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  • IND vs AUS: Story of Team India's first ever Test Victory in Australia

जब हाथ में चोट लेकर अमरनाथ ने ऑस्ट्रेलिया को पहला ज़ख्म दिया!

अगर वो 47 रन बनते, तो भारत 40 साल लेट ना होता.

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चंद्रशेखर उस सीरीज़ में 200 विकेट लेने वाले दूसरे भारतीय स्पिनर भी बने थे. फोटो: Getty Images
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विपिन
18 दिसंबर 2020 (Updated: 18 दिसंबर 2020, 09:39 AM IST)
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साल 2018 में जब विराट कोहली की टीम ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ खेलने पहुंची. तो लगभग हर अखबार, हर क्रिकेट जानकार ने एक बात कही कि भारत के पास ऑस्ट्रेलिया में सीरीज़ जीतने का ये सबसे बेहतरीन मौका है. लेकिन ऐसा ही एक मौका भारत को मिला था साल 1978-79 में. जब कैरी पैकर दुनिया भर में क्रिकेट की बड़ी टीमों से खिलाड़ियों को अलग करके अपना क्रिकेट शुरू कर रहे थे.
ऑस्ट्रेलियन टीम भी उससे अलहदा नहीं थी. उसके भी कई खिलाड़ी अपनी टीम का साथ छोड़कर जा चुके थे. वो ऑस्ट्रेलिया, जिसने इंग्लैंड के साथ मिलकर इंटरनेशनल क्रिकेट की शुरुआत की. जिसके पास स्पीड का कांटा तोड़ने वाले जैफ थॉमसन जैसे गेंदबाज़ थे. वो अब भारत के सामने फंसी हुई दिख रही थी. क्योंकि एक बात और थी, जो 1970 के दशक में टीम इंडिया के लिए कही जाती थी.
'ये नया इंडिया है, जो घर में घुसेगा भी और मारेगा भी.'
उस नए इंडिया की पहचान थे बिशन सिंह बेदी, सुनील गावस्कर, मोहिन्दर अमरनाथ, भगवत चंद्रशेखर जैसे दिग्गज खिलाड़ी. 1947 से ऑस्ट्रेलिया खेलने जा रही टीम इंडिया से 1978 में बहुत सी उम्मीदें थीं. क्योंकि अब हम इंग्लैंड को इंग्लैंड में हरा चुके थे, वेस्टइंडीज़ को घर में ज़ख्म दे चुके थे. ऑस्ट्रेलिया पर हावी नज़र आ रहे थे.
आलम ये था कि 1978-79 की सीरीज़ के लिए ऑस्ट्रेलिया ने 10 साल पहले संन्यास ले चुके बॉब सिम्सन को बतौर कप्तान वापस बुलाया. उन्होंने जैफ थॉमसन और खिलाड़ियों को इकट्ठा किया और भारत के खिलाफ सीरीज़ खेली. वो जैफ थॉमसन, जो मीटर का कांटा तोड़ 160kmph की रफ्तार से गेंदबाज़ी कर चुके थे.
Jeff Thomson
ऑस्ट्रेलियाई तेज़ गेंदबाज़ जेफ थॉमसन. फोटो: Getty

