मोहम्मद कैफ़. हाल ही में छत्तीसगढ़ से खेलना शुरू किया है. कभी इंडिया को अंडर-19में अपनी कप्तानी में वर्ल्ड कप जितवाया था. फर्स्ट क्लास क्रिकेट में 10,000 रनपूरे कर लिए. बधाइयों का तांता लग गया. ट्विटर पर भी और मैदान पर भी. सहवाग ने तोये भी पूछ डाला कि इतने रन दौड़-दौड़ के बनाये हैं, कहीं कैफ़ का फेवरेट गेमपकड़म-पकड़ाई तो नहीं. मोहम्मद कैफ़ का नाम आते ही कुछ चुनिंदा मौके हैं जो याद आतेहैं. फिर वो चाहे 2004 के पाकिस्तान टूर पर पहले वन डे मैच में शोएब मलिक का कैच होया नेटवेस्ट ट्रॉफी की वो शानदार इनिंग्स, जिसके गुमान में सौरव गांगुली ने अपनीटीशर्ट हवा में लहरा दी थी. मोहम्मद कैफ़ शॉर्ट लेग में खड़े होकर मोहम्मद यूसुफ़ कोचिढ़ाते हुए चिल्लाता है, "यहां पर ज़बरदस्ती फ़ील्डिंग लगा रहे हो. मैं बोल रहा हूंएक भी चौका नहीं मारा और 87 गेंदें खेल लीं." मोहम्मद कैफ़ इसके साथ ही इंडियनक्रिकेट की उस पारी की शुरुआत करने वालों में से हैं, जो इंडिया को दोबारा जिलानेजैसा लगता है. इसमें दो सबसे मुख्य चीज़ें थीं विकेट के बीच में दौड़ और फ़ील्डिंग.इंडियन क्रिकेट टीम को दो पार्ट्स में बांटा जा सकता है. कैफ़ के पहले और कैफ़ केबाद. कैफ़ के पहले जब फ़ील्डिंग में खिलाड़ी के उमर का असर दिखता था. जब फील्डर रन सेज़्यादा खुद की देह की चिंता करता था. जब प्लेयर्स गेंद के पीछे तब तक दौड़ते थे, जबतक गेंद बाउंड्री तक पहुंच न जाती थी. लेकिन कैफ़ ने इसे बदला. पतली काया का खिलाड़ी.दौड़ने में तेज. कुहनियों पर गार्ड लगाकर फ़ील्डिंग करने आता था. इस बात के लिए पूरीतरह से तैयार कि गेंद को खुद की रेंज में पाने पर उसे आगे नहीं जाने देना है. और येधीरे-धीरे कैफ़ की पहचान बन गयी. इंडिया वर्सेज़ इंग्लैंड. वर्ल्ड कप 2003. साउथअफ्रीका. इंडिया 250 का टार्गेट दे चुका था. लखनऊ में उस रोज़ केबल टीवी की स्ट्राइककी वजह से इंडिया की बैटिंग कइयों ने देखी नहीं. सिर्फ सुनी. शाम होते-होते फोन परदी गयी धमकियों का फल ये मिला कि केबल दोबारा आने लगा. इंग्लैंड बैटिंग पर. शुरुआतीकुछ ओवर निकले थे. केबल आने के बाद पहली गेंद. किसने फेंकी, नहीं दिखा. बैट्समैन नेगेंद टैप की और दौड़ पड़ा. सोचा था सिंगल चुरा लेगा. कैफ शॉर्ट मिड विकेट से दौड़ पड़ा.आँखें बंद कर जोंटी रोड्स की उस ऐतिहासिक तस्वीर को याद करिये. अब उसमें कैफ़ को डालदीजिए. कसर बस ये थी कि स्टंप नहीं उखाड़े. मगर उस दिन निक नाइट को बिजली की तेजी केबारे में अहसास हो गया था. और इंग्लैंड को पहले प्यार के पहले गम का. कैफ़ ने अक्षरपढ़ने से पहले ये सीख लिया था कि फ़ील्डर को अपने अंगूठों पर रहना होता है. यहीएकमात्र कुंजी है चपलता की. पैरों को हवा में रखने वाला इलाहाबादी मोहम्मद कैफ़.https://www.youtube.com/watch?v=fa2OaMWK9Xc साल 2004. इंडियन टीम पाकिस्तान केदौरे पर थी. पहला वन डे मैच. इंडिया ने पाकिस्तान को 350 रन का टार्गेट दिया.पाकिस्तान ने भी जिस तरह से जवाब दिया, इंडिया मैच हारता हुआ लग रहा था. आखिरी 8गेंदों में 10 रन. ज़हीर खान, लेफ़्ट आर्म राउंड द विकेट. गुड लेंथ गेंद जिसे शोएबमलिक ने लेग साइड में रूम बनाकर हवा में खेल दिया. सीधे ज़हीर खान के सर के ऊपर.