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विराट कोहली के बराबर मैच खेलने वाला ये प्लेयर उनसे आगे है

दोनों के बीच कड़ी टक्कर चल रही है.

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केतन बुकरैत
21 नवंबर 2016 (Updated: 21 नवंबर 2016, 09:21 AM IST)
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क्रिकेट में हमेशा एक लड़ाई रही है. बेहतर कौन. और सच कहूं तो ये बात हर जगह लागू हो रही है. फिल्मों में भी. पॉलिटिक्स में भी. खेल में तो है ही. हालिया वक़्त में ये लड़ाई इंडिया के विराट कोहली और इंग्लैंड के जो रूट के बीच में सिमट गयी है. 2016 में इन दोनों से ज़्यादा किसी और प्लेयर ने रन नहीं बनाये हैं. ये दोनों बैटिंग के शिखर पर बैठे हुए हैं. लेकिन फिर भी सवाल उठ रहा है कि बेहतर कौन है. सीधे स्टैट्स की बातें करें तो विराट कोहली ने साल 2016 में कुल 9 टेस्ट मैच खेले हैं. 897 रन बनाये हैं. इन 9 मैचों में कुल 3 सेंचुरी मारी हैं. जिनमें 2 बार वो 200 के पार पहुंचे हैं. ऐवरेज महाभयानक 69 का है. उधर जो रूट ने विराट कोहली से ज़्यादा टेस्ट मैच खेले हैं. 14 टेस्ट मैचों में 1192 रन. इन 14 मैचों में 3 सेंचुरी और 254 का सबसे ज़्यादा स्कोर है. ऐवरेज के मामले में जो रूट काफी पीछे हैं. उनके खाते में 49.66 का ऐवरेज चढ़ा हुआ है. Virat ये बेहतर होने की बहस तब और भी बढ़ जाती है, जब मालूम चलता है कि इंडिया और इंग्लैंड के बीच चल रहे दूसरे टेस्ट में दोनों अपना-अपना 50वां टेस्ट खेल रहे थे. ऐसे में दोनों के बीच कम्पेयर करने को और भी ज़्यादा मसाला मिल जाता है. इस मैच के पहले खेले 49 मैचों में कोहली ने 3643 रन 46.11 के ऐवरेज से बनाये हैं. इस दौरान 13 सेंचुरी और 12 हाफ़ सेंचुरी जड़ी हैं. जो रूट ने इतने ही मैचों में 4231 रन बनाये हैं. ऐवरेज भी बेहतर है. 53.55 का. 11 सेंचुरी और 23 हाफ़ सेंचुरी. अगर सेंचुरी की बात छोड़ दें तो विराट कोहली जो रूट से पिछड़ते नज़र आ रहे हैं. लेकिन क्रिकेट में स्टैट्स ही सब कुछ नहीं होता. स्टैट्स के अलावा भी बहुत कुछ ऐसा होता है जो हमें ध्यान में रखना ही चाहिए. स्टैट्स/नंबर्स कभी भी किसी भी प्लेयर के साथ जस्टिस नहीं करते हैं. और हमें ये भी मालूम है कि साल भर में सबसे बड़े प्लेयर्स के रूप में हमें विराट कोहली और जो रूट से इतर नज़र ही नहीं फिरानी चाहिए. 2016 इन दोनों के लिए पोटाश से भरा साल रहा है. इनकी स्कोर-बुक को भरपूर खाद-पानी मिलता रहा है. इन दोनों में किसी भी तरह के कम्पेरिज़न से पहले हमें इन दोनों के बैकग्राउंड में घुसना होगा. जो रूट शेफ़ील्ड में पले-बढ़े हैं. यॉर्कशायर क्लब क्रिकेट बेहद छोटी उमर से खेलना शुरू कर दिया. उनके खेल में वो इंग्लिशपन है. कहीं-कहीं कुछ मात्रा में खेल के 'मालिकों' वाली फ़ीलिंग आती है. वहीं विराट कोहली दिल्ली से आते हैं. वेस्ट डेल्ही. जहां सब कुछ ले लिया जाता है. सिवाय स्पेस के. स्पेस की बहुत दिक्कत रही है दिल्ली में. और शायद यही वजह है कि कोहली को मैदान में गैप्स ही गैप्स दिखते हैं. कोहली को ऑस्ट्रेलिया में कुछ साल पहले बिगड़ैल शहज़ादा कहा गया गया. कोहली कहते हैं "शायद मैं वही हूं. मुझे मालूम है वो लोग मुझे पसंद नहीं करते और ये मुझे पसंद आता है."