लोग कहते थे मैं घमंडी हूं, मुझे खुशी है मैं वैसा था : कोहली
विराट कोहली. इंडियन टेस्ट क्रिकेट टीम के कैप्टन. आज कल गजब फॉर्म में हैं. टीवी पर दिया एक इंटरव्यू.
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फोटो - thelallantop
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27 मार्च 2016. मोहाली. 17 ओवर फेंके जा चुके थे. गेम मात्र तीन ओवरों का बचा था. जीतने को 39 रन. हर ओवर में 13 रन. हर गेंद पे 2 रन से थोड़ा ज़्यादा.
पहली गेंद - शॉर्ट. बैट्समैन फ्रंट फ़ुट पर पुल करता है. एक वक़्त था जब ऐसे शॉट्स मारने पर कोच नेट्स से भगा देता था. आज इस शॉट ने आशा बांध दी थी. बैकवर्ड स्क्वायर लेग के सामने से चार रन. दूसरी गेंद - ब्लॉकहोल में. ऑफ स्टम्प के ऐन बाहर. उस गेंद पर कवर ड्राइव. बल्ले का मुंह खोलते हुए. डीप स्क्वायर बाउंड्री पर फील्डर छलांग लगाता है लेकिन घास के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता है. दो रन प्रति गेंद की बजाय चार रन प्रति गेंद के हिसाब से रन बन रहे हैं. तीसरी गेंद - शार्ट ऑफ़ लेंथ. बॉल की लाइन में आके निचले हाथ की पूरी ताकत बल्ले में झोंक दी. वो ताकत जो घंटों जिम में पसीना बहाकर कमाई है. वो ताकत जिसने अब तक उसे कितने ही सिंगल और डबल दौड़ जाने के बावजूद मैदान में खड़ा रखा है. वो ताकत जिसके लिए वो कहता है कि मैं इसलिए आउट नहीं हो जाना चाहता क्यूंकि मैं थक गया हूं. मैदान में मौजूद क्राउड, टीवी पर देख रहे लोग पागल हो उठते हैं. घरों के अन्दर से चिल्लाने की, तालियां पीटे जाने की आवाज़ें आने लगती हैं. तीन गेंदों में 14 रन. 2 रन की बजाय लगभग 5 रन प्रति गेंद.
ओवर में कुल 19 रन आये. अगले ओवर में 16. आखिरी ओवर में बैटिंग करने वाली टीम मैच जीत जाती है. हर कोई सिर्फ़ एक ही नाम ले रहा है - विराट कोहली! हर कोई बस एक ही शख्स पर भरोसा कर रहा है - विराट कोहली. कोहली है तो सब ठीक है. नया सचिन. नया शक्तिमान. हिन्दुस्तानी माओं का नया लाडला. लड़कों का नया आइडल. लड़कियों का नया क्रश. विराट कोहली.
विराट कोहली का नया इंटरव्यू आया है. इंडिया टुडे के लिए उनसे बातचीत कर रहे थे बोरिया मजूमदार. बोरिया उन्हें उनके अंडर-19 के दिनों से कवर कर रहे हैं. जो खुद उनके कंसिस्टेंट फॉर्म को देख के उनकी तारीफ़ करते नहीं थक रहे हैं. वही बोरिया जो सचिन, सहवाग, द्रविड़, गांगुली जैसों को कवर कर चुके हैं आज कोहली के फैन हैं. पढ़ते हैं कोहली ने क्या बातें की बोरिया से:
उनकी कंसिस्टेंट फॉर्म के बारे में:
सच कहूं तो मैं ज़्यादा कुछ सोचता नहीं हूं. मैं पिछले दिनों, पिछले मैचों के बारे में कतई नहीं सोचता हूं. इसलिए मैं जिस भी दिन खेल की शुरुआत करता हूं, फ्रेश स्टार्ट करता हूं. आज के वक़्त में जब इतना ज़्यादा क्रिकेट खेला जा रहा है, उस वक़्त में ये ज़रूरी है कि आप फ्रेश स्टार्ट करें और अपनी भूख को मिटने न दें. क्यूंकि आप बहुत ही जल्दी खप सकते हैं और आपकी परफॉरमेंस बहुत ही जल्दी खतम हो सकती है. ऐसे में आपके बुरे फेज़ भी लम्बे खिंच सकते हैं क्यूंकि आपको उससे निकल के गेम के बारे में ज़्यादा सोचने का टाइम नहीं मिलता है. मेरा यही मानना है कि आप जितना कम सोचेंगे, उतना ही ज़्यादा अच्छे ज़ोन में रहके अपना काम कर सकेंगे. एक चीज़ जो मैं रेगुलरली करता हूं वो ये है कि मैं खेलने जाते वक़्त अपने दिल की धड़कन को मापता हूं. अगर दिल बहुत तेज़ी से नहीं धड़क रहा होता है तो मुझे मालूम होता है कि मैं अभी भी उस अच्छे स्पेस में हूं जहां मैं बेहतर खेल सकता हूं. ऐसी सिचुएशन में मैं खुद पर विश्वास करता हूं, खुद को ट्रस्ट करता हूं और सामने वालों की परवाह नहीं करता. ये सब कुछ इसलिए कि मैं अपने टर्म्स पर अपनी इनिंग्स की शुरुआत कर सकूं. पिछले कुछ महीनों में बहुत हद तक मैं अपने गेम के नज़दीक आया हूं. मैं बस सब कुछ बहुत ही सिंपल रखने की कोशिश कर रहा हूं.
