वो गेट की ओर भागी और अपनी जूती उतारकर प्लेटफार्म पर फेंक दी
पढ़िए लल्लनटॉप कहानी कंपटीशन 2017 में जीतने वाली 15 कहानियों में से एक 'एस-2'.

पिछले साल 2017 में 10 से 12 नवंबर तक आज तक ने तीन दिवसीय आयोजन 'साहित्य आजतक' के जरिए साहित्यिक हलचल बढ़ाई. सरगर्मियां बढ़ाने में बड़ा किरदार लल्लनटॉप कहानी कंपटीशन का भी रहा.
इस प्रतियोगिता का पहला इनाम एक लाख रुपए था. 15 दूसरी कहानियों को भी पांच-पांच हज़ार रुपए का पुरस्कार दिया गया. आज पढ़िए इन्हीं 15 कहानियों में से एक एस-2. इसे लिखा है राणा रुद्र प्रताप सिंह ने.
रुद्र प्रताप आजमगढ़ के हैं. अभी नोएडा में रहते हैं. पेटीएम के साइबर सेल में नौकरी के साथ डिस्टेंस एजुकेशन से एमबीए कर रहे हैं. पहले सोशल मीडिया पर कहानियां लिखते थे. कविताओं में भी दिलचस्पी है. लल्लनटॉप कहानी कंपटीशन में पहली बार कहानी लिखी थी.
एस-2
स्टेशन पर चिल्ल-पों मची हुई थी. यूं लग रहा था, मानो पूरा भारत पुरानी दिल्ली के इस स्टेशन पर ही जुट गया हो. सच पूछो तो भारत स्टेशन पर ही दिखता है. कोई किसी को छोड़ने आया है, तो कोई किसी को लेने. कोई सामान चढ़ाने के लिए, तो कोई सामान उतारने को भाग रहा है.‘गरम समोसे ले लो. 20 के 4 गरम समोसे.’ ‘पानी बोतल, कोल्ड ड्रिंक, पानी बोतल’ ‘फलां गाड़ी, फलां प्लेटफॉर्म पर लग गई है. यात्रीगण कृपया स्थान ले लें.’ और न जाने क्या-क्या. लोग अपनी सुरीली, बेजोड़ आवाज़ में बेच रहे हैं, सूचित कर रहे हैं. आदि मेरा बैग उठाए आगे-आगे भाग रहा था और मैं उसके पीछे. आदि मेरा बड़ा बेटा, दिल्ली में डॉक्टर है. छोटा वाला, अभी भी दिल्ली में ही है, एक बहुप्रतिष्ठित, बहुचर्चित विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य की आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा है. इतने में ही हमारा लघु गंतव्य आ गया, एस-2 सीट नंबर 5. मैं सीट पर बैठ गई. आदि मेरे सामान को सीट के नीचे व्यवस्थित कर रहा था. सामान रखने के बाद बोला- ‘मम्मी, मैं पानी लेकर आता हूं.’
आदि बोलता कम था, अपनी दादी की मृत्यु के बाद से और चुप हो गया था. उनकी मृत्यु सुविधा की कमी से हुई थी, समय पर इलाज न मिल पाने की वजह से. तब से ही उसने ठान लिया था कि कुछ वर्ष हवा में उड़ने के बाद गृह जनपद में ही ठिकाना बनाएगा, वहां एक अस्पताल बनाएगा.
मम्मी- मेरी तंद्रा टूटी आदि की आवाज़ से. मैं बोली -हां बेटा. ये पानी की बोतल यहां रख रहा हूं. ठीक है, सुनो यहां आओ. जी. बैठो. वो बैठ गया. मुझे लग रहा था कि उसे कुछ कहना है. कुछ कहना है? -मैं बोली. नहीं मम्मी. पक्का? हां जी. अगले साल तेरी शादी करवाना चाहती हूं, तू तैयार है? जैसा आप ठीक समझें, लेकिन एक साल का समय और चाहिए मुझे अपना प्रॉजेक्ट शुरू करने के लिए. उसके बाद सोचिएगा. हां-हां ठीक है. ये बता कि कोई लड़की है या वो भी मुझे ही ढूंढनी पड़ेगी? मम्मी, आप जानती हैं. सब आपको ही करना है. ठीक है, लेकिन एक साल बाद मैं कुछ नहीं सुनूंगी. ठीक है, मम्मी. चलो, जाओ अब जी.