कोहली का खेल उनकी ड्राइव से समझा जा सकता है. एक कड़ा बॉटम हैंड. सीधा बल्ला. और सबसे क्विक बैट-फ्लो. उनकी ड्राइव, ड्राइव नहीं एक तमाचे के माफ़िक पड़ती है. ड्राइव में हमेशा एक शालीनता खोजी जाती है. लेकिन कोहली के पास शालीनता की गुंजाइश कुछ कम है. वो गेंद को बाउंड्री तक पहुंचाने की जल्दबाज़ी में रहते हैं. ड्राइव मारने के प्रोसेस में गेंद उनके बल्ले से टकराने पर 'ठक' की आवाज़ की बजाय 'तड़ाक' की आवाज़ करती है. और इसी तड़ाक की आवाज़ में कोहली का सार छुपा होता है. 'ठक' की आवाज़ उनके लिए थी जिन्हें क्रिकेट भाषा की तरह सिखाया गया था. उन्हें पहले स्वर सिखाये गए, फिर व्यंजन और फिर शब्द बनाने की तालीम दी गयी. कोहली ने क्रिकेट को यूं सीखा जैसे उसे खुद की कोई भाषा बनानी हो. मिनियंस के जैसे. साल 2014 में वो जिमी एन्डरसन की बाहर जाती गेंदों पर शरीर से दूर खेलने के चक्कर में वो आउट हो रहे थे. यूं समझा जाने लगा था कि कोहली की काट ढूंढ ली गयी है. साल 2016 में दूसरा टेस्ट, पहला दिन, लंच के बाद पहली गेंद. जिमी एन्डरसन. वो ही बॉलर जो कोहली को सबसे ज़्यादा बार आउट कर चुका था. चार रन. मिडविकेट से जाता हुआ एक तगड़ा फ्लिक. और वहां से इंग्लैंड को मालूम चला कि कोहली के पैर चलते हैं. उन गेंदों पर जो शरीर से दूर जा रही थीं. कोहली एक कदम बाहर लेकर गेंद के पास पहुंच हल्के बॉटमहैण्ड से बल्ले का मुंह थर्डमैन की तरफ खोलने लगे. अब वहां रन बन रहे थे जहां कोहली का वैगन व्हील शांत पड़ा था. और यहीं क्रिकेट के कितने ही चार्ल्स डार्विन ने कोहली के अन्दर के और उनके अन्दर धंसे क्रिकेट के इवोल्यूशन को देखा. kohli 5जो रूट. कोहली की ही तरह एक बेहतरीन ऑफ़ साइड प्लेयर. 23 साल की उमर में ईसीबी का बिल्ला लगाये हुए जिस दिन पहली बार मैदान में बल्ला थामकर कदम रखा था, उसी दिन क्रिकेट के हर ज्ञानी को इंग्लैंड का आने वाला कप्तान दिख गया था. और लगातार बढ़ती बैटिंग को देख लोगों को एक सुखद आश्चर्य होता जा रहा था. शायद ही जो रूट के पहले ऐसा कोई इंग्लिश बैट्समैन था जिसने इस कदर इतनी जल्दी मेच्योरिटी हासिल की थी. बात चाहे 2013 में न्यूज़ीलैंड के खिलाफ़ अपने घर में पहली सेंचुरी मारने की हो या फिर ऐशेज़ में पहली बार ओपेनिंग करने उतरने पर मारी गयी सेंचुरी की हो. जो रूट का ग्राफ़ ऊपर ही चढ़ता जा रहा था. रूट हालांकि अपने स्कोरशीट्स में कभी भी भारी स्कोर बनाते जाने वालों में नहीं रहे लेकिन वो हमेशा कंसिस्टेंट रहे. 49 मैचों में 34 बार जो रूट ने अपने स्कोर को 50 रन के पार पहुंचाया है.