अपने पैशन के बारे में:
इस चीज को समझना होगा कि आप जो कुछ भी कर रहे हैं, उसकी इज़्ज़त करें. जितनी भी बार आप खेलने जा रहे हैं, जितनी भी गेंदें आप खेलें, जितने भी गेम अप खेलें, चाहे वो टेस्ट हो या टी-20. मैं हर गेंद पर हमेशा अपना 120% देता हूं. यहां तक कि एक टेस्ट मैच में अगर अट्ठासीवें ओवर में गेंद को कैसे भी रोकना है तो मैं रोकूंगा. क्यूंकि मैं अपने जीवन में इस खेल के महत्त्व को समझता हूं. मुझे वो समय आज भी याद है जब मैं छोटा था और इंटरनेशनल क्रिकेट में आने की हर कोशिश कर रहा था. और आपको ऐसे समय को भूलना भी नहीं चाहिये जब आपने स्ट्रगल किया हो. जैसा कि कहा ही जाता है कि आप कहां से आये हो, ये भूलना ही नहीं चाहिए. ये कुछ ऐसा है कि इसके बारे में मुझे सोचना नहीं पड़ता. ये मेरे अन्दर बसी हुई है. शायद इसलिए मैं पूरी मेहनत करता हूं. फ़र्क नहीं पड़ता कि मैंने रन बनाये हैं या नहीं, जब तक मेरा शरीर साथ देगा, मैं अपना बेस्ट देता रहूंगा.
ऑस्ट्रेलिया में हुए नए जन्म के बारे में:
वो ख़राब दिन थे. मैंने वेस्ट इंडीज़ में अपने टेस्ट करियर की शुरुआत अच्छी नहीं की. मैं परेशान हो रहा था. शुरुआत में कुछ था जो सब कुछ ख़राब कर रहा था. उसे ठीक होने में थोड़ा वक़्त लगा. मुझे इंग्लैण्ड टूर से हटा दिया गया क्यूंकि मैंने अच्छा नहीं किया था. आखिरी टेस्ट के लिए मुझे बुलाया गया लेकिन मुझे खेलने को नहीं मिला. फिर इंडिया में वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ़ खेलने को मिला. दो फिफ्टीज़ मारीं. फिर ऑस्ट्रेलिया जाने को मिला. मैं वाकई एक्साइटेड था. मैं अपने टेस्ट करियर को सही शेप देना चाहता था. मेलबर्न में मुझसे कुछ नहीं हुआ. सिडनी में भी नहीं हुआ. हालांकि मैंने वार्म-अप गेम में हंड्रेड बनाया था. मैं सचमुच निराश हो गया था. कैसे भी करना चाहता था. अपने आप में उतना विश्वास नहीं रह गया था. लेकिन आज जब मैं उन दिनों के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि जो होना होता, जब होना होता है वो सचमुच में तब ही हो के ही रहता है. मुझे नहीं पता सिडनी के बाद क्या हुआ, मैंने अपने आपको ये बताना शुरू कर दिया कि मेरी आठ वन-डे इंटरनेशनल सेंचुरी हैं. मैं टेस्ट क्रिकेट खेलने के लिए सही हूं. ये किसी और को मुझे नहीं बताना था. मैंने खुद को ही ये बताना शुरू किया. जब भी मैं प्रैक्टिस करने या मैच खेलने जाता था, खुद को ये समझाता था. ऐसे में ही आपको लगने लगता है कि ऊपर एक ताकत तो है जो जब आप खुद में विश्वास रखते हैं तो आपको रास्ता दिखाती है.
टार्गेट का पीछा करने में विराट कोहली को क्या हो जाता है?
