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मोहम्मद शमी की सीम बिल्कुल 'सीमलेस' कैसे है? कोच बदरुद्दीन ने बताया

शमी के कोच ने बताया कैसे एक छोटे से गांव का लड़का बना वर्ल्ड-क्लास बॉलर.

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16 नवंबर 2023 (अपडेटेड: 16 नवंबर 2023, 08:28 PM IST)
shami training struggle
शमी की कलाई की कला के पीछे की मेहनत (फ़ोटो- आजतक और सोशल मीडिया)
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एक ही नारा, एक ही नाम - शमी! शमी! शमी! 7 विकेट चटका कर 'शमी-फ़ाइनल्स' तो जिताया ही, पूरे टूर्नामेंट में ही धमक जमाए हुए हैं. विराट कोहली ने सचिन तेंदुलकर का रिकॉर्ड तोड़ दिया. क्रिकेट की तारीख़ में सबसे ज़्यादा शतक मारने वाले बल्लेबाज़ बन गए. मगर जनता ने लगभग एकमत से मैच का हीरो मोहम्मद शमी (Mohammed Shami) को बताया. लेकिन शमी की इस सफलता में उनकी मेहनत के साथ-साथ उनके कोच की भी भूमिका है. कोच बदरुद्दीन.

बीते दो दशकों से अमरोहा के मोहम्मद शमी ट्रेनिंग के लिए शहर से 25 किलोमीटर दूर सोनकपुर स्टेडियम जाते रहे हैं. बदरुद्दीन के पास. आजतक के जगत गौतम ने उन्हें खोजकर उनसे बात की.

शमी के प्रोफ़ेशनल करियर की शुरुआत भी सोनकपुर स्टेडियम से ही हुई. इससे पहले वो कहीं नहीं खेलते थे, सिर्फ़ गांव में. कोच ने बताया कि 2002 में शमी के पिता उनको सोनकपुर स्टेडियम लाए थे. पिता ने बताया कि 13-14 साल के शमी की गेंदबाज़ी के चर्चे पूरे अमरोहा में हैं. तो कोच ने कहा कि लगातार 30 मिनट गेंद फेंको. बदरुद्दीन बताते हैं,

“जो गेंद उसने पहले मिनट में फेंकी और जो तीसवें मिनट पर फेंकी, उसमें कोई अंतर ही नहीं था. वही पेस, वही फ़ॉर्म, वही स्विंग. तभी उसका जज़्बा पता चल गया था.”

प्रैक्टिस करते रहे. 16 बरस के हुए, तो अंडर-19 के ट्रायल के लिए गए. वहां भी बढ़िया परफ़ॉर्म किया, लेकिन आख़िरी राउंड में छंट गए. बहुत ज़्यादा उदास हो गए. कोच ने संभाला, कि पहली बार में ही इतना बेहतर परफ़ॉर्मैंस है. आगे तो आसमान है ही.

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कोच बदरुद्दीन ने बताया कि शमी हर रोज़ उनसे पहले ही आ जाते थे. बोले,

"जून में बहुत तेज़ गर्मी होती थी. पसीने में तरकर भी वो बोल डालता रहता था. कई बार तो हम परेशान हो जाते थे, कि कहीं ये पागल-वागल न हो जाए. शुरू से ही उसमें बहुत जुनून था. इसी वजह से वो आज इतना आगे बढ़ पाया है."

शमी की सीम पर महारत है, इसीलिए कोच अपनी अकैडमी के नए स्टूडेंट्स से भी कहते हैं कि अगर शमी जैसी कलाई की कला आ गई, तो एक बेहतर बॉलर बन जाओगे.

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शमी गेंद फेंकते हैं, तो लोग कहते हैं कि उनकी सीम बिल्कुल ‘सीमलेस’ है. यानी मुश्किल से मुश्किल गेंद बहुत आसानी से फेंक लेते हैं. इसके पीछे सालों की जी-तोड़ मेहनत है जिसके गवाह हैं उनके कोच बदरुद्दीन. इसीलिए शमी के नाम अज़हर फ़राग़ का एक शेर -

ये नहीं देखते कितनी है रियाज़त किसकी 
लोग आसान समझ लेते हैं आसानी को 

बाक़ी, शमी की कलाई की कला देखनी है, तो 19 तारीख़ का वेट कर लीजिए. फ़ाइनल्स में शम्मी भाई का जादू देखिएगा.

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