अनुज लुगुन युवा कवि हैं. उदय प्रकाश ने इन्हें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार सेनवाजा है. आज अपना जन्मदिन मना रहे हैं. एक कविता रोज़ में आज अनुज की एक कविताउन्हें मुबारकबाद देते हुए...मुझे लगता है यह धरती आज और हरी हुई है तुम्हारे स्वेटर की तरह थोड़ा और गरम भीबर्फीले तूफान के थमने का यह संकेत है एक चिड़ी के जन्म होने से हर बार जीवित होताहै एक सपना और एक उम्मीद अंधेरे सिरे से अंधेरे सिरे तक फैली सदी में रोशनी के लिएकि रेलगाड़ियों के भरे खाली डिब्बे इस बार भरे होंगे दंगे की शांति के बाद प्रियपड़ोसियों से फिर से त्योहारों में बंटेंगी मिठाइयां या कि केवल अब प्रेम ही प्रेमहोगा कि पहाड़ी तलहटी से दूर वहां रेत के टीलों पर टिमटिमा रही होगी कोई लालटेनपन-बिजलियों के झरनों के न होने के बावजूद रात पसर रही होगी किसी की बांसुरी कीधुनों पर कि बहुत सुबह उठकर देखूंगा ओस की बूंदों को भोर से पहले के आसमान को धौंरीखेदते हुए अपने बैलों के साथ कि अनाज के दानों से मेरी देह में मधुर कंपन होगा औरसचमुच मदहोश हो जाऊंगा आज सारंडा जंगल मुझे देखता है कोयल और कारो मुझसे बतियातीहैं छोटी चिड़ी की आत्मीयता कुछ और ही है पिछली रात के टूटे रिश्ते भी कुछ संकोचकरते हुए नजरें मिलाते हैं सब आश्वस्त होना चाहते हैं कि ब्रह्मांड के नए ग्रह सेजीवन संभव और बेहतर होगा ओ, मेरी बाईस साला प्रिय! तुम उम्र के सौवें साल में भी आजके दिन एक नवजात शिशु ही होगी आज एक बार फिर सपने और उम्मीद जवां होंगे आओ,तुम्हारे लिए फूलों का पालना है आओ, मेरी बांहों में आओ आओ, मेरे होंठों में आओ आओ,अपने लाल मखमली ऊनी स्वेटर के साथ आओ, कि कई शहादतें, कई सदियां बीत गई हैं बर्फीलेतूफान से जूझते हुए