यूपी चुनाव में गठबंधन और उम्मीदवारों की स्थिति जैसे-जैसे साफ होती जा रही है,चीज़ें दिलचस्प होती जा रही हैं. भाजपा ने राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को टिकटदिया तो वंशवाद के आरोप लगने लगे. राहुल और अखिलेश तो पहले से मैदान में हैं ही.कुल मिलाकर बात ये है कि हिंदुस्तान में कोई भी बड़ा काम बिना घर परिवार की चर्चाके साथ नहीं हो सकता. हिंदुस्तान के तमाम सियासी परिवारों में महिलाओं को पद औरताकत के मामले में अक्सर साइडलाइन कर के रखा जाता हो. मगर चुनाव में भीड़ खींचने औरपारिवारिक इमोशन लाने के लिए बहनों, बेटियों और बहुओं से खूब अपील करवाई जाती है.यूपी चुनाव में लगा ग्लैमर का नया तड़का, अब एक साथ होगी डिंपल और प्रियंका कीजोड़ीमीडिया के बड़े वर्ग में इस तरह की हेडलाइन के साथ प्रियंका गांधी और डिंपल यादव केचुनाव प्रचार, उनके ग्रामीण और शहरी मतदाताओं को ‘लुभाने’ की संभावनाओं पर चर्चा होरही है. वैसे सियासी परिवारों से आने वाले बेटों को टिकट मिलता है तो वंशवाद की बातज़्यादा होती है और बेटियां-बहुएं चुनाव लड़ने और प्रचार करने पर ग्लैमर की. चुनावऔर खबरों का ये मजमून कहीं न कहीं ये भी बताता है की एक समाज के तौर पर हम कितनेबायस्ड और सेक्सिस्ट हैं. नज़र उत्तर प्रदेश चुनाव की इन सारे कैंडिडेट्स औरप्रचारकों पर भी डाल लेते हैं.डिंपल और प्रियंकासबसे ज़्यादा चर्चा इन दो की है. प्रियंका कांग्रेस की स्टार प्रचारक हैं. सौम्यभाषा और छवि वाली प्रियंका राजनीति में सिर्फ चुनावों के समय सक्रिय दिखाई देतीहैं. प्रियंका के बारे में कांग्रेसी जन रह-रह कर नारा लगाते हैं कि प्रियंका लाओकांग्रेस बचाओ. वहीं डिंपल इस समय कन्नौज से सांसद हैं.डिंपल और प्रियंकाकहा जा रहा है कि प्रियंका ने ही कांग्रेस और सपा का गठबंधन फाइनल करवाया है. इसकेअलावा वो सक्रिय राजनीति में नहीं हैं तो उनके पॉलिटिकल योगदान की बात करना गलतहोगा. दूसरी ओर डिंपल यादव 2009 में फिरोज़ाबाद से चुनाव हार गई थी. इसके बाद 2012बाइ इलेक्शन में निर्विरोध चुनी गईं और उसके बाद 2014 में भाजपा के सुब्रत पाठक कोहरा कर सांसद बनी. अखिलेश यादव के साथ तो इनकी मौजूदगी खूब दिखती है मगर संसद कीचर्चा में ये समाजवादी बहू कम ही हिस्सा लेती हैं. इसी साल इनके लोकसभा भाषण कीसोशल मीडिया पर काफी ट्रोलिंग हुई थी.बीजेपी की जवाबी जोड़ीजोड़ी के बदले जोड़ी ही चलिहे दद्दा. कुछ इसी तर्ज पर बीजेपी ने अपनी भी एक जोड़ीको प्रमोट करना शुरू कर दिया है. भाजपा की टीवी वाली बहू स्मृति ईरानी के साथ अपनादल वाली बेटी अनुप्रिया पटेल. स्मृति जी अपने नाटकीय मगर तेज तर्रार भाषणों के लिएजानी जाती हैं. साथ ही इन्हें मुख्यमंत्री कैंडिडेट घोषित किए जाने की भी सुगबुगाहटहै. अनुप्रिया पटेल सोनेलाल पटेल की बेटी हैं जो पिछली बार खबरों में साम्प्रदायिकट्वीट्स के कारण आईं थी. बीजेपी समर्थकों का कहना है कि ये दोनो शहरी और महिलावोटर्स को ज़्यादा लुभाएंगी.