उसने मेरे पैर छुए और निकल गया. मैं खुद में मुग्ध हो पाती, इससे पहले ही उद्घोष हुआ- ‘यात्रीगण, कृपया ध्यान दें. दिल्ली से चलकर अलीगढ़, लखनऊ होते हुए आज़मगढ़ जाने वाली गाड़ी संख्या…. एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म संख्या 16 से जाने को तैयार है.’ गाड़ी रेंगने लगी. तभी देखा, आदि किसी का बैग एस-2 में चढ़ा रहा था. मुझे लगा ये किसका बैग चढ़ा रहा है. फिर देखा, सहारा देकर एक लड़की को ट्रेन में चढ़ा रहा था. लड़की ने उसे मुस्कुराते हुए धन्यवाद दिया और बैग संभालती हुई आगे बढ़ी. अचानक जैसे उसे कुछ याद आया. वो गेट की ओर भागी और अपनी जूती को उतारकर प्लेटफार्म पर फेंक दिया. वापस आते हुए उसने आदि को खिड़की पर हाथ हिलाते हुए देखा. वो तब तक खिड़की पर हाथ हिलाता रहा, जब तक कि प्लेटफॉर्म खत्म नहीं हो गया. लड़की बुरा सा मुंह बनाती हुई बड़बड़ा रही थी. उसकी सीट मेरे आस-पास में ही थी. मैंने उससे पूछ ही लिया, ‘कुछ कह रही हैं आप?’ उसने निगाह भर कर मुझे देखा और बोली, ‘देख रही हैं आंटी, जरा सी मदद मांग ली तो पूरी ट्रेन निकलने तक हाथ हिलाकर मुझे छोड़ रहे हैं.’ मैं मुस्कुराने लगी. वो गुस्से से बोली, ‘आप मुस्कुरा क्यों रही हैं?’ मैं बोली, ‘वो मेरा बेटा है और वो मुझे छोड़ने आया था।’ वो शर्मिंदा होते हुए अपने होंठ चबाती हुई बोली, ‘सॉरी आंटी, मुझे लगा…’ कह कर उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी. मैं बोली, ‘कोई बात नहीं बेटा. वैसे एक बात पूछूं आपसे?’ ‘अव्वल तो ये कि मैं आपकी बेटी जैसी हूं, तो आप न मुझे आप बोलने की जगह तुम बोलिए प्लीज. पूछिए, क्या पूछना है आपको,’ वो बोली. मैं मुस्कुराई और बोली, ‘ओके बेटा. मैं ये पूछ रही थी कि तुमने अपनी जूती क्यों फेंक दी बाहर?’ ‘एक्चुली मैं लेट हो रही थी. भाग कर ट्रेन पकड़ने में मेरे एक पैर की जूती कहीं निकल गई, तो मैंने ये सोचा कि किसी काम तो आ ही जाएगी अगर मैं दूसरी वाली भी बाहर फेंक दूं तो.’मैंने मुस्कुरा कर प्रशंसा भरी निगाहों से देखा उसे. ये 20-22 साल की लड़की जो नीली जींस पर सफेद कुर्ता पहने गले में दुपट्टा मफलर सा लपेटे, काले गोल फ्रेम का चश्मा पहने हुए थी, बड़ी दिलकश लगी. थकी हुई लग रही थी, गले में किसी कॉलेज का पहचान पत्र लटका हुआ था.