सीरीज़ के पहले दोनों मुकाबलों में कड़ी टक्कर हुई. लेकिन ऑस्ट्रेलिया मामूली से अंतर से भारत पर भारी पड़ा. ब्रिसबेन के पहले टेस्ट में भारत 16 रनों से हारा. जबकि पर्थ का दूसरा टेस्ट हमने दो विकेट से गंवा दिया.
भारत और ऑस्ट्रेलिया, मेलबर्न टेस्ट
अब खेला जाना था, तीसरा और ऐतिहासिक टेस्ट. ये मैच मेलबर्न के एमसीजी पर खेला जाना था. ऐतिहासिक इसलिए क्योंकि 12 टेस्ट और 30 सालों के इतिहास में हमने कभी भी ऑस्ट्रेलिया में जीत नहीं देखी थी. अब वो मौका आने वाला था.
इस मैच में भगवत चंद्रशेखर, मोहिन्दर अमरनाथ और सुनील गावस्कर को अपना जलवा दिखाना था.
मैच की शुरूआत हुई. भारत ने टॉस जीता पहले बैटिंग चुनी. लेकिन जैफ थॉमसन और क्लार्क के आगे हमारी ओपनिंग जोड़ी ढेर हो गई. गावस्कर और चेतन चौहान ज़ीरो के स्कोर पर पवेलियन लौट गए.
अब मैदान पर थे मोहिन्दर अमरनाथ और गुंडप्पा विश्वनाथ. लेकिन मोहिन्दर अमरनाथ पूरी तरह से फिट नहीं थे. उनके दाएं हाथ में चोट थी, वो असहज थे. ये चोट उन्हें दूसरे पर्थ टेस्ट में लगी थी. जिसमें वो टीम इंडिया के हीरो थे. अमरनाथ ने उस मैच में थॉमसन वाली बोलिंग अटैक के सामने 90 और 100 रनों की पारियां खेली थीं.
लेकिन अपने हाथ की चोट को भूलकर वो तीसरे मैच में भी खेलने उतरे. उतरे ही नहीं, उन्होंने गुंडप्पा के साथ 105 रनों की अहम साझेदारी भी की. दिन का खेल खत्म हुआ तो भारत ने छह विकेट खोकर 234 रन बनाए थे. अमरनाथ 72 और विश्वनाथ 59 रन बनाकर आउट हुए थे.
दूसरे दिन भारत की पारी 256 रनों पर सिमट गई. लेकिन इसके बाद का काम भगवत चंद्रशेखर का था. चंद्रशेखर ने इस मैच में ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी को 213 रनों पर समेट दिया.
उन्होंने पहली पारी में 14.1 ओवर गेंदबाज़ी की और छह विकेट अपने नाम किए. भारत को पहली पारी के आधार पर अहम 43 रनों की बढ़त मिल चुकी थी. अब भारत को दूसरी पारी में बल्लेबाज़ी के लिए उतरना था. लेकिन इस 43 रन की बढ़त के साथ भारतीय टीम को एक और खबर मिली. खबर थी,
'थॉमसन को हेमस्ट्रिंग हो गई है और वो भारत की पारी की शुरुआत में गेंदबाज़ी नहीं करेंगे.'
Sunil Gavaskar Batting 700
अंपायर्स पर एकदम भड़क ही गए थे Sunil Gavaskar (गेटी फाइल)

बस टीम इंडिया को तो मानो मौके का फायदा मिल गया. सुनील गावस्कर ने आते ही रन बनाने शुरू कर दिया. दूसरे दिन का खेल खत्म हुआ तो भारत ने एक विकेट के नुकसान पर 93 रन की बढ़त हासिल कर ली. गावस्कर को जमने का मौका मिला और रेस्ट डे के बाद उन्होंने सीरीज़ का तीसरा शतक जड़ दिया. दूसरी पारी में विश्वनाथ ने 54 और अमरनाथ ने चोट के बावजूद सातवें नंबर पर आकर 41 रनों की अहम पारी खेली. जिससे भारत ने 343 रन बनाए और ऑस्ट्रेलिया को 387 रनों का लक्ष्य दे दिया.
387 रनों का लक्ष्य वो भी ऐसी पिच पर हासिल करना लगभग नामुमकिन था. क्योंकि पिच पर स्पिनर्स को मदद मिल रही थी और बाउंस का तो कुछ अता-पता ही नहीं था.
बस 387 रनों के बाद चंद्रशेखर ने पहली इनिंग का रिपीट टेलिकास्ट दिखा दिया. उन्होंने दूसरी पारी में भी 52 रन देकर छह विकेट निकाले. बाकी के बचे चार विकेट कप्तान बिशन सिंह बेदी ने चटकाए और पहली बार ऑस्ट्रेलिया में भारत का तिरंगा लहराया. भारत ने इस मैच को बड़े 222 रनों के अंतर से जीता.
चंद्रशेखर ने उस मैच में 104 रन देकर 12 विकेट अपने नाम किए. उनके 14 साल के क्रिकेटिंग करियर का वो सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी रहा.
मेलबर्न के इस मैच को जीतने के बाद टीम इंडिया ने सिडनी में खेले गए चौथे टेस्ट को तो पारी और दो रन से जीता. अब भारत सीरीज़ में हावी था. लगने लगा था इंग्लैंड, वेस्टइंडीज़ के बाद अब ऑस्ट्रेलिया में भी परचम लहराएंगे. सीरीज़ के आखिरी मैच में भी टीम इंडिया ने बढ़िया खेल दिखाया. लेकिन अंपायरों के फैसले से भारत आखिरी मैच 47 रनों से हार गया. जिसकी वजह से ऑस्ट्रेलिया में पहली सीरीज़ जीतने में टीम इंडिया को 40 साल इंतज़ार करना पड़ा.

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