एक कविता रोज: 'वो आदमी नहीं है, मुकम्मल बयान है'
आज हम आपको दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल पढ़ा रहे हैं.
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फोटो - thelallantop
'आज की कविता' में हम आपको 'कविताएं' पढ़वाते आए हैं. लेकिन आज दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल पढ़ा रहे हैं. क्योंकि ग़ज़ल भी तो कविता होती है, न?
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर झोले में उसके पास कोई संविधान है उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप वो आदमी नया है मगर सावधान है फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए हमको पता नहीं था कि इतनी ढलान है देखे हैं हमने दौर कई अब ख़बर नहीं पैरों तले ज़मीन है या आसमान है वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है ***
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर झोले में उसके पास कोई संविधान है उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप वो आदमी नया है मगर सावधान है फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए हमको पता नहीं था कि इतनी ढलान है देखे हैं हमने दौर कई अब ख़बर नहीं पैरों तले ज़मीन है या आसमान है वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है ***

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