ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद की पहली जीत का ये क़िस्सा पता है तो सलामी ले लो!
जब टेनिस कोर्ट के चक्कर ही काटते रहते थे आनंद.
Advertisement

Viswanathan Anand B’day Spl आर्टिकल में पढ़ें विशी के बचपन के क़िस्से (गेटी फाइल)
Quick AI Highlights
Click here to view more
विश्वनाथन आनंद. भारत में जन्मे उन चंद एथलीट्स में से एक जिन्होंने कभी क्रिकेट नहीं खेला, लेकिन रुतबे के मामले में वह किसी क्रिकेटर से कम नहीं हैं. कहने का अर्थ बस यही है कि क्रिकेट की पूजा करने वाले इस देश में आनंद ने अपना अलग मुकाम बनाया है. और मुकाम भी ऐसा, कि किसी भी एथलीट के लिए उसकी बराबरी करना आसान नहीं है.
आनंद सालों तक वर्ल्ड नंबर वन रहे, कई दफा वर्ल्ड चैंपियन बने. भारत के पहले ग्रैंडमास्टर बने, वर्ल्ड जूनियर चेस चैंपियनशिप जीतने वाले पहले एशियन बने. और इस खेल के ऑस्ट्रेलिया/ब्राज़ील बने रूस को कई बार परास्त किया. 11 दिसंबर 1969 को चेन्नई से लगभग 300 किलोमीटर दूर स्थित जिले मयिलादुतुरई में जन्मे आनंद आज 52 साल के हो गए. अपने अब तक के करियर में आनंद हजारों मैच जीत चुके हैं. लेकिन क्या आपको पता है, उन्होंने किसी भी टूर्नामेंट का अपना पहला मैच कैसे जीता था?
# Happy Birthday Viswanathan Anand
अगर हां, तो हमारा सलाम क़ुबूल करिए. और नहीं, तो चलिए बताते हैं.
आनंद के बारे में कहीं भी पढ़ना शुरू करिए. हर जगह एक लाइन आपको कॉमन मिल सकती है- आनंद ने बहुत छोटी उम्र में चेस खेलना शुरू कर दिया था. ऐसी लाइनों को बुद्धिजीवी क्लीशे कहते हैं. और लल्लनटॉप में हमारी पूरी कोशिश होती है कि हम क्लीशे लाइंस से बच सकें. नहीं, हम बहुत अच्छे नहीं हैं, बस हमें 'बॉस' से डर लगता है. हां तो इस क्लीशे लाइन से पहले की बात है.
छोटी उम्र में ही आनंद के माता-पिता ने उनका एडमिशन एक टेनिस अकैडमी में करा दिया था. और जानकारों का कहना है कि आनंद को इस अकैडमी में जाना उतना ही पसंद था जितना हमें दफ्तर आना. अब आप पूछेंगे ऐसा क्यों? तो इसका जवाब आनंद ने खुद दिया है. अपनी बायोग्रफी माइंड मास्टर में आनंद लिखते हैं,
'जब मैं छोटा था, मुझे टेनिस सीखने से नफरत थी. ऐसा नहीं था कि मुझे ये खेल नहीं पसंद था, बल्कि मुझे अलसुबह एगमोर, मद्रास यानी अब की चेन्नई स्थित इस अकैडमी के कोर्ट के अनगिनत चक्कर काटने से कोफ्त होती थी. कोच रॉबिन मैनफ्रेड की इस अकैडमी में मैं जूनियर प्रोग्राम का हिस्सा था. उस वक्त मेरी उम्र बमुश्किल सात साल रही होगी. यह अकैडमी हमारे घर से लगभग पांच किलोमीटर दूर थी. सुबह-सुबह कोर्ट के चक्कर काटना हमारे वॉर्म-अप का हिस्सा था. लेकिन समस्या ये थी कि मैं बस वॉर्म-अप ही कर पाता था, गेंद को कूटने के मौके तो मिलते ही नहीं थे. हमें ग्रुप में बांटकर चार फोरहैंड और चार ही बैकहैंड शॉट लगाने को मिलते थे. और बस, दिन की ट्रेनिंग खत्म. और मेरा मानना था कि सुबह 5:30 बजे उठने के बाद मिलने वाली ये खुशी बहुत कम है. और मुझे यह सोचकर भी आश्चर्य होता था कि मेरे मम्मी-पापा मुझे एक कोर्ट के इर्द-गिर्द भगाने के लिए इतने अधिक पैसे क्यों खर्च कर रहे. ट्रेनिंग के नाम पर जो कुछ भी हो रहा था वह मेरी फैंटेसीज पर एक आघात था. वह फैंटेसीज जिनमें मैं अपने हीरो जॉन मैक्नरो की तरह कोर्ट पर उछलते-कूदते हुए कमाल के शॉट्स खेलता था. ये अलग है कि मेरे पास ना तो मैक्नरो जैसे शॉट्स थे और ना ही मैं उनकी तरह कमाल का दिखने वाला गबरू जवान था. लेकिन किस्मत से मेरे पास चेस थी.'