जैसा मैंने कहा, मैं अपने गेम में बहुत ही ज़्यादा विश्वास रखने लगा हूं. और ये एक नैचुरल प्रॉसेस है. जब आप इंटरनेशनल क्रिकेट में नए आते हो, आप खुद के लिए जगह बना रहे होते हो. अपना गेम समझने की कोशिश कर रहे होते हो. सामने वाले कुछ नया लेके आ जाते हैं आपके खिलाफ़. दो-तीन सालों तक आप टीम के लिए उतने इम्पोर्टेन्ट नहीं होते हो. लेकिन एक स्टेज के बाद जब आप सीनियर प्लेयर या ज़रूरी प्लेयर बन जाते हैं तब आपको अपने गेम को बढ़ाना पड़ता है. सामने वाली टीमों से पार पाने के लिए. क्यूंकि वो हर वक़्त आपको पीछे करने की हर कोशिश कर रहे होते हैं.
और रन चेज़ में मेरे लिए ये ज़रूरी है कि मैं ध्यान में रखूं कि टीम को टार्गेट अचीव करने के लिए क्या चाहिए. मेरे लिए जीतना सबसे बड़ी चाहत है और जीत सबसे अच्छी फीलिंग. ऐसे में बन रहे रिकॉर्ड्स उस जर्नी का एक हिस्सा हैं. क्यूंकि आपके सामने एक टार्गेट होता है, और अगर आप वो टार्गेट अचीव कर लें तो आप जीत जाते हैं. मैं उसी जीत की फीलिंग की चाहत रखता हूं. मैं उसे ही अपनी टीम के साथ पाना चाहता हूं.
प्रेशर कैसे संभालते हैं?
सच कहूं तो मैं कभी भी ऐवरेज नहीं होना चाहता था. बचपन से. यहां तक कि अपने क्लब क्रिकेट के दिनों में भी मैं सबसे ज़्यादा रन बनाना चाहता था. और अपनी टीम को जिताना चाहता था. बहुत से लोगों को इसमें घमंड नज़र आता था. उन्हें लगता था कि ऐसा करना नॉर्मल नहीं है. वो अपने कोच से ऐसा कह नहीं सकता और कहके जाकर परफॉर्म नहीं कर सकता. एमएस ने इसके बारे में ऑस्ट्रेलिया से मैच के बाद कहा था कि सब कुछ डिपेंड करता है कि आप सिचुएशन को कैसे देखते हैं. आप ग्लास को आधा भरा हुआ भी कह सकते हैं और आधा खाली भी. ऐसा कुछ भी नहीं है जो आप पा न सकें. आपके पास हमेशा सब कुछ जीतने का चांस रहता है. सब कुछ डिपेंड करता है कि आप कैसे उसकी तरफ बढ़ रहे हैं. जो भी करना चाह रहे हैं उसे कितनी एनर्जी से कर रहे हैं. मेरे लिए ये शायद नैचुरली आता है लेकिन मैं प्रेशर सिचुएशन में भी पॉज़िटिव सोच सकता हूं.
कप्तानी के बारे में:
आप कह सकते हैं कि कप्तानी मुझे नैचुरली आती है. शायद शुरुआत में मैं प्लेयर्स को उतने अच्छे से हैंडल नहीं कर पा रहा था. लेकिन अब जब पूरी टीम अपने आप को एक ही डायरेक्शन में ले जा रही है तो पूरी टीम ने सब कुछ आसान कर दिया है. जैसे कि हर बैट्समैन किसी भी पोज़ीशन पर बैटिंग करने को तैयार है. डिपेंड करता है कि टीम की सिचुएशन कैसी है. क्यूंकि हम सभी जीतना चाहते हैं और कोई भी अपने अकेले की परफॉरमेंस के पीछे नहीं भाग रहा है. लेकिन उस प्रॉसेस में लोग बहुत कुछ अचीव कर रहे हैं. आपने देखा रहाने को दो सेंचुरी मारते हुए. दिल्ली टेस्ट में. वो किसी माइलस्टोन के बारे में नहीं सोच रहा था. उसे सिर्फ टीम की पड़ी थी. लेकिन उसने दो सेंचुरी बनायीं जो उसे बहुत अच्छा लगा.
ऐसे में हमें ये समझना होगा कि हमें जीत के पीछे नहीं जीतने के प्रॉसेस के पीछे भागना चाहिए. उस दौरान जो भी अच्छा करता है, उसकी परफॉरमेंस को पूरी टीम के द्वारा एन्जॉय किया जाता है. मेरे लिए सबसे अच्छी चीज़ ये है कि टीम में सभी लोग मेरी उम्र के हैं. हम सभी अपना करियर साथ बना रहे हैं. ऐसे में ये एक इंट्रेस्टिंग सिचुएशन हो जाती है. क्यूंकि आपको मालूम है कि हर कोई अपना 100% देने वाला है. ऐसे में फिर कप्तान के तौर पर आप और कुछ नहीं मांग सकते हैं. आपको मालूम है कि हर कोई अपना बेस्ट करेगा, कमिटमेंट के साथ. फ़र्क नहीं पड़ता कि आप जीतें या हारें, आप उस कमिटमेंट को चाहते हैं.