मैंने उसे गौर से देखा और पूछा, ‘मदीहा! बेटा आप सीधे कॉलेज से आ रही हैं?’ उसने आश्चर्य से देखा मुझे और जवाब के बदले सवाल दागते हुए पूछा, ‘आपको मेरा नाम कैसे पता?’ ‘तुम्हारे आई कार्ड से,’ उसके गले की तरफ इशारा करते हुए मैं बोली. ‘ओह! वो एक्चुली आज लास्ट एग्जाम था और घर जाना जरूरी है. मेरे दादू का बर्थडे है परसों,’ वो अपना आई कार्ड समेटते हुए बोली. ‘चाय पियोगी?’ मैंने अपना थर्मस खोलते हुए पूछा. ‘नहीं आंटी, आप पियो,’ उसने अनमने ढंग से कहा. ‘सीधे कॉलेज से आ रही हो, भूख नहीं लगी क्या?’ 'लगी है तो है लेकिन …’ उसने बात अधूरी छोड़ दी. मैंने चाय का कप उसकी तरफ बढ़ाया और बिस्किट का पैकेट भी. वो जहर खुरानी के बारे में आने वाली सारी चेतावनियां भूल गई और कप पकड़ लिया उसने. बात आगे बढ़ी तो मैंने पूछा, ‘तुम्हारी सीट कौन सी है?’ ‘एक नंबर, ये वाली,’ उसने इशारा करते हुए कहा. ‘मेरे घुटने में थोड़ा दर्द होता है. क्या तुम मेरी सीट पर चली जाओगी? पांच नंबर,’ मैं बोली. ‘नो इशू आंटी. आपको लेटना हो, तो मैं दूसरी सीट पर बैठ जाती हूं.’ ‘नहीं बेटा, बैठो अभी. वैसे जाना कहां है तुम्हें?’ ‘आजमगढ़. घर है मेरा वहां.’ ‘अरे, मैं भी तो वहीं जा रही हूं.’ ‘ग्रेट!’ ‘कहां पढ़ती हो?’ ‘मेडिकल कॉलेज में आंटी, एमबीबीएस लास्ट ईयर.’ ‘अरे मेरा बेटा भी डॉक्टर है, यहीं दिल्ली में. साल-दो साल बाद वो आजमगढ़ में अपना हॉस्पिटल शुरू करने वाला है.’ ‘फिर तो मेरे लिए भी बढ़िया है. मैं भी होम टाउन में जॉब कर सकती हूं. आपका घर है क्या वहां?’ ‘मेरा घर, मेरी ससुराल, मेरा लड़कपन, मेरी जवानी, स्कूल-कॉलेज, सब आजमगढ़ में ही है.’ ‘वाह आंटी, आप वर्ड्स बहुत अच्छे यूज करती हैं.’ ‘शायर हूं बेटा. शब्दों की साधना करती हूं.’ ‘ओह ग्रेट! मेरे दादा जी राइटर हैं.’ ‘बहुत अच्छी बात है ये तो. मिलना पड़ेगा उनसे.’तभी मेरा फोन बजा. आदि का फोन था. मैं उससे बात करने लगी. बात करने के बाद मैंने देखा कि मदीहा झपकी ले रही थी. उसका सिर मेरे कंधे पर टिकने ही वाला था कि मैंने सिर को गोद में ले लिया अपने. वो थोड़ा सा कुनमुनाई, लेकिन फिर सो गई. मैं खिड़की से बाहर झांकने लगी और दिमाग में आजमगढ़ बचपनाने लगा, उछल-कूद मचाने लगा.
