आशुतोष द्विवेदी फॉरेन सर्विसेज में अफसर रहने के बाद फ़िलहाल फॉरेन मिनिस्ट्री मेंहैं. कानपुर में 21 साल बिताए हैं. उसके बाद इलाहबाद चले गए. दोनों शहरों के लोगों,सड़कों, हवाओं और गंगा को समेटकर अपनी ग़ज़लों में निचोड़ दिया. आज पढ़िए इनकी दो ग़ज़लें.--------------------------------------------------------------------------------1.भूख को ओढ़े गरीबी सो रही है देश में काफी तरक्की हो रही है पी गए सारा अंधेरा रौशनीकी फिक्र में. फिर किसी के भी न हो पाए, सभी की फिक्र में. बंद पलकों में न जानेख्वाब कितने घुट गए, और कितने जी रहे हैं, खुदकुशी की फिक्र में. फिक्र सारी छोड़ दीजिसने वही बेखुद हुआ, बेखुदी हमने गंवाई, बेखुदी की फिक्र में. जिंदगी जीना मजे केसाथ आया ही नहीं, उम्र पूरी हो गई गलती-सही की फिक्र में. रात वो सपने में आएगा, येउसका कौल था, और मैं जागा रहा शब भर उसी की फिक्र में. फिक्रमंदों को मेरे, मैंनेबहुत रुसवा किया, तेरे दर की आरजू, तेरी गली की फिक्र में. आसमां से मैं बरसती थीजमीं पर बेहिसाब, लोग प्यासे रह गए खाते-बही की फिक्र में. घर बना पाए न हम इसलिएआवारा हुए, आप बेघर हो गए आवारगी की फिक्र में. खूबसूरत था वो कुदरत का दिया तोहफामगर, हमने गुलशन को उजाड़ा बेहतरी की फिक्र में.2.भूख को ओढ़े गरीबी सो रही है देश में काफी तरक्की हो रही है. बाल-विधवा सी हमारीजिंदगानी, दाग दामन के, छिपाकर धो रही है. जो नदी कल तेरी आंखों से बही थी. मेरे मनका गांव आज डुबो रही है. फिर तेरे होठों की गर्मी चाहती है, फिर हमारी सांस ठंडी होरही है. क्यों न उग जाए ईमारत पर ईमारत, हवस दिल में कंकरीटें बो रही है. बोझबस्तों का बढ़ा इतना जियादा, स्कूल में बैठी शरारत रो रही है. ‘उम्र को हम ढो रहेहैं’– ये भरम था, आज जाना– ‘उम्र हमको ढो रही है’.--------------------------------------------------------------------------------और कविताएं पढ़ने के लिए नीचे बने 'एक कविता रोज' टैग पर क्लिक करें.