अपनी ताकत के बारे में:
सब कुछ आपकी तैयारी पर डिपेंड करता है. अप कैसे एक गेम के लिए खुद को सेट-अप करते हैं. मेरे लिए ये है कि मैं 100 रन बनाने के बाद भी उतनी ही तेज़ी से भागना चाहता हूं जितनी तेज़ी से मैं ज़ीरो पर भागता हूं. इसलिए मैं खुद को वैसे ही ट्रेन करता हूं. मेरे कार्डियो सेशन भी
हाई-इंटेंसिटी होते हैं. स्प्रिंट करता हूं. अप-हिल हाई-अल्टीट्यूड मास्क पहन कर ट्रेनिंग करता हूं. उससे आप ज़्यादा ऑक्सीजन नहीं खींच सकते जिससे आपके फेफड़े और भी ज़्यादा खुल जाते हैं.
आपको जानना होगा कि आपका शरीर चाहता क्या है. उसे किस चीज की ज़रुरत है. शायद इसलिए मैं खुद को 70-80 पर होने के बावजूद सिंगल्स को डबल में बदलने के लिए पुश कर सकता हूं. क्यूंकि आपको गेम में पूरी तरह शामिल होना होगा. आपको स्ट्राइक बदलनी होती है. सिंगल्स और डबल्स लेकर आप उस शॉट को रोक सकते हैं जो आपको आउट करवा सकता है. आपको यही समझना होगा कि ये गेम का ये एरिया जो इतना छोटा सा लगता है, सबसे ज़्यादा फोकस मांगता है. अंत में गेम का सबसे बड़ा और ज़रूरी फैक्टर यही साबित होता है.
सचिन से कम्पेयर किये जाने के बारे में:
सच कहूं तो मैं शर्मिंदा हो जाता हूं. ये उनके लिए बिलकुल भी फ़ेयर नहीं है. उन्हें किसी से भी कम्पेयर नहीं किया जा सकता है. ये बिलकुल भी फ़ेयर नहीं है क्यूंकि आप एक अलग कैटेगरी के प्लेयर की बात कर रहे हैं. मेरा गेम साल-दर-साल बढ़ा है, वो खूबसूरत खेल को अपने साथ लेकर पैदा हुए थे. और चौबीस सालों तक ऐसा करते रहना मज़ाक नहीं है. मैंने सिर्फ 2-3 साल ही ये सब कुछ किया है. मैंने हमेशा उनको देखा है, उनसे इंस्पायर हुआ हूं. लेकिन उसी वक़्त मैं सिर्फ मैं ही रहना चाहता हूं. मैं एक ऐसा इंसान बनना चाहता हूं जो सचिन से इंस्पायर हुआ है लेकिन जिसने अपना रास्ता खुद बनाया. मैं ऐसा नहीं कह रहा कि मुझे ये पसंद नहीं है, लेकिन ये फ़ेयर नहीं होगा क्यूंकि मैं उनको देखता हुआ आया हूं. वो इस जनरेशन में क्रिकेट खेलने वाले किसी भी प्लेयर से दो लेवल ऊपर हैं.
उन्होंने सौ सेंचुरी मारी हैं. आज क्रिकेट खेलने वाले हर बैट्समैन को मालूम है कि एक-दो सेंचुरी मारना ही कितना कठिन होता है. उन्होंने चौबीस साल में जितना किया है, उसके बारे में बात करो तो थकान हो सकती है. और उन्होंने जो किया है वो इतनी शालीनता से किया है जिसका कोई जवाब नहीं. पूरे देश और दुनिया को अपने गेम में बांध के रखा. ऐसा और कहीं नहीं देखने को मिलता.
कोहली की प्राइवेट लाइफ है क्या?