आजमगढ़- मेरा शहर, जहां मैं पैदा हुई, लड़कपन जिया, यौवन बिताया, लेकिन पापा के जाने के बाद से जैसे आना-जाना ही बंद हो गया था. भैया-भाभी और बच्चे मुंबई शिफ्ट हो चुके थे. बाकी संबंधी गलतफहमियों के शिकार होकर नाता तोड़ चुके थे. ससुराल में भी सासू मां प्रयाण कर चुकी थीं और ससुर जी, जिन्होंने बेटी की कमी मुझमें पूरी की, हमारे साथ ही रहते थे. पति सरकारी अफसर थे, तो पूरा उत्तर प्रदेश अब घर सा ही लगने लगा था. ससुर जी और पतिदेव, दोनों को बेटी की चाह थी, लेकिन दोनों बार बेटे ही हुए. ससुर जी ने तो पोती के लिए नाम भी सोच लिया था. बड़ी लगन से उन्होंने यहां घर बनवाया और उसे नाम दिया- स्वेच्छांगना. यानी स्वेच्छा का अंगना. लेकिन वो कमी पूरी न हो सकी और फिर साल-दर-साल समय बीतता गया. इस शहर से उस शहर आशियाना बदलता रहा. पहले आदि और फिर अभी, दोनों का बचपन टिक-टिक घड़ी के जैसे बीतता गया. इनके बड़े होने के बाद मैंने अपना शौक फिर से जीना शुरू किया. बच्चे तो बड़े हो गए थे. इसलिए अब शब्दों को गोद में खिलाने लगी. हिंदी, उर्दू और आंचलिक भाषाओं के शब्दों से तुकी-बेतुकी बातें करने लगी. थोड़ा नाम भी कमाया, लेकिन असली मशहूरियत शायरी ने दिलवाई. अचानक ट्रेन कहीं रुकी, तो मेरी तंद्रा टूटी. शायद किसी ने चेन खींची थी. थोड़ी ही देर में ट्रेन फिर चली और मैंने अपनी कुछ पंक्तियां गुनगुनाना शुरू किया. अंधेरा छा रहा था. सितारे अपना यौवन टिमटिमा रहे थे. अचानक मदीहा अचकचाते हुए उठी और बोली, ‘सॉरी आंटी, मैं आपकी गोद में सो गई. आपके पैरों में दर्द हो रहा होगा. जगा देतीं मुझे. लाइए मैं दबा देती हूं आपके पैर.' कहकर वो मेरे पैर की तरफ अपने हाथ बढ़ाने लगी. मैंने अपने पैर बटोरते हुए उसे मना किया. बड़ी मुश्किल से मानी वो. रात के खाने का समय होने लगा था. कैटरिंग वाले ऑर्डर लेने के लिए आवाज लगा रहे थे. मैंने देखा कि मदीहा किसी कैटरिंग वाले की राह देख रही थी. न जाने क्यों उस बच्ची से बड़ा आत्मीय लगाव जान पड़ रहा था. शायद ये बेटी की कमी का परिणाम था. मैं उससे पूछ बैठी, ‘बेटा मेरे साथ खाना खा लो. बाहर का खाना पता नहीं कैसा होगा.’ ‘आंटी, आपको कम पड़ जाएगा न,’ वो बोली. ‘अरे नहीं, काफी है. आओ बैठो. रोज तो मेस में खाती ही हो, आज आंटी के हाथ का खा लो,’ मैं बोली. ‘ओके आंटी, आप किस टॉपिक पर लिखती हैं?’ ‘इश्क पर ज्यादा लिखती हूं,’ मैं बोली. ‘इश्क पर? क्या बात है आंटी. खाने के बाद कुछ सुनाएंगी, प्लीज.’ ‘पहले खाना तो खा लो. कैसा बना है?’ ‘रियली आंटी, इट्स टू यमी.’ ‘थैंक्स बेटा.’ खाने के बाद वो अपनी चप्पलें खोजने लगी. मैंने कहा, ‘तुम्हारी जूती तो दिल्ली में ही रह गई. मेरे बैग में एक्सट्रा चप्पल है, मैं निकालती हूं. तब तक तुम मेरी चप्पल पहन लो.’वो चप्पल पहनकर हाथ धोने चली गई. इतने में मैंने दूसरी चप्पल निकाल दी. मैं भी हाथ धोकर आई. बैठक जमी और मैं अपनी पंक्तियां याद करने लगी.