लीजिए, चेस का ज़िक्र आ ही गया. हां तो बात ये है कि आनंद की माताजी वकीलों के परिवार से थीं. और ये वकील सब अपने घर में टाइमपास के लिए चेस खेलते थे. आनंद की मां ने उन्हें खेलते देखा और बचपन से ही उन्होंने भी इन 64 खानों में प्यादे घुमाने शुरू कर दिए. और फिर शादी के बाद जब आनंद और उनके भाई-बहन पैदा हुए तो सभी ने शुरू से ही इस खेल को देखा. और आनंद से पहले उनके भाई-बहन ने यह खेल खेलना शुरू किया. आनंद सबसे छोटे थे और हम सबकी तरह उन्होंने भी अपने बड़े भाई-बहनों को फॉलो किया. आनंद बताते हैं कि उनकी टू डू लिस्ट में हर वो काम होता था जो उनके बड़े भाई-बहन करते थे. यहां जानना जरूरी है कि आनंद के भाई उनसे 13, तो बहन 11 साल बड़े थे. और फिर छह साल की उम्र में आनंद ने इस ब्लैक एंड व्हाइट दुनिया में अपना पहला कदम रखा. और जल्दी ही इस खेल में अपनी मां को हराने लगे.
ऐसे ही दिन कट रहे थे कि एक रोज कॉलेज से लौटते वक्त आनंद की बहन ने एक बोर्ड देखा. उस बोर्ड पर लिखा था- चेस क्लब. खोजइया हुई तो पता चला कि ये मिखाइल ताल चेस क्लब था. और इसका नाम सोवियत समूह के दिग्गज चेस प्लेयर मिखाइल ताल को समर्पित था. और उस वक्त देश के इकलौते इंटरनेशनल मास्टर मैनुअल आरोन भी इस क्लब से जुड़े थे. इतनी जांच-पड़ताल के बाद आनंद के परिवार ने उन्हें इस क्लब से जोड़ दिया. लेकिन यहां समस्या ये थी कि आनंद को हर बोर्ड पर अपने से काफी बड़े लोग ही दिखते थे. वह शर्माए से बस घूमते रहते, किसी से कह ही नहीं पाते कि- मुझे भी खेलना है. और ऐसे ही एक रोज क्लब का काम देखने वाले केशवन नाम के भले मानुस ने आनंद को पकड़कर एक टेबल पर बिठा ही दिया. और फिर आनंद की मां ने मौके पर चौका मारते हुए केशवन से कहा,कमाल का है आनंद का पहला मैच जीतने का क़िस्सा. @vishy64theking के हैप्पी बड्डे पर सुनाएंगे उनके बचपन के बेहतरीन क़िस्से, बस थोड़ी ही देर में.#ViswanathanAnand #HappyBirthdayAnand pic.twitter.com/FzKGReO3D5
— Lallantop Sports (@LallantopSports) December 11, 2021
'यहां होने वाले हर वीकेंड टूर्नामेंट में आनंद का नाम लिख दें.'क्लब से कायदे से जुड़ने के तीन दिन बाद आनंद अपने पहले टूर्नामेंट में उतरे. और यहां लगातार तीन मैच हार गए. फिर आया चौथा मैच. आनंद के सामने वाला प्लेयर वक्त पर नहीं पहुंचा. और फिर आनंद मन ही मन प्रार्थना करने लगे कि अब ये आए ही ना तो बेहतर. उनकी प्रार्थना रंग लाई और वो प्लेयर देर से भी नहीं आया. मतलब आया ही नहीं और आनंद को बाइ डिफॉल्ट विजेता घोषित कर दिया गया. यह किसी भी टूर्नामेंट में आनंद की पहली जीत थी. और इसके बाद का इतिहास तो सब जानते ही हैं.
हैप्पी बर्थडे ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद.