मेरी प्राइवेट लाइफ मेरे होटल रूम तक ही सीमित है. मुझे अगर कॉफ़ी शॉप तक आकर ब्रेकफ़ास्ट करना हो तो मुझे पांच बार सोचना पड़ता है. ये बहुत ही अजीब लगता है. दिन के शुरुआत में ही अगर कुछ गड़बड़ हो जाये तो मुझे ठीक नहीं लगता. मैं बहुत सारा अटेंशन पाना पसंद नहीं करता. मैं उसपर ठीक से रिऐक्ट भी नहीं कर पाता. लेकिन उसी वक़्त मुझे बुरा भी लगता है जब 50 लोग ऑटोग्राफ़ मांग रहे होते हैं और मैं सिर्फ पांच बच्चों को ही ऑटोग्राफ़ दे पाता हूं. मैंने देखा है कि ऐसे में मेरे जाने पर धक्का-मुक्की हो जाती है और बच्चों को काफ़ी दिक्कत होती है. तो मैं जान-बूझकर वहां नहीं जाता हूं. मुझे बच्चों को परेशानी में देखन बहुत तकलीफ़ देता है. मैं अपनी मौजूदगी से उन्हें परेशानी में नहीं डाल सकता. ऐसे में मुझे समझ आ गया है कि काफी कुछ है जो मुझे करना होगा. मैं होटल की लॉबी से नहीं जा सकता. मुझे बैक-एग्ज़िट से निकल के किचन के अन्दर होते हुए जाकर खाना खाना होगा और वापस आ जाना होगा. आप जो भी करते हैं उसे कुछ पॉज़िटिव होते हैं और कुछ नेगेटिव. उसी समय पर मुझे घूमने को मिलता है तो मैं बाहर एकांत में समय निकाल सकता हूं. वहां मैं घूम सकता हूं. जब आप अपने देश के लिए अपने देश में खेल रहे होते हैं तो आपको अपने काम के साथ ये सब कुछ मिलता है. लोग अपना प्यार दिखा रहे होते हैं.
विराट कोहली का नया इंटरव्यू आया है. इंडिया टुडे के लिए उनसे बातचीत कर रहे थे बोरिया मजूमदार. बोरिया उन्हें उनके अंडर-19 के दिनों से कवर कर रहे हैं. जो खुद उनके कंसिस्टेंट फॉर्म को देख के उनकी तारीफ़ करते नहीं थक रहे हैं. वही बोरिया जो सचिन, सहवाग, द्रविड़, गांगुली जैसों को कवर कर चुके हैं आज कोहली के फैन हैं. पढ़ते हैं कोहली ने क्या बातें की बोरिया से:
उनकी कंसिस्टेंट फॉर्म के बारे में:
सच कहूं तो मैं ज़्यादा कुछ सोचता नहीं हूं. मैं पिछले दिनों, पिछले मैचों के बारे में कतई नहीं सोचता हूं. इसलिए मैं जिस भी दिन खेल की शुरुआत करता हूं, फ्रेश स्टार्ट करता हूं. आज के वक़्त में जब इतना ज़्यादा क्रिकेट खेला जा रहा है, उस वक़्त में ये ज़रूरी है कि आप फ्रेश स्टार्ट करें और अपनी भूख को मिटने न दें. क्यूंकि आप बहुत ही जल्दी खप सकते हैं और आपकी परफॉरमेंस बहुत ही जल्दी खतम हो सकती है. ऐसे में आपके बुरे फेज़ भी लम्बे खिंच सकते हैं क्यूंकि आपको उससे निकल के गेम के बारे में ज़्यादा सोचने का टाइम नहीं मिलता है. मेरा यही मानना है कि आप जितना कम सोचेंगे, उतना ही ज़्यादा अच्छे ज़ोन में रहके अपना काम कर सकेंगे. एक चीज़ जो मैं रेगुलरली करता हूं वो ये है कि मैं खेलने जाते वक़्त अपने दिल की धड़कन को मापता हूं. अगर दिल बहुत तेज़ी से नहीं धड़क रहा होता है तो मुझे मालूम होता है कि मैं अभी भी उस अच्छे स्पेस में हूं जहां मैं बेहतर खेल सकता हूं. ऐसी सिचुएशन में मैं खुद पर विश्वास करता हूं, खुद को ट्रस्ट करता हूं और सामने वालों की परवाह नहीं करता. ये सब कुछ इसलिए कि मैं अपने टर्म्स पर अपनी इनिंग्स की शुरुआत कर सकूं. पिछले कुछ महीनों में बहुत हद तक मैं अपने गेम के नज़दीक आया हूं. मैं बस सब कुछ बहुत ही सिंपल रखने की कोशिश कर रहा हूं.