अनुप्रिया और स्मृतिहिंदुस्तान की सियासत में अच्छा दिखना और कायदे से अपनी बात कहना दो ऐसी खूबियांहैं जिनके चलते लोगों की कई कमियां छिप जाती है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रसंघचुनावों को ही देख लीजिए, कहावत है हर साल सिर्फ चेहरा देख कर वोट पड़ता है. इनदोनों पर सबसे हैरान करने वाला तर्क उत्तर प्रदेश की एक वरिष्ठ पत्रकार ने बीबीसीको अपनी बातचीत में दिया है कि डिंपल-प्रियंका की उम्र भाजपा की नेताओं से कम हैइसलिए ये दोनों ज़्यादा पॉपुलर होंगी.मीडिया की आलोचना करने से पहले याद कर लीजिए कि हिंदुस्तान की सियासत में सबसेकद्दावर नेताओं को हराने के लिए अक्सर सिनेमा के नायकों को पैराशूट से उतारा जाताहै. इस फॉर्मुले की सफलता को बताने वाले नाम तो अब तक आपको याद आ गए होंगे.बगावत की बातें अलग, परिवार अंत में परिवार ही होता हैलखनऊ कैंट से भाजपा ने रीता बहुगुणा जोशी को उतारा है. उत्तर प्रदेश के पूर्वमुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा की बेटी रीता लंबे समय तक जिस पार्टी कोसाम्प्रदायिक शक्ति कह-कह कर कोसती रहीं, आज उसी से चुनाव लड़ रही हैं. रीता जी सेपूछा जाना चाहिए कि अब वो कांग्रेस में वंशवाद की बात करेंगी या नहीं.इनके खिलाफ सपा से अखिलेश भैया ने अपने छोटे भाई की बहू अपर्णा यादव को उतारा है.अपर्णा यादव, प्रतीक यादव और साधना गुप्ता को शिवपाल खेमे का प्रमुख सदस्य बतायाजाता है. इनकी सियासी तलखियों के चलते न जाने कितने कार्यकर्ता लखनऊ केविक्रमादित्य मार्ग पर एक दूसरे के दुश्मन बने नारे लगाते रहे, हाथापाई करते रहे.मगर जब जनता की सेवा करने की बात आई तो अखिलेश भैया ने घर से ही शुरुआत की.अपर्णा यादव और रीता बहुगुणा जोशीइनके अलावा डॉ. संघमित्रा मौर्य और स्वाति सिंह जैसे नाम भी हैं जिनकी पहुंच अभीसीमित इलाकों में है. इन सभी के बारे में आप किसी पत्रकार या चुनावी विश्लेषक कीबात कर लीजिए सलीकेदार भाषा वाले कहेंगे कि इन सबकी सौम्य आकर्षक छवि का असर पड़ताहै. चटखारेदार लहजे में खबर लिखने के लिए ग्लैमरस शब्द इस्तेमाल कर लिया जाएगा. मगरबात यही है कि वंशवाद के इस अलग प्रकार पर हम सब नरम होकर बात करते हैं. साथ ही साथज़्यादातर नेताओं की तारीफ और बुराई में अक्सर जेंडर आधारित कमेंट पहले आते हैंयोग्यता की बात बाद में होती है. भारतीय समाज की मानसिकता का रिफ्लेक्शन दिखाते इसमुद्दे में हर विचारधारा और खेमे के लोग एक जैसे बयानों और सोच के साथ शामिल हैं.वैसे सियासत के जिस दौर में नेता एक पार्टी से दूसरी में सपरिवार ट्रांसफर हो रहेहों वहां अगर इस तरह की बातें न हों तो आश्चर्य होगा.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें :मोदी जी आपकी नई मंत्री खुल्ला झूठ बोल रही हैं!अखिलेश-डिंपल को टक्कर देने आया जयंत-चारु का नया जोड़ायूपी में नेता जी की आठ बेटियों पर रहेगा फोकस