शमशेर बहादुर सिंह (13 जनवरी 1911 - 12 मई 1993) के बारे में एक बात बहुत इसरार केसाथ कही जाती है. बहुत ज़ोर देकर. बात ये कि शमशेर महज़ कवि नहीं है. शमशेर ‘कवियोंके कवि’ हैं. ये बात इसलिए क्योंकि हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि शमशेर की कविता सेइस्लाह लेते हैं. ‘प्रेम का कवि’ भी कहलाने वाले शमशेर का एक वाक़या उनके उदात्तजीवन का पैमाना दिखाता है. हिन्दी का मौजूदा वरिष्ठ आलोचक तब अपनी युवा वय में था.शमशेर वृद्ध हो चुके थे. आलोचक और शमशेर ट्रेन की यात्रा कर रहे थे. रास्ता बीत रहाथा. रास्ते में विज्ञापन बीत रहे थे. भारतीय रेल मार्का विज्ञापन.नामर्दी-स्वप्नदोष जैसी दिक्कतें दूर करें. इनके साथ विवाह की भी बातें थीं. मनचाहीलड़की या लड़के से विवाह का पक्का वादा. ऐसे विज्ञापनों में “निराश न हों” तो ज़रूरलिखा होता था. साथ में एक और बात लिखी होती थी. “एक बार मिल तो लें”. शमशेर औरआलोचक की निगाह से विज्ञापन गुज़र रहे थे. शमशेर जब 24 साल के थे, तब उनकी पत्नीधर्मवती का टीबी के चलते निधन हो चुका था. इधर विज्ञापन देखते शमशेर ने मौक़ा देखकरआलोचक से विवाह वाले विज्ञापनों की ओर दिखाते हुए सवाल किया, “क्या कहते हैं? ट्राईकिया जाए?” आलोचक को थोड़ा अचरज हुआ. फिर बात को सम्हालते हुए उन्होंने कहा, “अरे,इस उम्र में? क्या मिलेंगे? छोड़िए.” इधर शमशेर के पास जवाब रेडी था. आलोचक केप्रत्युत्तर के बाद उन्होंने कहा, “अरे, एक बार मिल तो लें.” ये तो शमशेर का किंचितपरिहास भर ही था. लेकिन पत्नी को खो देने का अभाव शमशेर की कविता में हमेशा रहा.ऐसे ही एक मौक़े पर शमशेर ने “काल तुझसे होड़ है मेरी” लिखकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिरकी. उनकी कविता ‘उषा’ हमारे और आपके लिए.प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसेभोर का नभराख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है)बहुत काली सिल जरा-से लाल केशर से कि धुल गयी होस्लेट पर या लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी नेनील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो.और... जादू टूटता है इस उषा का अब सूर्योदय हो रहा है.--------------------------------------------------------------------------------विडियो: एक कविता रोज़- एक कविता रोज: जब वहां नहीं रहता