अपने पैशन के बारे में:
इस चीज को समझना होगा कि आप जो कुछ भी कर रहे हैं, उसकी इज़्ज़त करें. जितनी भी बार आप खेलने जा रहे हैं, जितनी भी गेंदें आप खेलें, जितने भी गेम अप खेलें, चाहे वो टेस्ट हो या टी-20. मैं हर गेंद पर हमेशा अपना 120% देता हूं. यहां तक कि एक टेस्ट मैच में अगर अट्ठासीवें ओवर में गेंद को कैसे भी रोकना है तो मैं रोकूंगा. क्यूंकि मैं अपने जीवन में इस खेल के महत्त्व को समझता हूं. मुझे वो समय आज भी याद है जब मैं छोटा था और इंटरनेशनल क्रिकेट में आने की हर कोशिश कर रहा था. और आपको ऐसे समय को भूलना भी नहीं चाहिये जब आपने स्ट्रगल किया हो. जैसा कि कहा ही जाता है कि आप कहां से आये हो, ये भूलना ही नहीं चाहिए. ये कुछ ऐसा है कि इसके बारे में मुझे सोचना नहीं पड़ता. ये मेरे अन्दर बसी हुई है. शायद इसलिए मैं पूरी मेहनत करता हूं. फ़र्क नहीं पड़ता कि मैंने रन बनाये हैं या नहीं, जब तक मेरा शरीर साथ देगा, मैं अपना बेस्ट देता रहूंगा.
ऑस्ट्रेलिया में हुए नए जन्म के बारे में:
वो ख़राब दिन थे. मैंने वेस्ट इंडीज़ में अपने टेस्ट करियर की शुरुआत अच्छी नहीं की. मैं परेशान हो रहा था. शुरुआत में कुछ था जो सब कुछ ख़राब कर रहा था. उसे ठीक होने में थोड़ा वक़्त लगा. मुझे इंग्लैण्ड टूर से हटा दिया गया क्यूंकि मैंने अच्छा नहीं किया था. आखिरी टेस्ट के लिए मुझे बुलाया गया लेकिन मुझे खेलने को नहीं मिला. फिर इंडिया में वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ़ खेलने को मिला. दो फिफ्टीज़ मारीं. फिर ऑस्ट्रेलिया जाने को मिला. मैं वाकई एक्साइटेड था. मैं अपने टेस्ट करियर को सही शेप देना चाहता था. मेलबर्न में मुझसे कुछ नहीं हुआ. सिडनी में भी नहीं हुआ. हालांकि मैंने वार्म-अप गेम में हंड्रेड बनाया था. मैं सचमुच निराश हो गया था. कैसे भी करना चाहता था. अपने आप में उतना विश्वास नहीं रह गया था. लेकिन आज जब मैं उन दिनों के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि जो होना होता, जब होना होता है वो सचमुच में तब ही हो के ही रहता है. मुझे नहीं पता सिडनी के बाद क्या हुआ, मैंने अपने आपको ये बताना शुरू कर दिया कि मेरी आठ वन-डे इंटरनेशनल सेंचुरी हैं. मैं टेस्ट क्रिकेट खेलने के लिए सही हूं. ये किसी और को मुझे नहीं बताना था. मैंने खुद को ही ये बताना शुरू किया. जब भी मैं प्रैक्टिस करने या मैच खेलने जाता था, खुद को ये समझाता था. ऐसे में ही आपको लगने लगता है कि ऊपर एक ताकत तो है जो जब आप खुद में विश्वास रखते हैं तो आपको रास्ता दिखाती है.
टार्गेट का पीछा करने में विराट कोहली को क्या हो जाता है?
जैसा मैंने कहा, मैं अपने गेम में बहुत ही ज़्यादा विश्वास रखने लगा हूं. और ये एक नैचुरल प्रॉसेस है. जब आप इंटरनेशनल क्रिकेट में नए आते हो, आप खुद के लिए जगह बना रहे होते हो. अपना गेम समझने की कोशिश कर रहे होते हो. सामने वाले कुछ नया लेके आ जाते हैं आपके खिलाफ़. दो-तीन सालों तक आप टीम के लिए उतने इम्पोर्टेन्ट नहीं होते हो. लेकिन एक स्टेज के बाद जब आप सीनियर प्लेयर या ज़रूरी प्लेयर बन जाते हैं तब आपको अपने गेम को बढ़ाना पड़ता है. सामने वाली टीमों से पार पाने के लिए. क्यूंकि वो हर वक़्त आपको पीछे करने की हर कोशिश कर रहे होते हैं.
और रन चेज़ में मेरे लिए ये ज़रूरी है कि मैं ध्यान में रखूं कि टीम को टार्गेट अचीव करने के लिए क्या चाहिए. मेरे लिए जीतना सबसे बड़ी चाहत है और जीत सबसे अच्छी फीलिंग. ऐसे में बन रहे रिकॉर्ड्स उस जर्नी का एक हिस्सा हैं. क्यूंकि आपके सामने एक टार्गेट होता है, और अगर आप वो टार्गेट अचीव कर लें तो आप जीत जाते हैं. मैं उसी जीत की फीलिंग की चाहत रखता हूं. मैं उसे ही अपनी टीम के साथ पाना चाहता हूं.
