हाल ही में कानपुर में एक टेस्ट मैच हुआ. 22 सितंबर से 26 सितंबर. इंडिया वर्सेज़न्यूज़ीलैंड. किस्सा सामने आया. जो आना ही था. मैच कानपुर में था. ऐसी वैसी जगहनहीं. सिद्धार्थ मोंगा ने कह सुनाया. कानपुर यानी वो शहर जहां थोड़ा तन्न-भन्न करनेवाली बात कही तो कंटाप पड़ता है. जहां आज भी बेटा अपने बाप को जवाब नहीं देता.क्यूंकि पान मसाला बिना पूरा पैसा वसूले थूकना कानपुर की सहूलियत में शामिल नहींहै. कानपुर यानी लोहा सिंह का शहर. जो एक नंबर का बिजली चोर है, लेकिन दावा करता हैकि हराम की नहीं खाता है. वो कानपुर जहां आदमी को तुरंत औकात में ला दिया जाता है.वो कानपुर जहां अम्पायर सीके नंदन अपना नाम खुलकर नहीं कह सकते. उसी कानपुर की पावनधरती पर अपने पांव रख रिद्धिमान साहा बैटिंग के लिए उतर रहा था. धोनी के रिटायरमेंटके बाद खाली हुई जगह के लिए एकमात्र विकल्प. रिद्धिमान साहा. कानपुर का आदमी इस कदरबीजी रहिता है कि उसे रंजी-उंजी देखने की छुट्टी नहीं रहती. कानपुर का आदमी ये सबबवाल में पड़ जाए तो ओबामा का बट्टा बईठ जाए. कानैपुर को तो मैनचेस्टर ऑफ़ ईस्ट कहितेथे. और लिहाजा एक पेवर कनपुरिये को रिद्धिमान साहा कउन है, कईसे है, नहीं मालूमरहिता है. आईपीएल भी देखे तो कईसे? या तो लेट नहीं आवेगी. लेट आई तो अम्मा कासीरियल चालू हुई जाता है. इस्क्रीन पर नाम पढ़ा तो मालूम पड़ा कौनो साहा है. पीछे सेआवाज आई, "बंगाली बकलोल है." टिकट पवेलियन के बगल में ही मिला था तो खिलाड़ीआता-जाता दिख रहा था. इसी बीच साहा उतरा तो मगज में कई सवाल कौंधे. सब रोक लिए. "ईखेल लेगा बे?" कद-काठी देख के विश्वास नहीं हो रहा था कि ये 'बंगाली बकलोल'न्यूज़ीलैंड के बॉलर्स का सामना कर पायेगा. साहा उतर चुके थे. 4 मिनट पूरे ही होनेवाले थे कि दूसरी गेंद पर बोल्ड हो गए. वापस लौट आये. कानपुर की जनता को सभी सवालोंका जवाब मिल चुका था. "ससुर लुड़ुस निकले." कानपुर अपना फ़ैसला सुना चुका था. येबम्बई नहीं था जहां सचिन हाय-हाय के नारे लगते. ये कानपुर था. आदमी या तो सूरमारहिता है या फिर लुड़ुस. साहा क्या थे, बच्चा-बच्चा जान गया था. लेकिन एक बात काजवाब अभी भी ढूंढा जा रहा था. साहा लौट रहे थे. पवेलियन में घुसने वाले थे. तभीसीढ़ियों के किनारे खड़े एक हजरात पूछ बैठे, "अबे बोर्नवीटा नहीं पिए हो का कभी? थोड़ाबढ़ जाते तो ठीक रहिता." बस यही कानपुर का फ़लसफ़ा है. इत्ता सा. लम्बे होने के लिएबोर्नवीटा पीता है. नहीं कुछ समझ में आया तो अगले से ही जवाब मांग लेता है. कोईझिझक नहीं. कोई हिचक नहीं.कानपुर से निकलना आसान नहीं है. मगर फ़िलहाल ज़रूरी है.