पहला शेर सुनाया मैंने- अदब की चाशनी के हर्फ़ो में सन गई हूं, तुम एक किताब से और मैं रेहल सी बन गई हूं. वो बड़ी संगीदगी से सुन रही थी. मैंने दूसरा शेर सुनाया— तुझे चाहने का मुझ पर इल्जाम है, तो है खातिर इसी खतरे में मेरी जान है, तो है अब चाहे जमाना मुझे कर दे शहर-बदर मेरे हाथ की हिना में तेरा नाम है, तो है. उसने ताली बजाकर मुझे बधाई दी. फिर मैंने कुछ एक शेर और सुनाया. उसने बड़े मन से सुना. आगे कुछ और बातें होने लगीं. उसने पूछा, ‘आप आजमगढ़ में कहां रहती हैं?’ ‘रैदोपुर. तुम?’ मैंने कहा. ‘जामा मस्जिद के पास.’ ‘जामा मस्जिद! अशआर अली साहब को जानती हो?’ ‘आप जानती हैं उनको?’ चौंकते हुए पूछा उसने. ‘मेरे पापा के दोस्त थे वो.’ ‘वही तो मेरे दादा हैं.’ ‘तुम आशनां की बेटी हो?’ मैंने खुशी से पूछा. ‘नहीं.’ ‘तो क्या हैदर की बेटी हो?’ ‘हां आंटी.’ मैंने उसका चेहरा पकड़कर माथा चूम लिया. वो हैरान थी. मैंने कहा, ‘आशनां मेरे साथ स्कूल में थी. कहां है वो आज-कल?’ ‘बुई तो इलाहाबाद में रहती हैं. आएंगी कल वो भी,’ उसने जवाब दिया. ‘हैदर और मम्मा?’ उसका चेहरा उतर गया. धीरे से बोली, ‘वो नहीं रहे.’ ‘क्या? कैसे? कब?’ मैंने कई सवाल किए. ‘चार साल हो गए आंटी.’ ‘सॉरी बेटा! मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या कहूं. रियली सॉरी बेटा.’ ‘इट्स ओके आंटी.’ मैं स्तब्ध थी. आंसू रास्ता ढूंढ़ चुके थे निकलने के लिए, लेकिन संकोच का ताला अभी खुला नहीं था. मैं खिड़की से बाहर झांकने लगी. ‘ओके आंटी, गुड नाइट,’ शायद वो मेरी मनःस्थिति समझ रही थी. मैंने अनचाही मुस्कान के साथ उसे गुड नाइट कहा. वो पांच नंबर सीट पर चली गई. मैं अब भी खिड़की से झांक रही थी. आंसू जब्त से बाहर हो चुके थे. मैं अपने पुराने दिनों में लौट गई थी. हैदर वही था, जिसके साथ मेरे पाक से रिश्ते को जमाने की जाहिलियत ने बदनाम कर दिया था. सारे नाते-रिश्तेदारों ने अपनी काबिलियत का परिचय दिया और कन्नी काट ली. साथ दिया पापा-मम्मी, ससुर जी और अशआर चाचा ने.हैदर मुझसे एक साल पीछे था कॉलेज में. मैंने उसे रैगिंग से बचाया था. तब से ही हमारी दोस्ती हुई थी. हालांकि पहले भी हमारा एक दूसरे के घर आना–जाना था, लेकिन इस वाकये के बाद ही हमारी दोस्ती हुई थी. कॉलेज, कैंटीन, मार्केट जैसी जगहों पर हम अक्सर मिलते थे. उसने आरिफा से भी मिलवाया मुझे. आरिफा उसकी दोस्त थी, जो बाद में पत्नी भी बनी उसकी. इधर जमाना अपनी औकात पर आने लगा था. अफवाहों ने ठंड में भी बाजार गर्म कर दिया था. ताने उफान पर थे, लेकिन मुझ पर कोई असर नहीं था क्योंकि पापा साथ थे. लेकिन कब तक लड़ते वो भी? अकेला चना इस बार भी भाड़ नहीं फोड़ पाया. हालांकि तानों ने मुझे और मजबूत बनाया था. मैं चाहने लगी कि हैदर से शादी हो, लेकिन ऐसा न हो पाया. नदी, समुद्र से लड़ाई न कर पाई.
