ये ग़ज़लें हमें अबरार अहमद ने भेजी हैं. अबरार उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से हैं. बीते 12 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. फ़िलहाल गाज़ियाबाद में अमर उजाला अखबार से जुड़े हुए हैं. दैनिक भास्कर के साथ भी काम किया है. ग़ज़ल, नज़्म और कविताएं लिखते हैं.
1.
दिल को भी पुरसुकून धड़कने नहीं देता
साहिल इस समंदर को भड़कने नहीं देता
ख़ामोश पड़ा है वो मेरे अंदर, जाने कब से
कहता हूं तो कहता है तू निकलने नहीं देता
किस बात का अफ़सोस करें इस उम्र में हम भी
कोई मर्ज़ है जो इस घाव को भरने नहीं देता
कितने गरीब हो गए हैं हम आज इस शहर में
मेरा गांव आज भी किसी को भूख से मरने नहीं देता
***
2.
धूप बहुत है आंखों को धो लिया जाए
अरसा हुआ जी भर के रो लिया जाए
सफ़र लंबा है और कोई साथ नहीं जाने वाला
घड़ी दो घड़ी के लिए तो सो लिया जाए
सबके अपने गुनाह हैं अपनी नेकियां
क्यों न बगीचे में आइना बो लिया जाए
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