रिद्धिमान साहा. इन्डियन क्रिकेट में मैच फ़िक्सिंग स्कैंडल के बाद कप्तानी संभालनेके अलावा इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी शायद ही इससे पहले किसी ने ली हो. विकेटों के पीछेखड़े रहने में धोनी के उत्तराधिकारी होने की ज़िम्मेदारी. कानपुर के बाद टीम इंडियासीधे कलकत्ता पहुंची. ईडेन गार्डन्स में दो बंगाली प्लेयर्स साहा और शमी के खेलनेके बावजूद सबसे ज़्यादा शोर उठा जब दादा मैदान में पहुंचे. शायद ये अधिकार दादा नेअपने हिस्से में करवा लिया है. हमेशा-हमेशा के लिए. साहा के लिए लोगों के मन मेंअभी भी मन में संशय था. लेकिन कुछ मुट्ठी भर लोग (ईडेन की कैपेसिटी के हिसाब से) जोआये थे, उन्होंने अपने प्रदेश के विकेटकीपर को टीम को संभालते हुए देखा. पहले विकेटके आगे फिर पीछे भी. धोनी का नाम शायद इतना बड़ा है कि साहा अपने बोर्नविटा के बिनाबढ़े कद को लेकर उनकी परछाईं के नीचे दबे रहते हैं. जबकि वो उतनी ही सटीक कीपिंग कररहे हैं, जितनी एक कीपर से अपेक्षा की जाती है. धोनी आम इंसान नहीं हैं, मशीन हैं,हम सभी जानते हैं. कानपुर की बातें और यादें अभी भी ज़ेहन में होंगी. जब साहा बैटिंगकरने उतरे थे. इंडिया पिछले 3 विकेट 13 रन में खो चुकी थी. नयी गेंद आने वाली थी.साहा आ चुके थे. ऐसे में दिमाग वाली इनिंग्स की दरकार होती है. नयी गेंद आने के ठीकपहले, साहा ने छक्का जड़ा. और यहीं बहुत कुछ तय हो चुका था. इंडिया को 220-230 कास्कोर नहीं चाहिए था. कम से कम 350. पहली इनिंग्स में उस पिच पर उससे कम स्कोर बहुतख़राब परफॉरमेंस दिखाता. विकेट्स बचाने थे. साथ ही रन भी बनाने थे. नयी गेंद कुछगड़बड़ भी कर सकती थी. साहा ने उल्टा अटैक करना शुरू किया. जीतन पटेल की एक लम्बीफेंकी गेंद को लॉफ्ट कर दिया. कानपुर में बोल्ट की डिलीवरी के सामने वो पकड़े गए थे.एलबीडब्लू हुए. यहां वो परेशान नहीं हुए. उन्हें लाइन से हटकर ऑफ साइड में खेलनापसंद है. बोल्ट को वैसे ही मारा. 22 गेंद में 14 रन बनाये. दिन ख़त्म. अगली सुबहअश्विन को ग़लत अम्पायरिंग डिसीज़न के चलते खो देने के बाद भी साहा ने एक एंड पकड़ केरखा. नयी बॉल से अच्छा खेला. बाउंड्री के चक्कर में पड़े बिना, रनिंग पर ध्यान दिया.कई जगह एक के दो किये. बंगाली टीम-मेट मोहम्मद शमी के साथ अच्छी स्ट्राइक रोटेट की.इसी दौरान चोट लगी. ठीक उसी जगह जहां सेंट लूशिया में लगी थी. सूजे हुए हाथ के साथ.मगर बावजूद इस चोट के, उनका बल्ला लगातार गेंदों पर चोट कर रहा था. इनिंग्स के अंततक ये हाल हो चुका था कि शमी के साथ साहा ने न्यूज़ीलैंड को फ्रस्ट्रेट कर दिया था.उसने शुरुआती ओवर्स रोक के खेले और जब फ़ील्ड ऊपर आ गयी तो चौके मारने शुरू किये. औरसबसे बेहतरीन शॉट था इनसाइड आउट खेला गया लॉफ्टेड शॉट जिसने साहा की फ़िफ्टी पूरीकी. उस वक़्त भी उसे मालूम था कि उसका काम अभी खतम नहीं हुआ था. उसने न हेलमेटनिकाला न बल्ला उठाया. बस एक थम्ब्स अप, ड्रेसिंग रूम की तरफ़. ये इंडियन टीम के लिएएक बेहद अच्छा संकेत है. अब एक ऐसा बैट्समैन आया है, जो जितना बैट्समैन है, उतना हीविकेटकीपर भी है. टी-20 के बाद से टीमें ऐसे बैट्समैन तलाशने लगी है जो विकेटकीपिंग भी कर ले. मगर साहा इस मामले में एक अपवाद हैं. एक सुखद अपवाद. एकसिक्योरिटी का एहसास देने वाले अपवाद.