हैदर की और मेरी शादी हुई, लेकिन अलग-अलग लोगों से. अम्मा गुजर चुकी थी. फिर जब पापा दिवंगत हुए, तो भैया भी मुंबई चले गए और आजमगढ़ से नाता कट सा गया. आज इतने दिनों के बाद मदीहा ये सब कुछ याद करने और कुछ आंसू बहाने के लिए साधन बनी. न जाने कब मेरी आंख लग गई. सुबह नींद खुली तो फोन की घंटी से. अभी का फोन, मेरा छोटा बेटा. बात करने के बाद मैंने नजर उठाई, तो देखा मदीहा ईयरफोन लगाए कोई किताब पढ़ रही थी. उसे देखकर मैंने मन-ही-मन कुछ तय कर लिया था. पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक छोटा शहर भी अब इतना बड़ा हो चुका था कि एक छोर की बात दूसरे छोर तक नहीं पहुंचती, ये आश्चर्य की बात है. इतने में मदीहा नीचे आ गई और मेरे बाजू में बैठ गई. मुस्कुराते हुए बोली, ‘गुड मॉर्निंग आंटी.’ मैंने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया. स्टेशन आने को था. हम सामान समेटने लगे. स्टेशन आ गया. हम उतरे. राजू मुझे लेने आया था. वो हमारे ‘स्वेच्छांगना’ की देख-भाल करता था. मैंने मदीहा से पूछा, ‘छोड़ दूं तुम्हें?’ ‘नहीं आंटी, चली जाऊंगी मैं,’ वो बोली. ‘पक्का?’ ‘हां आंटी.’ मैंने उसे गले से लगाया और जाने को मुड़ी, तभी वो बोली, ‘आंटी, कैन आई हैव योर मोबाइल नंबर?’ ‘बिल्कुल!’ मैंने उसे नंबर दिया अपना. फिर उसने मुझे साथ लगाते हुए एक सेल्फी ली. फिर बोली, ‘आपको दादू के बर्थडे पर आना है.’ मैंने कहा,‘तुम न बुलाती, तो भी मैं आती. लेकिन दादू को मत बताना.’ उसने हां में सिर हिलाया. हमने अपना-अपना रास्ता पकड़ा.अगले दिन सारे काम निपटाकर अंधेरा होने तक मैं मदीहा के घर पहुंची. अशआर चाचा को देखकर मैं भावुक हुई और आगे बढ़कर उनके पैर छुए. वो शायद पहचान नहीं पाए. मैंने बढ़कर उनके कान में कहा, ‘चाचा, मैं मैथिली.’ चाचा खड़े हुए. कुछ देर मुझे देखते रहे और फिर खुद से लगाकर रोने लगे. कुछ देर बाद सामान्य हुए. फिर सारा कार्यक्रम निपटा. बहुत बातें की उन्होंने मुझसे. बहुत खुश थे.
जाते-जाते मैंने चाचा के कानों में अपनी बात डाली, जो मैंने ट्रेन में सोची थी. मैंने उनसे अपने आदि के लिए मदीहा को मांगा था. वो चौंके और मेरी तरफ देखा. मैंने फिर कहा, ‘चाचा, इस बार हम नहीं हटेंगे पीछे. आपको कोई ऐतराज तो नहीं है न? आप मदीहा से भी पूछ लें.’ वो मुस्कुराए, जिसमें उनकी हामी झलक रही थी. मैं घर लौटने लगी. रास्ते में मैंने तय कर लिया कि इस बार चना भाड़ फोड़ कर रहेगा. मेरा ‘स्वेच्छांगना’ जो स्वेच्छा का अंगना न हो सका, वो अब मदीहा का आंगन होकर रहेगा. एक नया शेर आ रहा था जेहन में— ये सूरज रोशनी के काम को एहसास कहता था, कहो इससे कि अब मैं जुगनुओं को यार कहती हूंअचानक फोन वाइब्रेट हुआ. वॉट्सऐप मैसेज था. नए नंबर से. फोटो डाउनलोड हुई. स्टेशन की फोटो थी- मेरी और मदीहा की. बैकग्राउंड में ट्रेन का कोच था, जिस पर लिखा था- एस 2.
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Video देखें -
पान में लगने वाला चूना बनते अपनी आंखों से देख लीजिए -