बैटिंग की ओर जो रूट की अप्रोच बहुत ही सिस्टेमैटिक रही है. वो हमेशा से एक प्लान के तहत काम करते हुए दिखाई दिए हैं. और इसी वजह से उनका विकेट हमेशा बॉलर की मेहनत मांगता था.


कोहली से उलट रूट अपने खेल के दुरुस्त होने पर ध्यान देते हैं न कि स्ट्रोकप्ले पर. रूट का धीरज और ढीढता उनके खेल को ऊपर पहुंचाता है. और यही वो बातें थीं जिसने जेफ़री बॉयकॉट को रूट में अपना खेल दिखाया. फ्रंट फुट ड्राइव में सचमुच माइकल वॉन दिखाई देते हैं. माइकल ने ही रूट को मेंटर किया है. दोनों ही शेफ़ील्ड से आते हैं. root 3
कोहली और रूट, दोनों ही खिलाड़ी अपने-अपने खेल के खिलाड़ी है. दोनों के खेल अलग हैं. दोनों की स्कीम अलग-अलग है. दोनों अलग-अलग माहौल से आते हैं. और ऐसे में इन दोनों को कम्पेयर करना किसी लैपटॉप और गैस चूल्हे को कम्पेयर करने जैसा है. कोहली को वन-डे में और जो रूट को टेस्ट में बेहतर बताने वालों को शायद कोहली का टेस्ट में बढ़ता खेल दिखाई नहीं देता. दूसरे टेस्ट में मारी हाफ़ सेंचुरी पर उन्होंने शायद ही किसी भी तरह का रिऐक्शन दिया. सेंचुरी पर पहुंचने पर उनका बल्ला बस कुछ कोण हवा में उठा, कसी हुई मुट्ठी पवेलियन की ओर दिखाई, और फिर अपने खेल में मशगूल हो गए. ये सब कुछ, सब कुछ कह जाता है. जो रूट ने भी इंग्लैंड की ओर से पहले टेस्ट में सेंचुरी मार इंग्लैंड को काफी राहत दिलाई थी. मैच भी ड्रॉ रहा. बांग्लादेश के बुरे सपने के बाद इंग्लैंड के प्रतिरोध की ये शुरुआत थी. कड़कती ठण्ड में गर्म रजाई ओढ़ने जैसा आराम. 
कोहली ने बतौर कप्तान, पिछली 30 इनिंग्स में 9 सेंचुरी बनाई हैं. पिछले 4 महीने में जिनमें 2 सेंचुरी डबल सेंचुरी में बदल गयी हैं. और जिस तरह से सेंचुरी मारने पर उनके चेहरे पर भाव आते हैं, वो बता देते हैं कि उनके लिए अब सेंचुरी मारने का मतलब आधा काम पूरा होना होने लगा है. कोहली के ऊपर कप्तानी का एक्स्ट्रा प्रेशर है. और धोनी की लेगसी भी आगे बढ़ाने का और भी बड़ा प्रेशर. इस लिहाज़ से प्रेशर झेलने के मामले में कोहली जो रूट से मीलों आगे खड़े हैं और जिसके बावजूद वो स्कोरशीट पर उन्हें कड़ी टक्कर देते हुए मिल रहे हैं.

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