान खान बनाये रक्खे हुए है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:एम एस धोनी, छोटे शहर के बड़े आदमी पर बनी आधा सच समेटे फ़िल्मधोनी की फिल्म में मोहम्मद कैफ़ ने निकाली एक गलतीहोता है जब आदमी को अपना ज्ञान, कहलाए वो MS धोनी!