गेंद जिस तरह से ऊपर जा रही थी, उसके बाउंड्री क्लियर करने के चान्सेज़ उतने ही कमलग रहे थे. लॉन्ग ऑन और लॉन्ग ऑफ़ से दौड़ते हुए 2 प्लेयर्स गेंद को कैच करने के लिएदौड़े. गेंद सर्कल के आस-पास ही गिरती दिख रही थी. लॉन्ग ऑफ से दौड़ के आते हुआप्लेयर दूसरे वाले से भिड़ गया. दोनों गिर पड़े. टीवी पर देखने वाले लोगों की समझ मेंकुछ नहीं आ रहा था. कैच गिर गया मालूम दे रहा था. मगर तभी एक उठा और जश्न मनाते हुएदौड़ पड़ा. उसने गेंद कैच कर ली थी. दौड़ते वक़्त उसकी पीठ दिख रही थी. और पीठ पर लिखाथा - कैफ़. अगले ही मिनट इंडियन टीम झुंड में खड़ी दिखी. कुछ ही देर में इंडिया ने वोमैच अपने हिस्से कर लिया. https://www.youtube.com/watch?v=CbNw2wy-Mwo टीम इंडियाकी इसी भीड़ में कैफ़ के साथ कुछ नाम और थे. युवराज सिंह. सुरेश रैना. और ये तिकड़ीटीम इंडिया की एक अभेद्य दीवार बन के खड़ी होती थी. युवराज पॉइंट पर जमते, कैफ़ कवर्समें फंदा टांगे मिलते और रैना उछलने कूदने वाली जगहों पर पाए जाते. कभी डीप में तोकभी मिडविकेट पर. सर्कल के अन्दर इनसे पार पाना मुश्किल हो चला था. और यहीं टीमइंडिया का पुनर्निर्माण हुआ. ये एक नए जन्म की माफ़िक था. साथ ही इन्हें देख सीनियरप्लेयर्स ने भी जोर लगाना शुरू किया. युवराज सिंह का एक कैच, जिसने उनकी पहचानइंडियन जोंटी रोड्स के रूप में स्थापित कर दी, बांग्लादेश के खिलाफ़ मैच में था.इरफ़ान ने ऑफ स्टम्प के बाहर फेंकी गेंद. मोहम्मद रफ़ीक की आंखें चमक गयीं. तेज़ गेंदपर और भी तेज़ स्ट्राइक और गेंद पॉइंट फील्डर के ऊपर उड़ती हुई जा रही थी. मगर बीचमें युवराज सिंह ने जिस तरह से उछाल मारी, वो उनके अन्दर के जीनियस को दिखाता है.युवराज ने वो जंप इस तरह से टाइम की थी जिसे शायद ही कोई कर सकता था. वैसा करने केलिए आपको सचमुच युवराज ही होना पड़ता है. बाकी किसी के बस की बात ये लगती नहीं.हर्षा भोगले कहते भी हैं, "That ball was travelling. He has times his jump betterthan a computer could have." https://www.youtube.com/watch?v=WGgmbd0EjPE एकनेटवेस्ट सीरीज के उस महान फाइनल को अलग कर दें, तो मोहम्मद कैफ़ की बैटिंग उस तरहकी छाप नहीं छोड़ सकी जैसा उनकी फील्डिंग ने छोड़ा. और सही मायनों में देखें, तो उनकीफील्डिंग ने हमेशा उनकी बैटिंग को कवर किया. अगर कभी लगता था कि उन्होंने 10 रन कमबनाये तो टीम को ये यकीन रहता था कि मैदान के किसी भी कोने में खड़े रहकर 15-20 रनबचा सकते हैं. साथ ही जो कैच लपकेंगे वो अलग. टीम इंडिया को आज एक अच्छी फ़ील्डिंगयूनिट कहा जाता है. महेंद्र सिंह धोनी ने ऑस्ट्रेलिया टूर पर सचिन, सहवाग और गंभीरके बीच रोटेशन पॉलिसी अपनाते हुए यही दलील दी थी कि ये प्लेयर्स अगर साथ खेले तो हमएक स्लो यूनिट बन जाते हैं. फिर वो चाहे रनिंग बिटवीन द विकेट्स हो या गेंद के पीछेदौड़ने की बात हो. और अब कोहली, रहाणे, विजय, जडेजा में हम अच्छे फील्डर्स देखतेहैं, वो उसी लेगसी का हिस्सा है, जिसे कैफ़ की अगुवाई में युवराज और रैना के साथस्थापित किया गया था.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ो:मराठी में कही गई एक लाइन पर अजिंक्य रहाणे ने मार दिए 188 रनज़हीर खान: जिसने एक वर्ल्ड कप हराया, तो दूसरा जिता दियाजब युवराज ने 358 रन मार के धागा खोल दिया था, तब क्या हुआ था?होता है जब आदमी को अपना ज्ञान, कहलाए वो MS धोनी!बालाजी लाहौर में गेंद फेंकने दौड़ा तो लोग गा रहे थे “बालाजी ज़रा धीरे चलो…”टोनी ग्रेग की कमेंट्री के बिना सचिन की इनिंग्स फीकी लगती