AFI अधिकारियों की शर्मनाक चूक! 18 साल की इस एथलीट के साथ एशियाड के ट्रायल्स में मज़ाक
Inter State Senior Athletics Championships : 400 मीटर हर्डल्स की पहली हीट रेस में तमिलनाडु की Harshita थर्ड आई थीं. उन्होंने अपने करियर की पर्सनल बेस्ट टाइमिंग भी रिकॉर्ड की. लेकिन, उनके इस रिकॉर्ड को खारिज़ कर दिया गया. इसमें गलती उनकी नहीं, बल्कि AFI के टेक्निकल अधिकारियों की थी.

सेंकेंड का आधा हिस्सा. इसकी वैल्यू कितनी है. ये तमिलनाडु की हर्डलर हर्षिता ही जानती हैं. खासकर तब, जब उनकी गलती भी नहीं थी. भुवनेश्वर में 27 जून को हार्ट ब्रेक करने वाली ऐसी ही एक घटना एक ट्रैक इवेंट के दौरान हुई. ओडिशा की राजधानी में इंटर स्टेट सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप चल रही है. इस प्रतिष्ठित इवेेंट में टेक्निकल अधिकारियों की एक बड़ी चूक ने हर्षिता के हाथ से बड़ा मौका छीन लिया.
मौका U-23 के अपने प्रदर्शन को सीनियर लेवल पर दोहराने का. मौका एशियन गेम्स में देश को रिप्रजेंट करने का. लेकिन, कमाल की बात ये है कि गलती टेक्निकल अधिकारियों ने की. खामियाजा एथलीट को भुगतना पड़ा. ऑर्गेनाइजर एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया. गलती एथलीट की भी थी, सिर्फ हमारी नहीं.
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन की पोल खोल दी है. भुवनेश्वर में हो रहा ये इवेंट एशियन गेम्स के लिए सेलेक्शन ट्रायल भी है. लेकिन, इतने अहम कॉम्पिटिशन में हुई चूक के कारण एथलीट को 48 घंटे से भी कम समय में 3 मुश्किल रेस दौड़नी पड़ी. नतीजा वो अंतत: फाइनल में जगह नहीं बना सकीं.
क्या है पूरा विवाद?दरअसल, ये विवाद 26 जून की शाम को शुरू हुआ. महिलाओं की 400 मीटर हर्डल रेस की पहली हीट चल रही थी. हर्षिता भी इसमें शामिल थीं. वो लेन 8 में थीं. रेस शुरू हुआ. हर्षिता ने अपने करियर का बेस्ट प्रदर्शन किया. उन्होंने पर्सनल बेस्ट टाइम 1:01.03 सेकेंड दर्ज कर दिया. वह हीट में थर्ड आईं. फाइनल में जगह भी बना ली. लेकिन, हर्षिता की यह खुशी ज़्यादा देर तक नहीं रही.
टेक्निकल अधिकारियों की एक गलती के कारण हर्षिता की पर्सनल बेस्ट टाइमिंग दर्ज ही नहीं की गई. दरअसल, हुआ यूं कि चौथा हर्डल पार करने के बाद स्प्रिंटर ने एक अजीब नज़ारा देखा. उनकी तय लेन में 5वां हर्डल गायब था. वो फ्रैक्शन ऑफ सेकेंड्स के लिए चौकीं. फिर अपने बगल की लेन 7 में जाकर वहां के हर्डल को पार किया. इसके बाद, वापस अपनी लेन में लौटीं और बाकी के 5 हर्डल्स पार कर रेस पूरी कर ली.
रेस के बाद जांच में एरिना के टेक्निकल स्टाफ की एक बड़ी गलती सामने आई. लेन 8 में जरूरी 10 हर्डल्स की जगह, सिर्फ 9 हर्डल्स ही लगाए गए थे. मामले ने तूल पकड़ लिया. लेकिन, अपनी गलती सुधारने के बजाय एडमिनिस्ट्रेटिव अफसरों ने उल्टा एथलीट को ही सजा दे दी. हर्षिता की पर्सनल बेस्ट टाइमिंग रद्द कर दी गई. इसके बाद ये तय किया गया कि 27 जून की सुबह हर्षिता को एक और मौका दिया जाएगा.
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गलती अफसरों की, सजा एथलीट कोआप सोचेंगे जब मौका दोबारा मिल ही गया तो सजा कैसी. लेकिन, ठहरिये. फैसला ये लिया गया कि हर्षिता अकेले टाइम ट्रायल करेंगी. अगर उन्हें फाइनल में जगह वापस पानी है तो 1 मिनट 2 सेकेंड के बैरियर को तोड़ना होगा. दरअसल, ट्रैक इवेंट्स में बगल में दौड़ रहे एथलीटों के कॉम्पिटिटिव रिदम और पेसिंग के बिना घड़ी के खिलाफ़ दौड़ना मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत बड़ा नुकसान माना जाता है.
खासकर दो दिनों में तीन एलीट-लेवल रेस दौड़ना कोई साधारण चुनौती नहीं है. ये काफी थकाऊ होता है. हुआ भी वही, जिसका डर था. 27 जून की सुबह जब हर्षिता अकेले दोबारा दौड़ीं, तो थकान उनकी टांगों पर हावी रही. नतीजा उन्हें रेस पूरी करने में 1:02.54 सेकेंड का समय लग गया. यानी महज 0.54 सेकेंड से वो क्वालिफिकेशन बैरियर को नहीं तोड़ सकीं. नतीजा, उन्हें डिस्क्वालिफाई कर दिया गया. महज 18 साल की उस एथलीट के लिए ये फेयर चांस कैसे था?
एथलीट पर आरोप मढ़ना सरासर गलतहर्षिता एक टॉप क्लास एथलीट हैं. उन्होंने पिछले साल वारंगल में हुई इंडिया ओपन U23 चैंपियनशिप की इसी स्पर्धा में सुनहरा तमगा अपने नाम किया था. भुवनेश्वर में भी वो काफी लय में थीं और पर्सनल बेस्ट रिकॉर्ड किया. लेकिन, AFI की अगुवाई में हो रहे टूर्नामेंट के एक टेक्निकल चूक ने उनसे बड़ा मौका छीन लिया.
इस पूरे घटनाक्रम में जिस तरह से हालात को संभाला गया, उसने एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (AFI) पर सवाल खड़े कर दिए हैं. AFI बड़े इवेंट्स को कुशलता से आयोजित करने के लिए जाना जाता है. लेकिन, इक्विपमेंट प्लेस करने में हुई गलती की ज़िम्मेदारी लेने के बजाय, अधिकारियों ने कथित तौर पर सारा दोष यंग एथलीट पर मढ़ दिया.
एलिमिनेशन के बाद भावुक हर्षिता ने NNIS स्पोर्ट्स को बताया,
अधिकारियों ने कहा कि इसमें मेरी भी गलती थी. क्योंकि कल मैंने बगल वाली लेन का हर्डल पार कर लिया था.
भुवनेश्वर में हुए इस पूरे घटनाक्रम ने इवेंट की एक कड़वी याद छोड़ दी है. इसने देश में एथलीटों की भलाई को लेकर बुनियादी सवाल भी खड़े कर दिए हैं. अगर टेक्निकल अधिकारी स्टैंडर्ड ट्रैक लेआउट देने में नाकाम रहते हैं, तो एथलीट इसका खामियाजा क्यों भुगते? ये कहना गलत नहीं होगा कि हर्षिता का एशियन गेम्स में भाग लेने का सपना उनकी स्पीड ने नहीं, बल्कि अधिकारियों की चूक ने घोंट दिया.
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