मनमोहन की कुछ पंक्तियां हैं जिन्हें लिखकर मैंने अपने ऑफिस के डेस्क पर लगा रखाहै. लोग आते हैं, पढ़ते हैं. एक ऐसी मुस्कान जिसे 'आह' और 'वाह' के ठीक बीच रखा जासकता है, वो उनके चेहरों पर आ जाती है.इन्हें ज्यादा लोग जानते नहीं हैं. या यूं कहिए, कि ये चाहते नहीं कि इन्हें ज्यादालोग जानें. पढ़िए उस मनमोहन की कविता जो न अवॉर्ड लेते न लौटाते हैं, न फेसबुक परलिखते हैं, न किसी लिटरेचर फेस्टिवल में जाते हैं.-------------------------------------------------------------------------------- उसकी पीठउसकी पीठ जब जाने के लिए मुड़ती है तो उसी क्षण एक सूनी, अकेली और निष्ठुर जगह बनातीहै जो अनिवार्य हैजाते हुए उसकी पीठ को देखना ठीक ठीक सबसे ज्यादा अपने साथ होना है***उसकी थकानयह उस स्त्री की थकान थी कि वह हंस कर रह जाती थीजबकि वे समझते थे कि अंततः उसने उन्हें क्षमा कर दिया है***मनमोहन अपनी किचन में कॉफ़ी बनाते हुए. फोटो सोर्स: प्रशांत चक्रवर्तीकोई आएकोई आए और देखेसंभालकर रखे गए ये गिरे हुए पंख ये चले हुए तीरदीवार पर जीभ निकाले ये नीले काले मुखौटे और पास में चिपकी ये जंग खाई गली हुई तेलसे चुपड़ी ढाल ये प्राचीन तलवारछत पर रेंगती हैं मकड़ियां फर्श पर कनखजूरे दीवार से फूट पड़ता है पीपलकोई आए कोई दीया जलाए और देखे हमारे महाराणा प्रताप की मूंछ और मजनू के चार आंसूगिलास में सूखते हुए***