प्रेशर कैसे संभालते हैं?
सच कहूं तो मैं कभी भी ऐवरेज नहीं होना चाहता था. बचपन से. यहां तक कि अपने क्लब क्रिकेट के दिनों में भी मैं सबसे ज़्यादा रन बनाना चाहता था. और अपनी टीम को जिताना चाहता था. बहुत से लोगों को इसमें घमंड नज़र आता था. उन्हें लगता था कि ऐसा करना नॉर्मल नहीं है. वो अपने कोच से ऐसा कह नहीं सकता और कहके जाकर परफॉर्म नहीं कर सकता. एमएस ने इसके बारे में ऑस्ट्रेलिया से मैच के बाद कहा था कि सब कुछ डिपेंड करता है कि आप सिचुएशन को कैसे देखते हैं. आप ग्लास को आधा भरा हुआ भी कह सकते हैं और आधा खाली भी. ऐसा कुछ भी नहीं है जो आप पा न सकें. आपके पास हमेशा सब कुछ जीतने का चांस रहता है. सब कुछ डिपेंड करता है कि आप कैसे उसकी तरफ बढ़ रहे हैं. जो भी करना चाह रहे हैं उसे कितनी एनर्जी से कर रहे हैं. मेरे लिए ये शायद नैचुरली आता है लेकिन मैं प्रेशर सिचुएशन में भी पॉज़िटिव सोच सकता हूं.
कप्तानी के बारे में:
आप कह सकते हैं कि कप्तानी मुझे नैचुरली आती है. शायद शुरुआत में मैं प्लेयर्स को उतने अच्छे से हैंडल नहीं कर पा रहा था. लेकिन अब जब पूरी टीम अपने आप को एक ही डायरेक्शन में ले जा रही है तो पूरी टीम ने सब कुछ आसान कर दिया है. जैसे कि हर बैट्समैन किसी भी पोज़ीशन पर बैटिंग करने को तैयार है. डिपेंड करता है कि टीम की सिचुएशन कैसी है. क्यूंकि हम सभी जीतना चाहते हैं और कोई भी अपने अकेले की परफॉरमेंस के पीछे नहीं भाग रहा है. लेकिन उस प्रॉसेस में लोग बहुत कुछ अचीव कर रहे हैं. आपने देखा रहाने को दो सेंचुरी मारते हुए. दिल्ली टेस्ट में. वो किसी माइलस्टोन के बारे में नहीं सोच रहा था. उसे सिर्फ टीम की पड़ी थी. लेकिन उसने दो सेंचुरी बनायीं जो उसे बहुत अच्छा लगा.
ऐसे में हमें ये समझना होगा कि हमें जीत के पीछे नहीं जीतने के प्रॉसेस के पीछे भागना चाहिए. उस दौरान जो भी अच्छा करता है, उसकी परफॉरमेंस को पूरी टीम के द्वारा एन्जॉय किया जाता है. मेरे लिए सबसे अच्छी चीज़ ये है कि टीम में सभी लोग मेरी उम्र के हैं. हम सभी अपना करियर साथ बना रहे हैं. ऐसे में ये एक इंट्रेस्टिंग सिचुएशन हो जाती है. क्यूंकि आपको मालूम है कि हर कोई अपना 100% देने वाला है. ऐसे में फिर कप्तान के तौर पर आप और कुछ नहीं मांग सकते हैं. आपको मालूम है कि हर कोई अपना बेस्ट करेगा, कमिटमेंट के साथ. फ़र्क नहीं पड़ता कि आप जीतें या हारें, आप उस कमिटमेंट को चाहते हैं.
अपनी ताकत के बारे में:
सब कुछ आपकी तैयारी पर डिपेंड करता है. अप कैसे एक गेम के लिए खुद को सेट-अप करते हैं. मेरे लिए ये है कि मैं 100 रन बनाने के बाद भी उतनी ही तेज़ी से भागना चाहता हूं जितनी तेज़ी से मैं ज़ीरो पर भागता हूं. इसलिए मैं खुद को वैसे ही ट्रेन करता हूं. मेरे कार्डियो सेशन भी
हाई-इंटेंसिटी होते हैं. स्प्रिंट करता हूं. अप-हिल हाई-अल्टीट्यूड मास्क पहन कर ट्रेनिंग करता हूं. उससे आप ज़्यादा ऑक्सीजन नहीं खींच सकते जिससे आपके फेफड़े और भी ज़्यादा खुल जाते हैं.
आपको जानना होगा कि आपका शरीर चाहता क्या है. उसे किस चीज की ज़रुरत है. शायद इसलिए मैं खुद को 70-80 पर होने के बावजूद सिंगल्स को डबल में बदलने के लिए पुश कर सकता हूं. क्यूंकि आपको गेम में पूरी तरह शामिल होना होगा. आपको स्ट्राइक बदलनी होती है. सिंगल्स और डबल्स लेकर आप उस शॉट को रोक सकते हैं जो आपको आउट करवा सकता है. आपको यही समझना होगा कि ये गेम का ये एरिया जो इतना छोटा सा लगता है, सबसे ज़्यादा फोकस मांगता है. अंत में गेम का सबसे बड़ा और ज़रूरी फैक्टर यही साबित होता है.
सचिन से कम्पेयर किये जाने के बारे में:
सच कहूं तो मैं शर्मिंदा हो जाता हूं. ये उनके लिए बिलकुल भी फ़ेयर नहीं है. उन्हें किसी से भी कम्पेयर नहीं किया जा सकता है. ये बिलकुल भी फ़ेयर नहीं है क्यूंकि आप एक अलग कैटेगरी के प्लेयर की बात कर रहे हैं. मेरा गेम साल-दर-साल बढ़ा है, वो खूबसूरत खेल को अपने साथ लेकर पैदा हुए थे. और चौबीस सालों तक ऐसा करते रहना मज़ाक नहीं है. मैंने सिर्फ 2-3 साल ही ये सब कुछ किया है. मैंने हमेशा उनको देखा है, उनसे इंस्पायर हुआ हूं. लेकिन उसी वक़्त मैं सिर्फ मैं ही रहना चाहता हूं. मैं एक ऐसा इंसान बनना चाहता हूं जो सचिन से इंस्पायर हुआ है लेकिन जिसने अपना रास्ता खुद बनाया. मैं ऐसा नहीं कह रहा कि मुझे ये पसंद नहीं है, लेकिन ये फ़ेयर नहीं होगा क्यूंकि मैं उनको देखता हुआ आया हूं. वो इस जनरेशन में क्रिकेट खेलने वाले किसी भी प्लेयर से दो लेवल ऊपर हैं.
उन्होंने सौ सेंचुरी मारी हैं. आज क्रिकेट खेलने वाले हर बैट्समैन को मालूम है कि एक-दो सेंचुरी मारना ही कितना कठिन होता है. उन्होंने चौबीस साल में जितना किया है, उसके बारे में बात करो तो थकान हो सकती है. और उन्होंने जो किया है वो इतनी शालीनता से किया है जिसका कोई जवाब नहीं. पूरे देश और दुनिया को अपने गेम में बांध के रखा. ऐसा और कहीं नहीं देखने को मिलता.
कोहली की प्राइवेट लाइफ है क्या?
मेरी प्राइवेट लाइफ मेरे होटल रूम तक ही सीमित है. मुझे अगर कॉफ़ी शॉप तक आकर ब्रेकफ़ास्ट करना हो तो मुझे पांच बार सोचना पड़ता है. ये बहुत ही अजीब लगता है. दिन के शुरुआत में ही अगर कुछ गड़बड़ हो जाये तो मुझे ठीक नहीं लगता. मैं बहुत सारा अटेंशन पाना पसंद नहीं करता. मैं उसपर ठीक से रिऐक्ट भी नहीं कर पाता. लेकिन उसी वक़्त मुझे बुरा भी लगता है जब 50 लोग ऑटोग्राफ़ मांग रहे होते हैं और मैं सिर्फ पांच बच्चों को ही ऑटोग्राफ़ दे पाता हूं. मैंने देखा है कि ऐसे में मेरे जाने पर धक्का-मुक्की हो जाती है और बच्चों को काफ़ी दिक्कत होती है. तो मैं जान-बूझकर वहां नहीं जाता हूं. मुझे बच्चों को परेशानी में देखन बहुत तकलीफ़ देता है. मैं अपनी मौजूदगी से उन्हें परेशानी में नहीं डाल सकता. ऐसे में मुझे समझ आ गया है कि काफी कुछ है जो मुझे करना होगा. मैं होटल की लॉबी से नहीं जा सकता. मुझे बैक-एग्ज़िट से निकल के किचन के अन्दर होते हुए जाकर खाना खाना होगा और वापस आ जाना होगा. आप जो भी करते हैं उसे कुछ पॉज़िटिव होते हैं और कुछ नेगेटिव. उसी समय पर मुझे घूमने को मिलता है तो मैं बाहर एकांत में समय निकाल सकता हूं. वहां मैं घूम सकता हूं. जब आप अपने देश के लिए अपने देश में खेल रहे होते हैं तो आपको अपने काम के साथ ये सब कुछ मिलता है. लोग अपना प्यार दिखा रहे होते हैं.

